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विश्व थायराइड दिवस: गर्भावस्था में थायराइड न करें नजरअंदाज, बच्चे का आईक्यू हो सकता है कमजोर
Sat, 25 May 2024 03:55 PM IST
निवेदिता वर्मा
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 25 May 2024 03:55 PM IST
सार
गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर में कई हार्मोनल बदलाव होते हैं। हार्मोनल बदलाव की वजह से महिला के शरीर में कई तरह की समस्याएं भी पैदा होती हैं। इन्हीं समस्याओं में से एक थायराइड है। पुरुषों की तुलना में यह बीमारी महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है। शुरू में इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह दूसरी कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।
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thyroid
- फोटो : istock
विस्तार
गर्भावस्था के दौरान थायराइड की समस्या तेजी से बढ़ रही है। हर गर्भवती महिला की थायराइड की जांच अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। इसका जानकारी के अभाव में बचाव के उपाय न किए जाने से गर्भ में पल रहे बच्चे के आईक्यू पर सीधा असर पड़ सकता है। इससे बच्चे का मानसिक विकास बाधित होने के साथ कई अन्य परेशानियां हो सकती है। यह कहना है पीजीआई के इंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर संजय भडाडा का।
प्रो. भडाडा ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान की जाने वाली जांच से यह पता चल जाता है कि महिला को इसकी दवा देनी है या नहीं, अगर देनी है तो उसका कितना डोज देना है और वह डोज कितने समय तक दिया जाना है। इसके साथ इसका ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है कि अगर परिवार के किसी सदस्य को थायराइड हो तो इसकी जांच अवश्य कराएं। प्रो. भडाडा ने बताया कि मौजूदा समय में बांझपन की बढ़ती शिकायतों में भी थायराइड की भूमिका तेजी से बढ़ रही है इसलिए इलाज करने वाले डॉक्टर को भी थायराइड की जांच और इलाज को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
प्रो. भडाडा का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान आयोडीन नमक का सेवन बेहद जरूरी माना जाता है।
थायराइड आप भी जाने
थायराइड गर्दन के निचले हिस्से में तितली के आकार जैसी बनी एक ग्रंथि यानी की ग्लैंड है, जो शरीर की हर कोशिका को प्रभावित और मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करने का काम करती है। आप दिन भर में जिन भी चीजों को खाते पीते हैं यह ग्लैंड उन्हें ऊर्जा में बदलती है। थायराइड शरीर के अंदर कई तरह के हार्मोन को बनाने और उनके स्राव को कंट्रोल करने का काम करती है। जब थायराइड ग्रंथि शरीर में जरूरत से ज्यादा या कम मात्रा में हार्मोन बनाती है तो थायराइड की समस्या सामने आती है। शरीर में जरूरत से ज्यादा या कम हार्मोन होने की वजह से शरीर ठीक तरह से काम नहीं करता है और आपको कई परेशानियां शुरू हो जाती हैं।
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दो है प्रकार
हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति में थायराइड शरीर के जरूरत से कम हार्मोन्स का निर्माण करती है और हायपरथायरायडिज्म की स्थिति में थायराइड शरीर के जरूरत से ज्यादा मात्रा में हार्मोन्स का निर्माण करती है। गर्भावस्था के दौरान इन दोनों थायराइड के होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं....
