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झीरम घाटी नक्सली हमले में 10 दोषियों को फांसी की सजा: 29 लोगों की हत्या पर 13 साल बाद आया फैसला
Wed, 16 Sep 2026 05:31 PM IST
हिमांशु सिंह बघेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रायपुर
Published by: हिमांशु सिंह बघेल
Updated Wed, 16 Sep 2026 05:31 PM IST
सार
झीरम घाटी हत्याकांड मामले में जगदलपुर की एनआईए कोर्ट ने 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर हुए नक्सली हमले में 29 लोगों की मौत हुई थी।
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झीरम घाटी नक्सली हमला में बड़ा फैसला
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
झीरम घाटी हत्याकांड मामले में जगदलपुर की एनआईए कोर्ट ने 10 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के काफिले पर नक्सली हमला हुआ था। इसमें कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 29 लोगों की मौत हुई थी।
करीब 13 साल चली सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लिया गया। जज ने अपने फैसले में कहा है कि आदेश की पुष्टि हाईकोर्ट करेगा। दोषियों को 30 दिन के अंदर हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार है। अभियोजन पक्ष ने दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग की थी, जबकि बचाव पक्ष ने सजा कम करने की दलील दी थी।
इन 10 आरोपियों को फांसी की सजा
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उच्च न्यायालय में अपील की संभावना
इधर, एनआईए की विशेष अदालत से दोषियों को मृत्युदंड की सजा मिलने के बाद अब मामले की अगली कानूनी प्रक्रिया पर सबकी निगाहें हैं। आरोपी पक्ष फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है।
25 मई 2013 को हुआ था झीरम नक्सली हमला
13 साल पहले बस्तर में कांग्रेस अपनी परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी। 25 मई 2013 की शाम यह यात्रा सुकमा की ओर से लौट रही थी। काफिला जब दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तभी माओवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। हमले की शुरुआत आईईडी विस्फोट से हुई। इसके बाद सड़क पर पेड़ गिराकर रास्ता बंद किया गया और जंगल से काफिले पर गोलियां बरसाई गईं। कुछ ही देर में पूरा इलाका गोलियों की आवाज से गूंज उठा। नक्सलियों ने नेताओं और सुरक्षाकर्मियों को अलग-अलग कर दिया। माओवादियों का खास निशाना महेंद्र कर्मा थे। नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कई अन्य लोगों की भी हत्या कर दी गई। एक ही हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश नेतृत्व के कई प्रमुख नेताओं की मौत हो गई थी। झीरम हमला अचानक लिया गया फैसला नहीं था। इसके लिए कई सप्ताह पहले से तैयारी चल रही थी।
मिनपा से दरभा कैसे बदला टारगेट
माओवादियों की शुरुआती योजना सुकमा के मिनपा क्षेत्र में सुरक्षा बलों की चौकी पर हमला करने की थी। फरवरी 2013 में बीजापुर के पिडिया गांव में हुई बैठक में रणनीति बदली गई। बैठक में फैसला हुआ कि हमला मिनपा के बजाय दरभा क्षेत्र में किया जाएगा। यह निर्णय वरिष्ठ माओवादी कमांडर देवजी की मौजूदगी में लिया गया था।
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करीब 13 साल चली सुनवाई के दौरान 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लिया गया। जज ने अपने फैसले में कहा है कि आदेश की पुष्टि हाईकोर्ट करेगा। दोषियों को 30 दिन के अंदर हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार है। अभियोजन पक्ष ने दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग की थी, जबकि बचाव पक्ष ने सजा कम करने की दलील दी थी।
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इन 10 आरोपियों को फांसी की सजा
- प्रमिला मोडियाम
- सुमित्रा पुनेम
- कोसा कवासी
- मुक्का मांडवी
- मड़कामी देवा
- आयत मरकाम
- बजामी सेना
- चैतू लेकाम
- जोगा मड़कामी
- महादेव नागा
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उच्च न्यायालय में अपील की संभावना
इधर, एनआईए की विशेष अदालत से दोषियों को मृत्युदंड की सजा मिलने के बाद अब मामले की अगली कानूनी प्रक्रिया पर सबकी निगाहें हैं। आरोपी पक्ष फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील दायर कर सकता है।
25 मई 2013 को हुआ था झीरम नक्सली हमला
13 साल पहले बस्तर में कांग्रेस अपनी परिवर्तन यात्रा निकाल रही थी। 25 मई 2013 की शाम यह यात्रा सुकमा की ओर से लौट रही थी। काफिला जब दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी से गुजर रहा था, तभी माओवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। हमले की शुरुआत आईईडी विस्फोट से हुई। इसके बाद सड़क पर पेड़ गिराकर रास्ता बंद किया गया और जंगल से काफिले पर गोलियां बरसाई गईं। कुछ ही देर में पूरा इलाका गोलियों की आवाज से गूंज उठा। नक्सलियों ने नेताओं और सुरक्षाकर्मियों को अलग-अलग कर दिया। माओवादियों का खास निशाना महेंद्र कर्मा थे। नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और कई अन्य लोगों की भी हत्या कर दी गई। एक ही हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश नेतृत्व के कई प्रमुख नेताओं की मौत हो गई थी। झीरम हमला अचानक लिया गया फैसला नहीं था। इसके लिए कई सप्ताह पहले से तैयारी चल रही थी।
मिनपा से दरभा कैसे बदला टारगेट
माओवादियों की शुरुआती योजना सुकमा के मिनपा क्षेत्र में सुरक्षा बलों की चौकी पर हमला करने की थी। फरवरी 2013 में बीजापुर के पिडिया गांव में हुई बैठक में रणनीति बदली गई। बैठक में फैसला हुआ कि हमला मिनपा के बजाय दरभा क्षेत्र में किया जाएगा। यह निर्णय वरिष्ठ माओवादी कमांडर देवजी की मौजूदगी में लिया गया था।