{"_id":"6377e5cbc7b25267e450eded","slug":"with-the-help-of-medicine-and-technology-the-path-of-patients-will-be-easier-m-srinivasan-chandigarh-news-pkl468724660","type":"story","status":"publish","title_hn":"चिकित्सा और प्रोद्यौगिकी का साथ मरीजों की राह करेगा आसान- एम श्रीनिवासन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चिकित्सा और प्रोद्यौगिकी का साथ मरीजों की राह करेगा आसान- एम श्रीनिवासन
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चंडीगढ़। चिकित्सा और प्रौद्योगिकी का साथ भविष्य की राह आसान करेगा। पीजीआई जैसे संस्थान में कम संसाधन, मरीजों के दबाव और वैज्ञानिकों के बिना शोध के क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन वाकई सराहनीय है। ये बातें दिल्ली एम्स के निदेशक प्रो. एम श्रीनिवासन ने शुक्रवार को पीजीआई में आयोजित 9वें वार्षिक शोध दिवस पर बतौर मुख्य अतिथि कहीं। इसमें पीजीआई में आविष्कार के लिए 9 और शोध के लिए 37 विशेषज्ञों को सम्मानित किया गया। इस दौरान 500 से अधिक शोध पत्रों का प्रदर्शन किया गया।
प्रो. श्रीनिवासन ने कहा कि अनुसंधान की दिशा में यह प्रयास चिकित्सा और इंजीनियरिंग के बीच विलय लाने की दिशा में एक कदम आगे है, जो सराहनीय है क्योंकि हमने भारत में इन प्रयासों को ज्यादा नहीं देखा है। सहयोग की दिशा में प्रयास करने में दूरदर्शी होने के लिए पीजीआई की सराहना करते हुए प्रो. श्रीनिवासन ने कहा कि कम संसाधनों के साथ, वैज्ञानिकों के बिना और भारी काम के बोझ के बावजूद जिस तरह का शोध प्रदर्शित किया जा रहा है, वह सराहनीय है। यह अच्छी बात है कि अतीत और वर्तमान के दिग्गजों ने इस संस्थान को नैदानिक और अनुसंधान अनुभव के इस स्तर पर ला दिया है, जिससे शोध के परिणाम में गुणवत्ता और मानक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
हम तैयार हैं आप शोध के लिए आगे आइए
रॉयल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से अनुदान के अवसरों पर बोलते हुए रॉयल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन, लंदन की सीईओ तामार घोष ने संगठन की पहल के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं को अपने संगठन के साथ वित्त पोषण के लिए आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया। कहा, चाहे अनुसंधान परियोजना एक प्रयोगशाला में हो, समुदायों के साथ एक क्षेत्र-आधारित परियोजना हो या नीति-आधारित परियोजना, जो भी हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रोग क्षेत्र क्या है, यह स्वास्थ्य के क्षेत्र में है। मुद्दा यह है कि हम नए शोधकर्ताओं और नए नवोन्मेषकों को प्रोत्साहित करना चाहते हैं कि वे अपनी पहली परियोजनाओं को पहली बार पूरा करें। वहीं आईआईटी रोपड़ के निदेशक प्रो. राजीव आहूजा ने कहा कि शोध के क्षेत्र में अभी काफी काम होना बाकी है। उन्होंने पीजीआई और अपने संस्थान के बीच शोध के लिए हुए एमओयू पर भी बात की। इससे पहले पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि उनकी नजर में उपकरण से ज्यादा कमिटमेंट महत्वपूर्ण है।
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इनके शोध और अविष्कार रहे विशेष
