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विश्व हिन्दी दिवस: ‘लोगों के दिल में राज करना है तो हिन्दी सीखें’
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Wed, 14 Sep 2016 10:00 PM IST
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विश्व हिन्दी दिवस
- फोटो : डेमो फोटो
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आज हिन्दी दिवस है। इस मौके पर आप सभी के लिए एक नसीहत, ये कि अगर लोगों के दिल में राज करना है तो हिन्दी सीखें। हिन्दी हमारी मातृभाषा है। निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटे न हिय को सूल॥ भारतेंदु हरिश्चंद्र की यह कविता जहां मातृभाषा के महत्व को दर्शाती है, वहीं उसे सारी उन्नतियों का मूल आधार भी बताती है।
वर्तमान समय की बात की जाए तो आज आम आदमी के अलावा सोशल मीडिया में भी हिंदी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। आज का युवा वर्ग भी इससे जुड़ा हुआ है, जो सराहनीय है। सिटी ब्यूटीफुल में कई ऐसे लोग हैं, जिन्हें हिंदी भाषा ने पहचान दिलाई है। 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस के मौके पर सिटी ब्यूटीफुल के कुछ ऐसे लोगों से बातचीत की गई, जिन्होंने हिंदी के क्षेत्र में मुकाम हासिल की है। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश।
हिंदी में है अपनापन
अगर आप खाने-पीने और पहनने केे शौकीन हैं तो अंग्रेजी सीखें। यदि विद्वान बनना चाहते हैं तो संस्कृत सीखें और अगर लोगों के दिल में राज करना है तो हिंदी सीखें। यह कहना है पंजाब यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के रिसर्च स्कॉलर अनिल कुमार का। वह बताते हैं कि जितना अपनापन हिंदी भाषा में है, शायद उतना किसी अन्य में नहीं। हिंदी में दिए गए भाषण का जनसमूह पर प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। अनिल कुमार 2007 से हिंदी भाषा में ब्लॉग भी लिख रहे हैं।
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- अनिल कुमार (पीएचडी स्टूडेंट), पंजाब यूनिवर्सिटी
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वर्तमान समय की बात की जाए तो आज आम आदमी के अलावा सोशल मीडिया में भी हिंदी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। आज का युवा वर्ग भी इससे जुड़ा हुआ है, जो सराहनीय है। सिटी ब्यूटीफुल में कई ऐसे लोग हैं, जिन्हें हिंदी भाषा ने पहचान दिलाई है। 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस के मौके पर सिटी ब्यूटीफुल के कुछ ऐसे लोगों से बातचीत की गई, जिन्होंने हिंदी के क्षेत्र में मुकाम हासिल की है। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश।
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हिंदी में है अपनापन
अगर आप खाने-पीने और पहनने केे शौकीन हैं तो अंग्रेजी सीखें। यदि विद्वान बनना चाहते हैं तो संस्कृत सीखें और अगर लोगों के दिल में राज करना है तो हिंदी सीखें। यह कहना है पंजाब यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के रिसर्च स्कॉलर अनिल कुमार का। वह बताते हैं कि जितना अपनापन हिंदी भाषा में है, शायद उतना किसी अन्य में नहीं। हिंदी में दिए गए भाषण का जनसमूह पर प्रभाव सबसे ज्यादा होता है। अनिल कुमार 2007 से हिंदी भाषा में ब्लॉग भी लिख रहे हैं।
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- अनिल कुमार (पीएचडी स्टूडेंट), पंजाब यूनिवर्सिटी
पैरेंट्स को देना चाहिए ध्यान : भानू पंडिता
विश्व हिन्दी दिवस
- फोटो : डेमो फोटो
52 वर्षीय भानू पंडिता 30 वर्षों से ऑल इंडिया रेडियो में उद्घोषिका हैं। वर्तमान में युवाओं का हिंदी के प्रति कितना लगाव है, इस पर बात करते हुए वह बताती हैं कि बच्चे के होश में आते ही उनके मां-बाप उन्हें वन टू सिखाना शुरू कर देते हैं। इसमें बच्चों का दोष नहीं है कि उनका हिंदी का उच्चारण सहीं नहीं होता या वो हिंदी का प्रयोग कम करते हैं। पैरेंट्स को चाहिए कि वो बच्चों को आम बोल चाल की भाषा से जोड़ें, क्योंकि अंग्रेजी तो बच्चा स्कूल में जाकर भी सीख लेता है।
- भानू पंडिता, सेक्टर-22, उद्घोषिका, ऑल इंडिया रेडियो, चंडीगढ़
हिंदी ही मेरी पहचान : अशोक कुमार
