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Satish Kaushik: 2010 में पैतृक गांव को लिया गोद...फिर बदल दी तस्वीर, हर घर में बसी सतीश कौशिक की यादें

Thu, 09 Mar 2023 06:39 PM IST
ajay kumar मनोज सिंह/इंद्रजीत शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/कनीना (हरियाणा)
मनोज सिंह/इंद्रजीत शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/कनीना (हरियाणा) Published by: ajay kumar Updated Thu, 09 Mar 2023 06:39 PM IST
सार

सतीश कौशिक ने शुरू से ही गांव में विकास कराने के साथ लोगों को आगे बढ़ाने का काम किया। वर्ष 2010 में उन्होंने गांव धनौंदा को गोद ले लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मुलाकात कर गांव के विकास के लिए 1.50 करोड़ रुपये का बजट भी दिलाया। हर वर्ष फुटबाल प्रतियोगिता के लिए उनकी ओर से 41 हजार रुपये की राशि निर्धारित थी।

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Wave of mourning in native village due to death of Satish Kaushik
सतीश कौशिक के गांव में आने पर स्वागत करते ग्रामीण। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

बॉलीवुड के प्रसिद्ध अभिनेता और निर्देशक सतीश कौशिक का जन्म भले ही दिल्ली में हुआ था लेकिन उनका मन अपने पैतृक गांव कनीला खंड के धनौंदा गांव में बसता था। बचपन में गर्मी की छुट्टियों में गांव आने को उन्होंने परंपरा बना लिया और इसे वह उम्रभर निभाते रहे। इसीलिए इस गांव के हर घर में उनके दोस्त हैं और हर परिवार में चाहने वाले। सबके पास सतीश कौशिक को उनकी पसंद का कुछ खिलाने का किस्सा है तो हर शख्स के पास उनकी सबको हंसाने की कला से जुड़ी यादें हैं। गुरुवार को जैसे ही सतीश कौशिक के निधन की खबर गांव आई, हर चेहरे पर उदासी छा गई।

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मुंबई में काम की व्यस्तता के बावजूद सतीश कौशिक वर्ष में दो-तीन बार अपने गांव जरूर आते थे। इस दौरान वह अपने बचपन के मित्र राजेंद्र सिंह नंबरदार, ठाकुर अतरलाल, सूबेदार सूरत सिंह, सतपाल सिंह, पूर्व सरपंच मुकेश, घनश्याम पंच व सुनील पंच के साथ खूब वक्त बिताते थे। सर्दियों के दिनों में वह मित्रों के घर में सरसों का साग, खाटे की सब्जी, मक्खन व बाजरे की रोटी खाना पसंद करते थे। गर्मी के दिनों में छाछ-राबड़ी, मिर्ची एवं लहसुन की चटनी तो वह आदेश देकर बनवाते थे। खास बात यह थी कि किसी कार्यक्रम में जब भी खाने का जिक्र होता था तो वह हरियाणा के अपने गांव के इन परंपरागत पकवानों का वह जिक्र जरूर करते थे।
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पिता ने डाली थी गांव से जुड़े रहने की परंपरा
सतीश कौशिक के पिता बनवारीलाल और ताया गोवर्धनलाल थे। वर्ष 1945-46 में गोवर्धनलाल की रेलवे में नौकरी लग गई और श्रीगंगानगर में तैनाती मिली। गोवर्धनलाल ने अपने छोटे भाई बनवारीलाल को भी अपने पास बुला लिया। कुछ समय बनवारीलाल ने वहां कार्य किया। बाद में साल 1960 में बनवारीलाल ने दिल्ली में एक ताला कंपनी की एजेंसी लेकर कारोबार शुरू कर दिया। बनवारीलाल की छह संतानों में सबसे छोटे थे सतीश कौशिक। तीन भाई में सबसे बड़े ब्रह्मदत्त कौशिक, दूसरे नंबर पर अशोक कौशिक व तीसरे पर सतीश कौशिक थे। वहीं तीन बहनों में सरस्वती, शकुंतला व सरिता हैं। दिल्ली में होने के बावजूद बनवारीलाल अपने गांव से जुड़े रहे। इस वजह से सतीश कौशिक भी परिवार के साथ गर्मियों के दिनों में दो माह की छुट्टी बिताने गांव आते थे। 

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गांव को संवारने का उठाया बीड़ा
सतीश कौशिक ने शुरू से ही गांव में विकास कराने के साथ लोगों को आगे बढ़ाने का काम किया। वर्ष 2010 में उन्होंने गांव धनौंदा को गोद ले लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मुलाकात कर गांव के विकास के लिए 1.50 करोड़ रुपये का बजट भी दिलाया। हर वर्ष फुटबाल प्रतियोगिता के लिए उनकी ओर से 41 हजार रुपये की राशि निर्धारित थी। अगर उनके पास आने का समय नहीं होता था तब भी यह राशि खेल कमेटी के पास पहुंचाते थे। साथ ही गांव के जोहड़ का नवीनीकरण, खेल स्टेडियम की चहारदीवारी, गांव की गलियों के निर्माण में मुख्य भूमिका रही।

बाबा दयाल मंदिर में कराते थे भंडारा
सतीश कौशिक का गांव के बाबा दयाल के मंदिर से बचपन से ही जुड़ाव रहा था। साल में एक बार वह परिवार सहित मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते थे और भंडारे का आयोजन कराते थे। उन्होंने गांव में राधा-कृष्ण की मूर्ति की स्थापना कराई थी।

गिल्ली-डंडा और झूना-डंकी से था लगाव
बचपन से ही जब भी सतीश कौशिक गांव आते थे तो अपने दोस्तों के साथ बणी में कड़ी धूप में जाल के पेड़ों पर पील खाने जरूर जाते थे। साथ ही परंपरागत खेल गिल्ली-डंडा और झूना-डंकी (क्षेत्र का एक प्राचीन खेल) आदि से उनका बड़ा लगाव रहा। अपने मित्रों के साथ गांव की बणी व जोहड़ों में वक्त बिताते थे। अपने खास मित्रों से वह लगातार फोन के माध्यम से जुड़े रहते थे।

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