{"_id":"57076ef94f1c1b1542c810c8","slug":"vijay-sampla-punjab-bjp-vijay-sampla-selected-as-bjp-president-punjab-kamal-sharma-punjab","type":"story","status":"publish","title_hn":"भाजपा ने खेला दलित कार्ड, विजय सांपला बने पंजाब प्रधान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भाजपा ने खेला दलित कार्ड, विजय सांपला बने पंजाब प्रधान
अखिल तलवार/अमर उजाला, चंडीगढ़।
Updated Fri, 08 Apr 2016 05:58 PM IST
विज्ञापन
होशियारपुर के सांसद विजय सांपला
- फोटो : amarujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा ने रविदासिया समाज के नेता विजय सांपला को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया। अब उनको प्रदेश भाजपा का प्रधान बनाकर पार्टी ने दलित वोट बैंक पर अपना फोकस कर लिया है। भाजपा की ओर से 34 सीटों पर प्रभाव डालने की पूरी रणनीति तैयार की गई है। वहीं सांपला को आगे कर भाजपा दूसरा फोकस गुटबंदी को विराम लगाने के लिए कर रही है। क्योंकि सांपला का कद काफी ऊंचा है और वे तमाम गुटों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखते हैं।
पंजाब में भाजपा पहले ही दलित वोट बैंक को लेकर काफी गंभीर चल रही थी, इसलिए पंजाब में 2012 में चुनावों के बाद विधायक दल का नेता भगत चुन्नी लाल को बनाया गया था। भाजपा ने फिर विजय सांपला को केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया। पंजाब में 117 में से 34 सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से पांच सीटों पर ही भाजपा चुनाव लड़ी है। बाकी सीटों पर शिअद ने अपना ही कब्जा रखा है। इन पांच सीटों में से भाजपा के तीन विधायक भगत चुन्नी लाल, फगवाड़ा से सोमप्रकाश व सीमा देवी ही जीत पाई हैं। शिअद की हालत भी दलित सीटों पर अच्छी नहीं रही है।
सीपीएस अविनाश चंद्र व सरवण सिंह फिल्लौर के बेटे ईडी के चक्कर में फंसे हुए हैं। दलित समुदाय शिअद और भाजपा से पूरी तरह से नाराज चल रहा है। ऐसे में भाजपा ने प्रदेश में पहली बार अपना प्रधान दलित समुदाय से बना लगातार वोट बैंक को सहेजने की कवायद की है। सांपला का राजनीतिक कैरियर कुछ ही समय में ऊपर उठा है, बीते दो बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विधायक की टिकट न मिलने के बावजूद विजय सांपला ने पार्टी और मैैदान में अपना संघर्ष जारी रखा।
विज्ञापन
यही वजह रही कि उनके विरोधियों ने उनको जालंधर की सियासत से आउट कर उनको होशियारपुर धकेल दिया। सरपंच के चुनाव के बाद सांपला ने जिंदगी में दूसरा चुनाव लोकसभा का लड़ा और न केवल सांसद बन गए, बल्कि अब केंद्र में मंत्री बना दिए गए और अब भाजपा के प्रदेश प्रधान की कुर्सी उनको दी गई है।
सरपंच से केंद्रीय राज्यमंत्री और अब प्रदेश भाजपा प्रधान बने सांपला
सोफी पिंड के सरपंच से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाले विजय सांपला ने 2007 में जालंधर वेस्ट से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पूरी तैयारी कर रखी थी। उनका ग्राउंड वर्क भी पूरा हो चुका था, लेकिन एन मौके पर उनका टिकट कट गया। टिकट भगत चुन्नी लाल ले गए। सांपला और भगत चुन्नी लाल में यही से सियासत की जंग शुरू हो गई। 2012 में भी सांपला ने दोबारा जालंधर वेस्ट से टिकट लेने के लिए जोर लगा दिया।
उनकी टिकट पक्की मानी जा रही थी, लेकिन भगत चुन्नी लाल ने उनका टिकट कटवाकर खुद हासिल कर लिया। चुन्नी लाल की लॉबी तेजी से पंजाब में शक्तिशाली हो गई। चुन्नी लाल को प्रदेश में भाजपा विधायक दल का नेता बनाया गया। उनको निकाय जैसा पावरफुल विभाग दे दिया गया। सांपला को जालंधर की सियासत से आऊट करने में चुन्नी लाल भगत व उनकी लॉबी की खासी भूमिका रही। शायद जालंधर की सियासत से आउट होकर होशियारपुर का रुख करना सांपला को रास आ गया।