पंजाब यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के चेयरपर्सन अशोक कुमार 11 वर्षों से हिंदी पढ़ा रहे हैं। वह बताते हैं कि हिंदी से ही मेरी पहचान है। हम सबको अपनी राष्ट्रीय भाषा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए। भले ही आज अंग्रेजी भाषा संपर्क की भाषा है, लेकिन जिस तरह हिंदी का प्रसार बढ़ रहा है, वह दिन दूर नहीं जब हिंदी को भी वैश्विक स्तर भी पहचान मिलेगी।
- डॉक्टर अशोक कुमार, सेक्टर-14
सभा में हिंदी में भाषण देकर बनाई पहचान : सूद
डॉक्टर सुनंदन सूद ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह के चंडीगढ़ आगमन पर समाप्ति भाषण हिंदी में देकर वहां मौजूद लोगों की खूब तालियां बटोरी थीं। उन्होंने अपने भाषण में मंत्रियों से लेकर वहां मौजूद सभी लोगों के विभागों का नाम भी हिंदी में लिया था। वह बताते हैं कि हिंदी समाचार पत्र पढ़ने के साथ-साथ हिंदी पत्रिका भी पढ़ता हूं।
- डॉक्टर सुनंदन सूद, सेक्टर-32
- भानू पंडिता, सेक्टर-22, उद्घोषिका, ऑल इंडिया रेडियो, चंडीगढ़
हिंदी ही मेरी पहचान : अशोक कुमार
पंजाब यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के चेयरपर्सन अशोक कुमार 11 वर्षों से हिंदी पढ़ा रहे हैं। वह बताते हैं कि हिंदी से ही मेरी पहचान है। हम सबको अपनी राष्ट्रीय भाषा के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए। भले ही आज अंग्रेजी भाषा संपर्क की भाषा है, लेकिन जिस तरह हिंदी का प्रसार बढ़ रहा है, वह दिन दूर नहीं जब हिंदी को भी वैश्विक स्तर भी पहचान मिलेगी।
- डॉक्टर अशोक कुमार, सेक्टर-14
सभा में हिंदी में भाषण देकर बनाई पहचान : सूद
डॉक्टर सुनंदन सूद ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह के चंडीगढ़ आगमन पर समाप्ति भाषण हिंदी में देकर वहां मौजूद लोगों की खूब तालियां बटोरी थीं। उन्होंने अपने भाषण में मंत्रियों से लेकर वहां मौजूद सभी लोगों के विभागों का नाम भी हिंदी में लिया था। वह बताते हैं कि हिंदी समाचार पत्र पढ़ने के साथ-साथ हिंदी पत्रिका भी पढ़ता हूं।
- डॉक्टर सुनंदन सूद, सेक्टर-32
आसानी से बयां कर पाती हूं विचारों को: जिज्ञासा
hindi
- फोटो : hindi
दसवीं क्लास की जिज्ञासा सात साल की उम्र से ही कविता लिख रही है। इसके अलावा वह स्कूल में मंचित होने वाले नाटकों की स्क्रिप्ट भी लिखती है। वह बताती है कि हिंदी एक ऐसी भाषा है, जिसमें मैं अपनी भावनाओं, विचारों और घटनाओं को कविता के रूप में आसानी से बयां कर पाती हूं।
- जिज्ञासा, सेक्टर-15
हिंदी का बढ़ रहा प्रसार: आहलुवालिया
80 वर्षीय कैलाश आहलुवालिया 46 वर्षों से हिंदी में कविताएं और कहानी लिख रहे हैं। वह बताते हैं कि हिंदी भाषा भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। देश में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा के अखबार और न्यूज चैनल हैं। इससे यह भी पता चलता है कि आज भी हिंदी का प्रसार बढ़ रहा है।
- कैलाश आहलुवालिया, सेक्टर-22
हिंदी को हम सही ढंग से पढ़ ही नहीं रहे: पुनीता
पुनीता 10 वर्षों से हिंदी में एंकरिंग कर रही हैं। वह बताती हैं कि हिंदी से मेरा रिश्ता बचपन से है और मैंने हिंदी के कई साहित्यकारों को भी पढ़ा है। लेकिन दुख इस बात की है कि आज की युवा पीढ़ी इस भाषा से दूर होती जा रही है। हिंदी का स्तर कम नहीं हुआ है और न ही कभी होगा, पर यह बात अलग है कि हम उससे पीछे हैं। हिंदी को हम सही ढंग से पढ़ ही नहीं पा रहे हैं।
- पुनीता बावा, एंकर, सेक्टर-16
- जिज्ञासा, सेक्टर-15
हिंदी का बढ़ रहा प्रसार: आहलुवालिया
80 वर्षीय कैलाश आहलुवालिया 46 वर्षों से हिंदी में कविताएं और कहानी लिख रहे हैं। वह बताते हैं कि हिंदी भाषा भावनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। देश में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा के अखबार और न्यूज चैनल हैं। इससे यह भी पता चलता है कि आज भी हिंदी का प्रसार बढ़ रहा है।
- कैलाश आहलुवालिया, सेक्टर-22
हिंदी को हम सही ढंग से पढ़ ही नहीं रहे: पुनीता
पुनीता 10 वर्षों से हिंदी में एंकरिंग कर रही हैं। वह बताती हैं कि हिंदी से मेरा रिश्ता बचपन से है और मैंने हिंदी के कई साहित्यकारों को भी पढ़ा है। लेकिन दुख इस बात की है कि आज की युवा पीढ़ी इस भाषा से दूर होती जा रही है। हिंदी का स्तर कम नहीं हुआ है और न ही कभी होगा, पर यह बात अलग है कि हम उससे पीछे हैं। हिंदी को हम सही ढंग से पढ़ ही नहीं पा रहे हैं।
- पुनीता बावा, एंकर, सेक्टर-16