डॉ. राकेश सहगल : पीजीआई के डीन एकेडमिक ने कालाजार से बचाव के लिए टीका इजाद कर यह सम्मान प्राप्त किया है। उन्होंने अपने शोध के जरिए कालाजार के नए स्ट्रेन का पता लगाकर उसे टीके रूप में चूहे पर प्रयोग किया। इसमें इस बीमारी से बचाव के लिए सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। बता दें कि अब तक विश्व में कालाजार से बचाव के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है। मरीजों को इलाज के दौरान इंजेक्शन और गोली दी जाती है। डॉ. सहगल के इस आविष्कार का पेटेंट हो गया है।
डॉ. रविंदरा खैवाल : पीजीआई सामुदायिक चिकित्सा विभाग के डॉ. रविंदरा खैवाल ने चंडीगढ़ के पानी की शुद्धता की जांच कर यह बताया है कि वह मानक के अनुसार शुद्ध है। इस शोध के लिए डॉ. रविंदरा ने शहर के अलग-अलग क्षेत्रों से पानी के 80 नमूने लिए। इसमें हैंडपंप और ट्यूबवेल से लिया गया नमूना भी शामिल था। शोध में पता चला कि हैंडपंप के पानी की गुणवत्ता कुछ कम है, लेकिन राहत की बात यह रही कि उससे पीने के पानी की आपूर्ति नहीं होती। पंजाब में दूषित जलापूर्ति के कारण बढ़ रही बीमारियों को ध्यान में रखते हुए चंडीगढ़ की स्थिति का आकलन करने के लिए यह शोध किया गया था।
डॉ. सुचेत सचदेव : ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के डॉ. सुचेत सचदेव ने रक्तदाताओं की परेशानी को दूर करने के लिए ब्लड काउच में प्रयोग कर विशेष आविष्कार किया है। रक्तदान के दौरान सिर की तरफ ऑक्सीजन की आपूर्ति कम होने से रक्तदाता को आने वाले चक्कर को दूर करने के लिए डॉ. सुचेत ने ब्लड काउच में एक मसाजर डाला है। जो पिंडियों की मसाज करेगा, जिससे ऑक्सीजन की आपूर्ति सामान्य होगी। वहीं जब सुई लगाई जाती है तब रक्तदाता का ध्यान पंप पर जाता है, जिससे सुई की तरफ ध्यान नहीं जाएगा। इसे 2016 में फाइल किया गया था। अब पेटेंट मिल गया है।
डॉ. शिप्रा : दंतरोग विभाग की डॉ. शिप्रा ने कोविड के दौरान मसूड़ों में बीमारी वाले मरीजों पर शोध कर यह बात सामने लाई कि ऐसे लोगों में संक्रमण होने पर उसकी गंभीरता सामान्य की तुलना में काफी ज्यादा होती है। इसके लिए डॉ. शिप्रा ने कोविड की पहली और दूसरी लहर के दौरान पीजीआई में भर्ती व ओपीडी के मरीजों पर शोध किया। जिसमें पता चला कि जिन्हें मसूड़ों की बीमारी थी वैसे कोरोना संक्रमित मरीजों में सामान्य मरीजों की तुलना में आईसीयू में भर्ती होने व मौत का खतरा ज्यादा था।
इनके शोध को मिला सम्मान
डॉ. राकेश सहगल (मेडिकल पैरासिटोलॉजी), डॉ. जोसेफ एल मैथ्यू (पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी), डॉ. ऊषा दत्ता (गैस्ट्रोएंटरोलॉजी), डॉ. सुचेत सचदेव (ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन), डॉ. तूलिका गुप्ता (एनाटॉमी), डॉ. मर्यादा शर्मा (ईएनटी), डॉ. शामिल हैं। कार्तिगेयन एम (न्यूरो सर्जरी), डॉ. सुनील कुमार बिजारानिया (एनेस्थीसिया) और गुंजन गोयल (मेडिकल पैरासिटोलॉजी) को उनके आविष्कार के लिए पुरस्कार मिला, जबकि असिस्टेंट प्रोफेसर की श्रेणी में (मेडिसिन- रिमेश पाल, वल्लियप्पन मुथु, अर्का डे; सर्जरी- शिप्रा गुप्ता, वेंकट गणेश, आकृति गुप्ता; बेसिक साइंस- कमल किशोर, मंजू ढंडापानी, राकेश यादव), एसोसिएट प्रोफेसर की श्रेणी में तीन सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित शोध पत्र (मेडिसिन- विशाल शर्मा, आशु रस्तोगी, कृष्ण कुमार; सर्जरी- नितिका गोयल, मंजुल त्रिपाठी, आदित्य प्रकाश शर्मा; बेसिक साइंस- अमोल पाटिल, आशीष कक्कड़, परीक्षा गुप्ता) एडिशनल प्रोफेसर (जया शुक्ला), और प्रोफेसर (मेडिसिन- रितेश अग्रवाल) इस समारोह में रविंदरा खैवाल, शंकर प्रिंजा; सर्जरी- विशाली गुप्ता, शालिनी गेंदर, प्रवीण सालुंके; बुनियादी विज्ञान- बिकास मेधी, अनूप घोष, शाल्मोली भट्टाचार्य) ने पुरस्कार प्राप्त किया। नवीन एम, चंद्रिमा नस्कर को रेजिडेंट ग्रुप में पुरस्कार मिला; पूल अधिकारी श्रेणी में श्वेता और सुबोध कुमार/पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो श्रेणी में पीएचडी श्रेणी में मनीषा प्रजापत और निशांत शेखर, जबकि विविध श्रेणी में सिनु जोस, गुंजन गोयल और गीतांजलि कल्याण ने पुरस्कार प्राप्त किए।
