11 ऐसे नेता, जिन्हें विरासत में मिली सियासत
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कैप्टन अमरिंदर सिंह के पिता महाराजा यादविंद्रा सिंह तो राजनीति में सक्रिय नहीं थे। पर राजमाता मोहिंदर कौर का रुझान कांग्रेस की तरफ था। उनके पिता हरचंद सिंह पटियाला रियासत प्रज्ञा मंडल के सदस्य थे, जो कांग्रेस से जुड़ा था।
कैप्टन को सियासत की घुट्टी भी राजमाता मोहिंदर कौर से मिली। वह 1964 में कांग्रेस में आईं और 1967 तक राज्यसभा सदस्य रहीं। 1967 लोकसभा चुनाव में वह पटियाला सीट से जीतीं।
इमरजेंसी के बाद कांग्रेस से मोह भंग होने पर उन्होंने जनता पार्टी ज्वाइन की और महासचिव बनीं। जनता पार्टी की तरफ से 1978-84 तक राज्यसभा मेंबर भी रहीं। राजमाता की सियासी विरासत को संभालते हुए कैप्टन भी कांग्रेस से जुड़े।
प्रताप सिंह बाजवा
आतंकवाद के दौरान सतनाम सिंह बाजवा शहीद हुए थे। उन्हीं के नक्शे-कदम पर चलते हुए प्रताप बाजवा कांग्रेस के झंडे तले सियासत में आए।
मोहिंदर सिंह केपी
होशियारपुर से कांग्रेस उम्मीदवार मोहिंदर सिंह केपी आज भी अपने पिता दर्शन सिंह केपी की न सिर्फ सियासी विरासत संभाल रहे हैं, बल्कि हलका भी संभाल रहे हैं। दिज्गज कांग्रेसी दर्शन सिंह केपी पांच बार विधायक बने।
1977 की कांग्रेस विरोधी लहर में जब हर कोई हारा, उस समय भी केपी जीत गए। जिसकी वजह थी उनका लोगों के साथ सीधा जुड़ाव। वह दरबारा सिंह की कैबिनेट में मंत्री भी बने। 1992 में उन्हीं के जालंधर साउथ हलके (अब वेस्ट) से जीत कर मोहिंदर सिंह केपी पहली बार विधायक बने। 2002 में भी विधायक और मंत्री बने, 2009 में सांसद बने।
चौधरी संतोख
जालंधर से कांग्रेस उम्मीदवार चौधरी संतोख के पिता मास्टर गुरबंता सिंह पंजाब के नामी दलित नेता थे। वे बंटवारे के पहले भी विधायक रहे थे। आजादी के बाद से 1977 तक वह सक्रिय राजनीति में रहे। 1980 में उनके बड़े बेटे चौधरी जगजीत सिंह राजनीति में कदम रखा। 1992 में छोटे बेटे चौधरी संतोख पहली बार विधायक बने। 2002 में दोबारा जीत कर मंत्री भी बने।
हरसिमरत कौर बादल
पंजाब के सबसे ताकतवर सियासी घराने की बहू हरसिमरत कौर बादल बठिंडा सीट से चुनाव मैदान में हैं। हरसिमरत के पिता सुरिंदर सिंह मजीठिया माझा के दमदार नेता थे।
डिप्टी सीएम सुखबीर बादल के साथ विवाह के बाद हरसिमरत अपने पारिवारिक जीवन तक ही सीमित थीं। 2007 के विधानसभा चुनाव से पहले वह नन्हीं छांव मुहिम के जरिये सामाजिक रोल में नजर आईं।
आखिर 2009 के लोकसभा चुनाव में मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल उन्हें सक्रिय राजनीति में ले आए। वह बठिंडा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार और कैप्टन अमरिंदर सिंह के बेटे रणइंदर सिंह को एक लाख से भी ज्यादा वोटों से हरा कर सांसद बनीं।
मनप्रीत बादल
पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब के प्रमुख मनप्रीत बादल को सियासत की घुट्टी परिवार से ही मिली। पिता गुरदेव बादल भी अपने बड़े भाई मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के चुनावों की कमान संभालते रहे थे। सीएम बादल ही मनप्रीत को राजनीति में लाए।
गिदड़बाहा से लड़ा कर विधायक बनाया। मनप्रीत कई बार विधायक रहे, 2007 में वित्तमंत्री बने। फिर उन्हीं ताया की विचारधारा उन्हें गलत लगने लगी। अलग होकर पीपीपी का गठन किया, पर 2012 के चुनाव में कुछ नहीं कर सके। खुद भी दोनों जगह से हार गए। कई साथी छोड़ गए, वह लगभग हाशिए पर थे। ऐसे में कांग्रेस ने ऑक्सीजन देते हुए उन्हें बठिंडा से उम्मीदवार बना दिया।
सुनील जाखड़
पिता के नाम को आगे बढ़ाते हुए सुनील जाखड़ सियासत में आए। अबोहर से विधायक बने। 2012 में पार्टी ने उन्हें सीएलपी लीडर बनाया। इस बार सभी दिज्गजों को लड़ाने के फैसले के बाद उन्हें फिरोजपुर सीट से टिकट दिया गया है।
परनीत कौर
रवनीत बिट्टू
लुधियाना से ताल ठोंक रहे राहुल ब्रिगेड के रवनीत बिट्टू की परवरिश ही सियासत के पॉवर कॉरीडोर में हुई। बिट्टू जब बचपन के खेलों में लगे हुए थे तो उनके दादा पूर्व सीएम स्व. बेअंत सिंह बड़ी बड़ी सियासी गुत्थियां सुलझाते थे।
बेअंत सिंह कांग्रेस के सबसे कद्दावर नेताओं में से थे। जिनके पार्टी में भी बड़ी संख्या में वफादार थे। उनकी तीसरी पीढ़ी के रवनीत बिट्टू अब उसी विरासत को संजोने में लगे हैं। बिट्टू के ताया तेजप्रकाश सिंह विधायक और मंत्री रहे। चचेरे भाई गुरकीरत सिंह कोटली भी विधायक हैं।
परमजीत कौर गुलशन
फरीदकोट से शिअद उम्मीदवार परमजीत कौर गुलशन को भी राजनीति की शिक्षा परिवार से ही मिली। उनके पिता धन्ना सिंह गुलशन स्वतंत्रता सेनानी और अकाली दल के बड़े नेता था।
धन्ना सिंह 1962 और 1977 में बठिंडा सीट से जीत कर सांसद बने। मोरारजी देसाई की कैबिनेट में वह मंत्री भी रहे। उन्हीं की सीट बठिंडा से ही परमजीत कौर ने सियासी सफर की शुरुआत की। पहली बार 2004 में जीत कर सांसद बनीं। फिर यह सीट जनरल हो गई। जिसके बाद 2009 में वह फरीदकोट से जीतीं, इस बार भी वहीं से मैदान में हैं।
विजय इंदर सिंगला
संगरूर से चुनाव लड़ रहे राहुल ब्रिगेड के विजय इंदर सिंगला के पिता संतराम सिंगला कांग्रेस के बड़े नेताओं में से थे। वह पटियाला हलके से लोकसभा चुनाव भी लड़े। पटियाला हलके में उनका अच्छा रसूख था।
संतराम सिंगला के निधन के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह, विजय इंदर सिंगला को सक्रिय राजनीति में लाए। पहले उन्हें पंजाब यूथ कांग्रेस का प्रधान बनाया, फिर पेडा का चेयरमैन बनाया।
सिंगला की देखरेख में ही पंजाब में पहली बार यूथ कांग्रेस के लोकतांत्रिक चुनाव हुए। जिसके बाद राहुल गांधी ने उन्हें 2009 में संगरूर से लोक सभा टिकट देकर नवाजा, सिंगला ने भी उन्हें निराश नहीं किया।