सांपला के राजनीतिक गुरु अविनाश राय खन्ना खुद होशियारपुर से लोकसभा चुनाव जीत चुके थे, लेकिन सीट आरक्षित होने के बाद उन्होंने सांपला को इसके लिए बुला लिया और तैयारियां शुरू करवा दी। 2012 से लेकर 2014 तक विजय सांपला रोज जालंधर से होशियारपुर आते जाते रहे। 2014 में उनको होशियारपुर से टिकट मिला तो भाजपा की एक लॉबी ने उनका अंदरखाते डटकर विरोध करवाया और जालंधर में प्रदर्शन भी हुआ। सांपला के कदम डगमगाए नहीं और वे चुनाव जीत गए।
विज्ञापन
पंजाब में भाजपा पहले ही दलित वोट बैंक को लेकर काफी गंभीर चल रही थी, इसलिए पंजाब में 2012 में चुनावों के बाद विधायक दल का नेता भगत चुन्नी लाल को बनाया गया था। भाजपा ने फिर विजय सांपला को केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया। पंजाब में 117 में से 34 सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से पांच सीटों पर ही भाजपा चुनाव लड़ी है। बाकी सीटों पर शिअद ने अपना ही कब्जा रखा है। इन पांच सीटों में से भाजपा के तीन विधायक भगत चुन्नी लाल, फगवाड़ा से सोमप्रकाश व सीमा देवी ही जीत पाई हैं। शिअद की हालत भी दलित सीटों पर अच्छी नहीं रही है।
विज्ञापन
सीपीएस अविनाश चंद्र व सरवण सिंह फिल्लौर के बेटे ईडी के चक्कर में फंसे हुए हैं। दलित समुदाय शिअद और भाजपा से पूरी तरह से नाराज चल रहा है। ऐसे में भाजपा ने प्रदेश में पहली बार अपना प्रधान दलित समुदाय से बना लगातार वोट बैंक को सहेजने की कवायद की है। सांपला का राजनीतिक कैरियर कुछ ही समय में ऊपर उठा है, बीते दो बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा के विधायक की टिकट न मिलने के बावजूद विजय सांपला ने पार्टी और मैैदान में अपना संघर्ष जारी रखा।
विज्ञापन
यही वजह रही कि उनके विरोधियों ने उनको जालंधर की सियासत से आउट कर उनको होशियारपुर धकेल दिया। सरपंच के चुनाव के बाद सांपला ने जिंदगी में दूसरा चुनाव लोकसभा का लड़ा और न केवल सांसद बन गए, बल्कि अब केंद्र में मंत्री बना दिए गए और अब भाजपा के प्रदेश प्रधान की कुर्सी उनको दी गई है।
सरपंच से केंद्रीय राज्यमंत्री और अब प्रदेश भाजपा प्रधान बने सांपला
सोफी पिंड के सरपंच से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाले विजय सांपला ने 2007 में जालंधर वेस्ट से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पूरी तैयारी कर रखी थी। उनका ग्राउंड वर्क भी पूरा हो चुका था, लेकिन एन मौके पर उनका टिकट कट गया। टिकट भगत चुन्नी लाल ले गए। सांपला और भगत चुन्नी लाल में यही से सियासत की जंग शुरू हो गई। 2012 में भी सांपला ने दोबारा जालंधर वेस्ट से टिकट लेने के लिए जोर लगा दिया।
उनकी टिकट पक्की मानी जा रही थी, लेकिन भगत चुन्नी लाल ने उनका टिकट कटवाकर खुद हासिल कर लिया। चुन्नी लाल की लॉबी तेजी से पंजाब में शक्तिशाली हो गई। चुन्नी लाल को प्रदेश में भाजपा विधायक दल का नेता बनाया गया। उनको निकाय जैसा पावरफुल विभाग दे दिया गया। सांपला को जालंधर की सियासत से आऊट करने में चुन्नी लाल भगत व उनकी लॉबी की खासी भूमिका रही। शायद जालंधर की सियासत से आउट होकर होशियारपुर का रुख करना सांपला को रास आ गया।
सांपला के राजनीतिक गुरु अविनाश राय खन्ना खुद होशियारपुर से लोकसभा चुनाव जीत चुके थे, लेकिन सीट आरक्षित होने के बाद उन्होंने सांपला को इसके लिए बुला लिया और तैयारियां शुरू करवा दी। 2012 से लेकर 2014 तक विजय सांपला रोज जालंधर से होशियारपुर आते जाते रहे। 2014 में उनको होशियारपुर से टिकट मिला तो भाजपा की एक लॉबी ने उनका अंदरखाते डटकर विरोध करवाया और जालंधर में प्रदर्शन भी हुआ। सांपला के कदम डगमगाए नहीं और वे चुनाव जीत गए।