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जंगल में जिंदगी: आजादी के बाद भी इस गांव में नहीं हुआ विकास, खाट पर मरीज को ले जाते अस्पताल; जुगाड़ से बना पुल

Fri, 04 Jul 2025 06:07 PM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, जशपुर
अमर उजाला नेटवर्क, जशपुर Published by: श्याम जी. Updated Fri, 04 Jul 2025 06:07 PM IST
सार

जशपुर के कुनकुरी विकासखंड के बोडराबांध गांव में लोग सड़क और पुल की कमी से जूझ रहे हैं। बिजली के खंभों से बने जुगाड़ पुल से आवागमन करते हैं। सरपंच ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सुविधाओं की मांग की है।

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People are facing problem of lack of road and bridge Bodrabandh village Jashpur
जुगाड़ पुल से गुजरते ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जशपुर जिला जिसे जल, जंगल और जमीन से समृद्ध कहा जाता है, वहीं की एक आदिवासी बस्ती आज भी बुनियादी सुविधा से वंचित है। कुनकुरी विकासखंड अंतर्गत गड़ाकटा ग्राम पंचायत का वार्ड नंबर-13 बोडराबांध आजादी के 75 साल बाद भी सड़क और पुल जैसी मूलभूत सुविधाओं से महरूम है। यह इलाका लगभग बारह महीनों में दस महीने पूरी तरह पहुंचविहीन बना रहता है।

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बरसात में तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं। ऊपर से जंगली हाथियों का आना-जाना अलग खतरा पैदा करता है। 20 परिवारों के 75 लोगों का आना-जाना जिस पुल से होता है, वह असल में एक बिजली के खंभों से बना 'जुगाड़ पुल' है। गांव से मुख्य सड़क तक का तीन किलोमीटर का सफर किसी जंग से कम नहीं है।
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सरपंच ने मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
ग्राम पंचायत की सरपंच तेजो बाई  ने गांव की इस गंभीर स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखा है। उन्होंने आग्रह किया है कि बोडराबांध के लोगों को कम से कम आने-जाने की सुविधा मिले ताकि वे भी योजनाओं का लाभ उठा सकें।

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ड्रेस प्लास्टिक बैग में, बीमार को खाट पर
यहां के ग्रामीण संदीप टोप्पो ने बताया कि बरसात के समय बीमारों को खाट में लादकर दो किलोमीटर दूर पक्की सड़क तक ले जाना पड़ता है। बच्चे स्कूल के कपड़े प्लास्टिक के बैग में रखकर कुनकुरी पहुंचते हैं। फिर वहां कपड़े बदलकर स्कूल जाते हैं।

सरकारी योजनाएं अधूरी, पानी की भी किल्लत
मोनिका टोप्पो बताती हैं कि बोडराबांध में न केवल सड़क और पुल की कमी है, बल्कि पानी की भी गंभीर समस्या है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कई लोगों के घर अधूरे रह गए हैं, क्योंकि सामान लाने का साधन ही नहीं है। मोनिका खुद पीएम आवास निर्माण की शुरुआत भी नहीं कर सकी हैं।

जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से जवाबदेही की मांग
बोडराबांध की यह स्थिति ना केवल प्रशासनिक उदासीनता को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि क्या विकास का लाभ हर गांव तक सच में पहुंच पाया है? अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री तक पहुँची यह गुहार क्या रंग लाती है या बोडराबांध के लोग आगे भी जुगाड़ के पुल से जिंदगी की नदी पार करते रहेंगे।

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