हाइपोथायरायडिज्म के कारण
थायराइड के खराब होने की वजह से यह ठीक तरह से काम करना बंद कर देता है।
किसी बीमारी के इलाज के दौरान थायराइड ग्लैंड को निकाल देने की वजह से।
लेजर ट्रीटमेंट या किसी दवा के साइड इफेक्ट्स की वजह से।
पिट्यूटरी बीमारी की वजह से।
एंडेमिक गोइटर और फूड्स में आयोडीन की कमी होने की वजह से।
प्रेगनेंसी के दौरान 100 में से दो से तीन महिलाओं को हाशिमोटो नामक ऑटोइम्युन बीमारी होने का खतरा होता है, जिसकी वजह से महिला का इम्युन सिस्टम एंटीबॉडी का उत्पादन करती है जो आगे थायराइड ग्लैंड को प्रभावित करती हैं।
हाइपरथायरायडिज्म के कारण
ऑटो इम्यून सिस्टम खराब होने के कारण ग्रेव डिजीज की समस्या सामने आती है। यह बीमारी एक हजार प्रेगनेंट महिलाओं में से एक से चार को प्रभावित करती है। इस स्थिति में इम्युन सिस्टम एंटीबॉडी का निर्माण करता है जिसकी वजह से थायराइड ग्लैंड शरीर में जरूरत से ज्यादा मात्रा में हार्मोन्स का निर्माण करने लगती है।
थायराइड ग्लैंड में नोड्यूल्स बने होते हैं, जो थायराइड हार्मोन्स को प्रभावित करते हैं। थायराइड के प्रभावित होने की वजह से शरीर का रसायनिक संतुलन बिगड़ जाता है।
थायराइड में सूजन होने की वजह से ग्लैंड जरूरत से ज्यादा हार्मोन्स का निर्माण करने लगती है। इसके अलावा पिट्यूटरी ग्लैंड खराब होने और कैंसर सेल्स के विकसित होने की वजह से हार्मोन्स का प्रवाह भी तेज हो जाता है।
हाइपोथायरायडिज्म के लक्षण
टीएसएच का लेवल बढ़ना और टी4 का घटना।
चेहरे पर सूजन आना।
स्किन टाइट होना।
थकावट महसूस करना।
कमजोरी महसूस करना।
नब्ज का धीमा होना।
खाना समय पर हजम नहीं होना।
गैस और कब्ज की समस्या होना।
पेट खराब होना।
पेशाब में खराबी।
ठंड लगना।
मोटापा होना।
शरीर में तनाव और ऐंठन महसूस करना।
मन विचलित होना।
एक चीज में ध्यान न लगा पाना।
याददाश्त प्रभावित होना।
हाइपरथायरायडिज्म
थायराइड का लेवल बढ़ना।
थायराइड का साइज बढ़ना।
थकावट महसूस करना।
धड़कन तेज होना।
कम भूख लगना।
चक्कर आना।
उलटी आना।
ज्यादा पसीना होना।
नजर कमजोर होना।
ब्लड शुगर बढ़ना।
बचाव के उपाय
आहार में आयोडीन: आहार में आयोडीन से भरपूर आहार शामिल करें जैसे कि समुद्री फल, शकरकंदी, नमकीन मछली, आयोडीन कृत नमक आदि शामिल हैं। आयोडीन थायराइड हार्मोन उत्पादन के लिए आवश्यक होता है।
स्वस्थ आहार: आहार में साबुत अनाज, हरी सब्जियां, फल, दूध और दूध से बने उत्पाद, नट्स, बीज और पौष्टिक तेल शामिल करें।
नियमित व्यायाम: योग, प्राणायाम, व्यायाम और ध्यान जैसे नियमित शारीरिक गतिविधियों को अपनाएं। समुचित नींद, तनाव प्रबंधन, धूम्रपान और शराब का सेवन न करें।
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प्रो. भडाडा ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान की जाने वाली जांच से यह पता चल जाता है कि महिला को इसकी दवा देनी है या नहीं, अगर देनी है तो उसका कितना डोज देना है और वह डोज कितने समय तक दिया जाना है। इसके साथ इसका ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है कि अगर परिवार के किसी सदस्य को थायराइड हो तो इसकी जांच अवश्य कराएं। प्रो. भडाडा ने बताया कि मौजूदा समय में बांझपन की बढ़ती शिकायतों में भी थायराइड की भूमिका तेजी से बढ़ रही है इसलिए इलाज करने वाले डॉक्टर को भी थायराइड की जांच और इलाज को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
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प्रो. भडाडा का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान आयोडीन नमक का सेवन बेहद जरूरी माना जाता है।
थायराइड आप भी जाने
थायराइड गर्दन के निचले हिस्से में तितली के आकार जैसी बनी एक ग्रंथि यानी की ग्लैंड है, जो शरीर की हर कोशिका को प्रभावित और मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करने का काम करती है। आप दिन भर में जिन भी चीजों को खाते पीते हैं यह ग्लैंड उन्हें ऊर्जा में बदलती है। थायराइड शरीर के अंदर कई तरह के हार्मोन को बनाने और उनके स्राव को कंट्रोल करने का काम करती है। जब थायराइड ग्रंथि शरीर में जरूरत से ज्यादा या कम मात्रा में हार्मोन बनाती है तो थायराइड की समस्या सामने आती है। शरीर में जरूरत से ज्यादा या कम हार्मोन होने की वजह से शरीर ठीक तरह से काम नहीं करता है और आपको कई परेशानियां शुरू हो जाती हैं।
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दो है प्रकार
हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति में थायराइड शरीर के जरूरत से कम हार्मोन्स का निर्माण करती है और हायपरथायरायडिज्म की स्थिति में थायराइड शरीर के जरूरत से ज्यादा मात्रा में हार्मोन्स का निर्माण करती है। गर्भावस्था के दौरान इन दोनों थायराइड के होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं....