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प्रो. श्रीनिवासन ने कहा कि अनुसंधान की दिशा में यह प्रयास चिकित्सा और इंजीनियरिंग के बीच विलय लाने की दिशा में एक कदम आगे है, जो सराहनीय है क्योंकि हमने भारत में इन प्रयासों को ज्यादा नहीं देखा है। सहयोग की दिशा में प्रयास करने में दूरदर्शी होने के लिए पीजीआई की सराहना करते हुए प्रो. श्रीनिवासन ने कहा कि कम संसाधनों के साथ, वैज्ञानिकों के बिना और भारी काम के बोझ के बावजूद जिस तरह का शोध प्रदर्शित किया जा रहा है, वह सराहनीय है। यह अच्छी बात है कि अतीत और वर्तमान के दिग्गजों ने इस संस्थान को नैदानिक और अनुसंधान अनुभव के इस स्तर पर ला दिया है, जिससे शोध के परिणाम में गुणवत्ता और मानक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
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हम तैयार हैं आप शोध के लिए आगे आइए
रॉयल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन से अनुदान के अवसरों पर बोलते हुए रॉयल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन, लंदन की सीईओ तामार घोष ने संगठन की पहल के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं को अपने संगठन के साथ वित्त पोषण के लिए आवेदन करने के लिए प्रोत्साहित किया। कहा, चाहे अनुसंधान परियोजना एक प्रयोगशाला में हो, समुदायों के साथ एक क्षेत्र-आधारित परियोजना हो या नीति-आधारित परियोजना, जो भी हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रोग क्षेत्र क्या है, यह स्वास्थ्य के क्षेत्र में है। मुद्दा यह है कि हम नए शोधकर्ताओं और नए नवोन्मेषकों को प्रोत्साहित करना चाहते हैं कि वे अपनी पहली परियोजनाओं को पहली बार पूरा करें। वहीं आईआईटी रोपड़ के निदेशक प्रो. राजीव आहूजा ने कहा कि शोध के क्षेत्र में अभी काफी काम होना बाकी है। उन्होंने पीजीआई और अपने संस्थान के बीच शोध के लिए हुए एमओयू पर भी बात की। इससे पहले पीजीआई निदेशक प्रो. विवेक लाल ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि उनकी नजर में उपकरण से ज्यादा कमिटमेंट महत्वपूर्ण है।
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इनके शोध और अविष्कार रहे विशेष
डॉ. राकेश सहगल : पीजीआई के डीन एकेडमिक ने कालाजार से बचाव के लिए टीका इजाद कर यह सम्मान प्राप्त किया है। उन्होंने अपने शोध के जरिए कालाजार के नए स्ट्रेन का पता लगाकर उसे टीके रूप में चूहे पर प्रयोग किया। इसमें इस बीमारी से बचाव के लिए सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। बता दें कि अब तक विश्व में कालाजार से बचाव के लिए कोई टीका उपलब्ध नहीं है। मरीजों को इलाज के दौरान इंजेक्शन और गोली दी जाती है। डॉ. सहगल के इस आविष्कार का पेटेंट हो गया है।
