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जज्बे को सलामः 9वीं पास थे लेकिन बन गए प्रोफेसर, नहीं छोड़ी लेखनी और लिख दीं 33 पुस्तकें
Mon, 03 Feb 2020 03:34 PM IST
पंचकुला ब्यूरो
अमर उजाला, चंडीगढ़
अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: पंचकुला ब्यूरो
Updated Mon, 03 Feb 2020 03:34 PM IST
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किरपाल कजाक
- फोटो : अमर उजाला
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चंडीगढ़ सेक्टर 23 बाल भवन के प्रांगण में हो रहे थियेटर फॉर थियेटर द्वारा आयोजित विंटर नेशनल थियेटर फेस्टिवल के पांचवें दिन का रूबरू के दौरान अनुभवी लेखक और 2019 के साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किरपाल कजाक ने युवा रंगकर्मियों के साथ अपने अनुभव साझा किए।
77 वर्षीय कहानीकार प्रोफेसर किरपाल कजाक पाकिस्तान के शेखूपुरा में साल 1943 में एक गरीब परिवार में जन्मे और बंटवारे के बाद उनका परिवार पटियाला आ गया। अरबी और फारसी के अच्छे ज्ञाता उनके पिता राज मिस्त्री का काम करते थे।
उन्होंने किरपाल से भी वही करने को कहा, लेकिन उनका मन इस काम में नहीं लगा। वह घर से भाग गए। उन्होंने सिर्फ नौवीं तक पढ़ाई की। घर से भागने बाद वह जेबकतरों की संगत में पड़ गए। इस वजह से वह मुंबई से लेकर आगरा तक गए। इस दौरान वह घर वालों के संपर्क में थे, पर घर बहुत कम आते थे।
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यह सिलसिला करीब 10 साल चला। उनके अनुसार उन्होंने गरीबी को इंसानी रिश्तों पर हावी होते देखा है। जीवन के ऐसे ही पक्षों को करीब से देखने के कारण हुए ऐसे अनेकों अनुभवों को वह निरंतर कॉपी पर लिखते रहते रहे। उनकी लिखी ऐसी ही एक कहानी ट्रेन में खो कर एक प्रसिद्ध लेखक के पास पहुंची तो उस लेखक ने उनके पिता को पत्र लिखकर उनके बेटे की अभूतपूर्व प्रतिभा का एहसास करवाया।
वर्ष 1970 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई ऐसे में उनको कारपेंटरी से लेकर मजदूरी जैसे काम करने पड़ा। उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। एक बार वह अमृता प्रीतम से मिले और उनकी सलाह पर उन्होंने इन लेखों को किताबों में ढालना शुरू किया। उनकी सलाह का नतीजा था कि कजाक की अभूतपूर्व रचनाएं सबके सामने आई।
पटियाला की प्रसिद्ध पंजाबी यूनिवर्सिटी में चतुर्थ श्रेणी के रूप में भर्ती हुए कजाक ने वहां भी निरंतर अपना लिखना जारी रखा। उनकी प्रतिभा को देखते हुए नौवीं पास किरपाल कजाक को पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला ने प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। उनकी मेहनत का फल है कि किसी ज़माने में यूनिवर्सिटी की ‘खोज’ पत्रिका में लिखने वाले किरपाल आगे चल कर उसी पत्रिका के संपादक बने।
33 से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके किरपाल ने कहा कि सिर्फ किताबें-कॉपियों से पढ़ाई नहीं होती। जिंदगी जो सिखाती है या तजुर्बे देती है, उससे बड़ी पढाई कोई नहीं है। एक वक्त पर बेहद गरीबी में दिन गुजारने वाले किरपाल युवाओं को सलाह देते हुए कहा कि सिर्फ कठिन परिश्रम से ही सफलता संभव है।
अपनी सफलता का श्रेय अपनी प्रतिभा को देने के अलावा वह उन सभी लोगों को भी देते है जिन्होंने उन्हें कदम कदम पर प्रोत्साहित किया। साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कार मिलने को उन्होंने अपने जीवन का एक गौरवपूर्ण क्षण बताया और कहा कि उन्हें ऐसा लग रहा है कि अब तक जितनी भी मेहनत की, उसका फल मिल गया।
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77 वर्षीय कहानीकार प्रोफेसर किरपाल कजाक पाकिस्तान के शेखूपुरा में साल 1943 में एक गरीब परिवार में जन्मे और बंटवारे के बाद उनका परिवार पटियाला आ गया। अरबी और फारसी के अच्छे ज्ञाता उनके पिता राज मिस्त्री का काम करते थे।
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उन्होंने किरपाल से भी वही करने को कहा, लेकिन उनका मन इस काम में नहीं लगा। वह घर से भाग गए। उन्होंने सिर्फ नौवीं तक पढ़ाई की। घर से भागने बाद वह जेबकतरों की संगत में पड़ गए। इस वजह से वह मुंबई से लेकर आगरा तक गए। इस दौरान वह घर वालों के संपर्क में थे, पर घर बहुत कम आते थे।
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यह सिलसिला करीब 10 साल चला। उनके अनुसार उन्होंने गरीबी को इंसानी रिश्तों पर हावी होते देखा है। जीवन के ऐसे ही पक्षों को करीब से देखने के कारण हुए ऐसे अनेकों अनुभवों को वह निरंतर कॉपी पर लिखते रहते रहे। उनकी लिखी ऐसी ही एक कहानी ट्रेन में खो कर एक प्रसिद्ध लेखक के पास पहुंची तो उस लेखक ने उनके पिता को पत्र लिखकर उनके बेटे की अभूतपूर्व प्रतिभा का एहसास करवाया।
वर्ष 1970 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई ऐसे में उनको कारपेंटरी से लेकर मजदूरी जैसे काम करने पड़ा। उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। एक बार वह अमृता प्रीतम से मिले और उनकी सलाह पर उन्होंने इन लेखों को किताबों में ढालना शुरू किया। उनकी सलाह का नतीजा था कि कजाक की अभूतपूर्व रचनाएं सबके सामने आई।
पटियाला की प्रसिद्ध पंजाबी यूनिवर्सिटी में चतुर्थ श्रेणी के रूप में भर्ती हुए कजाक ने वहां भी निरंतर अपना लिखना जारी रखा। उनकी प्रतिभा को देखते हुए नौवीं पास किरपाल कजाक को पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला ने प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। उनकी मेहनत का फल है कि किसी ज़माने में यूनिवर्सिटी की ‘खोज’ पत्रिका में लिखने वाले किरपाल आगे चल कर उसी पत्रिका के संपादक बने।
33 से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके किरपाल ने कहा कि सिर्फ किताबें-कॉपियों से पढ़ाई नहीं होती। जिंदगी जो सिखाती है या तजुर्बे देती है, उससे बड़ी पढाई कोई नहीं है। एक वक्त पर बेहद गरीबी में दिन गुजारने वाले किरपाल युवाओं को सलाह देते हुए कहा कि सिर्फ कठिन परिश्रम से ही सफलता संभव है।
अपनी सफलता का श्रेय अपनी प्रतिभा को देने के अलावा वह उन सभी लोगों को भी देते है जिन्होंने उन्हें कदम कदम पर प्रोत्साहित किया। साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कार मिलने को उन्होंने अपने जीवन का एक गौरवपूर्ण क्षण बताया और कहा कि उन्हें ऐसा लग रहा है कि अब तक जितनी भी मेहनत की, उसका फल मिल गया।