हाइपोथायरायडिज्म के कारण
थायराइड के खराब होने की वजह से यह ठीक तरह से काम करना बंद कर देता है।
किसी बीमारी के इलाज के दौरान थायराइड ग्लैंड को निकाल देने की वजह से।
लेजर ट्रीटमेंट या किसी दवा के साइड इफेक्ट्स की वजह से।
पिट्यूटरी बीमारी की वजह से।
एंडेमिक गोइटर और फूड्स में आयोडीन की कमी होने की वजह से।
प्रेगनेंसी के दौरान 100 में से दो से तीन महिलाओं को हाशिमोटो नामक ऑटोइम्युन बीमारी होने का खतरा होता है, जिसकी वजह से महिला का इम्युन सिस्टम एंटीबॉडी का उत्पादन करती है जो आगे थायराइड ग्लैंड को प्रभावित करती हैं।
हाइपरथायरायडिज्म के कारण
ऑटो इम्यून सिस्टम खराब होने के कारण ग्रेव डिजीज की समस्या सामने आती है। यह बीमारी एक हजार प्रेगनेंट महिलाओं में से एक से चार को प्रभावित करती है। इस स्थिति में इम्युन सिस्टम एंटीबॉडी का निर्माण करता है जिसकी वजह से थायराइड ग्लैंड शरीर में जरूरत से ज्यादा मात्रा में हार्मोन्स का निर्माण करने लगती है।
थायराइड ग्लैंड में नोड्यूल्स बने होते हैं, जो थायराइड हार्मोन्स को प्रभावित करते हैं। थायराइड के प्रभावित होने की वजह से शरीर का रसायनिक संतुलन बिगड़ जाता है।
थायराइड में सूजन होने की वजह से ग्लैंड जरूरत से ज्यादा हार्मोन्स का निर्माण करने लगती है। इसके अलावा पिट्यूटरी ग्लैंड खराब होने और कैंसर सेल्स के विकसित होने की वजह से हार्मोन्स का प्रवाह भी तेज हो जाता है।
हाइपोथायरायडिज्म के लक्षण
टीएसएच का लेवल बढ़ना और टी4 का घटना।
चेहरे पर सूजन आना।
स्किन टाइट होना।
थकावट महसूस करना।
कमजोरी महसूस करना।
नब्ज का धीमा होना।
खाना समय पर हजम नहीं होना।
गैस और कब्ज की समस्या होना।
पेट खराब होना।
पेशाब में खराबी।
ठंड लगना।
मोटापा होना।
शरीर में तनाव और ऐंठन महसूस करना।
मन विचलित होना।
एक चीज में ध्यान न लगा पाना।
याददाश्त प्रभावित होना।
हाइपरथायरायडिज्म
थायराइड का लेवल बढ़ना।
थायराइड का साइज बढ़ना।
थकावट महसूस करना।
धड़कन तेज होना।
कम भूख लगना।
चक्कर आना।
उलटी आना।
ज्यादा पसीना होना।
नजर कमजोर होना।
ब्लड शुगर बढ़ना।
बचाव के उपाय
आहार में आयोडीन: आहार में आयोडीन से भरपूर आहार शामिल करें जैसे कि समुद्री फल, शकरकंदी, नमकीन मछली, आयोडीन कृत नमक आदि शामिल हैं। आयोडीन थायराइड हार्मोन उत्पादन के लिए आवश्यक होता है।
स्वस्थ आहार: आहार में साबुत अनाज, हरी सब्जियां, फल, दूध और दूध से बने उत्पाद, नट्स, बीज और पौष्टिक तेल शामिल करें।
नियमित व्यायाम: योग, प्राणायाम, व्यायाम और ध्यान जैसे नियमित शारीरिक गतिविधियों को अपनाएं। समुचित नींद, तनाव प्रबंधन, धूम्रपान और शराब का सेवन न करें।