डॉ. रविंदरा खैवाल : पीजीआई सामुदायिक चिकित्सा विभाग के डॉ. रविंदरा खैवाल ने चंडीगढ़ के पानी की शुद्धता की जांच कर यह बताया है कि वह मानक के अनुसार शुद्ध है। इस शोध के लिए डॉ. रविंदरा ने शहर के अलग-अलग क्षेत्रों से पानी के 80 नमूने लिए। इसमें हैंडपंप और ट्यूबवेल से लिया गया नमूना भी शामिल था। शोध में पता चला कि हैंडपंप के पानी की गुणवत्ता कुछ कम है, लेकिन राहत की बात यह रही कि उससे पीने के पानी की आपूर्ति नहीं होती। पंजाब में दूषित जलापूर्ति के कारण बढ़ रही बीमारियों को ध्यान में रखते हुए चंडीगढ़ की स्थिति का आकलन करने के लिए यह शोध किया गया था।
डॉ. सुचेत सचदेव : ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन के डॉ. सुचेत सचदेव ने रक्तदाताओं की परेशानी को दूर करने के लिए ब्लड काउच में प्रयोग कर विशेष आविष्कार किया है। रक्तदान के दौरान सिर की तरफ ऑक्सीजन की आपूर्ति कम होने से रक्तदाता को आने वाले चक्कर को दूर करने के लिए डॉ. सुचेत ने ब्लड काउच में एक मसाजर डाला है। जो पिंडियों की मसाज करेगा, जिससे ऑक्सीजन की आपूर्ति सामान्य होगी। वहीं जब सुई लगाई जाती है तब रक्तदाता का ध्यान पंप पर जाता है, जिससे सुई की तरफ ध्यान नहीं जाएगा। इसे 2016 में फाइल किया गया था। अब पेटेंट मिल गया है।
डॉ. शिप्रा : दंतरोग विभाग की डॉ. शिप्रा ने कोविड के दौरान मसूड़ों में बीमारी वाले मरीजों पर शोध कर यह बात सामने लाई कि ऐसे लोगों में संक्रमण होने पर उसकी गंभीरता सामान्य की तुलना में काफी ज्यादा होती है। इसके लिए डॉ. शिप्रा ने कोविड की पहली और दूसरी लहर के दौरान पीजीआई में भर्ती व ओपीडी के मरीजों पर शोध किया। जिसमें पता चला कि जिन्हें मसूड़ों की बीमारी थी वैसे कोरोना संक्रमित मरीजों में सामान्य मरीजों की तुलना में आईसीयू में भर्ती होने व मौत का खतरा ज्यादा था।
इनके शोध को मिला सम्मान
डॉ. राकेश सहगल (मेडिकल पैरासिटोलॉजी), डॉ. जोसेफ एल मैथ्यू (पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी), डॉ. ऊषा दत्ता (गैस्ट्रोएंटरोलॉजी), डॉ. सुचेत सचदेव (ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन), डॉ. तूलिका गुप्ता (एनाटॉमी), डॉ. मर्यादा शर्मा (ईएनटी), डॉ. शामिल हैं। कार्तिगेयन एम (न्यूरो सर्जरी), डॉ. सुनील कुमार बिजारानिया (एनेस्थीसिया) और गुंजन गोयल (मेडिकल पैरासिटोलॉजी) को उनके आविष्कार के लिए पुरस्कार मिला, जबकि असिस्टेंट प्रोफेसर की श्रेणी में (मेडिसिन- रिमेश पाल, वल्लियप्पन मुथु, अर्का डे; सर्जरी- शिप्रा गुप्ता, वेंकट गणेश, आकृति गुप्ता; बेसिक साइंस- कमल किशोर, मंजू ढंडापानी, राकेश यादव), एसोसिएट प्रोफेसर की श्रेणी में तीन सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित शोध पत्र (मेडिसिन- विशाल शर्मा, आशु रस्तोगी, कृष्ण कुमार; सर्जरी- नितिका गोयल, मंजुल त्रिपाठी, आदित्य प्रकाश शर्मा; बेसिक साइंस- अमोल पाटिल, आशीष कक्कड़, परीक्षा गुप्ता) एडिशनल प्रोफेसर (जया शुक्ला), और प्रोफेसर (मेडिसिन- रितेश अग्रवाल) इस समारोह में रविंदरा खैवाल, शंकर प्रिंजा; सर्जरी- विशाली गुप्ता, शालिनी गेंदर, प्रवीण सालुंके; बुनियादी विज्ञान- बिकास मेधी, अनूप घोष, शाल्मोली भट्टाचार्य) ने पुरस्कार प्राप्त किया। नवीन एम, चंद्रिमा नस्कर को रेजिडेंट ग्रुप में पुरस्कार मिला; पूल अधिकारी श्रेणी में श्वेता और सुबोध कुमार/पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो श्रेणी में पीएचडी श्रेणी में मनीषा प्रजापत और निशांत शेखर, जबकि विविध श्रेणी में सिनु जोस, गुंजन गोयल और गीतांजलि कल्याण ने पुरस्कार प्राप्त किए।