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Chandigarh News: बायोफीडबैक तकनीक का इस्तेमाल, लड़खड़ाते मरीजों की समस्या का समाधान

Fri, 10 Mar 2023 02:14 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 10 Mar 2023 02:14 AM IST
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Use of biofeedback technique, solution to the problem of faltering patients
चंडीगढ़। चलते चलते लड़खड़ाकर गिर जाने वाले मरीजों के लिए बायोफीडबैक तकनीक वरदान साबित हो रही है। पीजीआई के फिजिकल मेडिसिन रिहैबिलिटेशन विभाग में इन मरीजों को संभलने का तरीका सिखाया जा रहा है। इसके आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि अगर समस्या के कारणों को तलाश कर उसे दूर किया जाए तो उसे काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। बायोफीडबैक तकनीक की मदद से ऐसे काफी मरीजों को राहत मिल रही है। शोध की प्रमुख अन्वेषणकर्ता विभाग की डॉ. सौम्या सक्सेना ने इस समस्या से जूझ रहे 20 मरीजों पर बायो फीडबैक तकनीक का प्रयोग कर किए गए शोध में उनकी समस्या का समाधान तलाशने में सफलता प्राप्त की है।
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डॉ. सौम्या ने बताया कि इस शोध के लिए उन्होंने ऐसे मरीजों का चयन किया जिनका अपनी चाल पर नियंत्रण नहीं था। उनकी समस्या को ट्रेस करने के लिए बायोफीडबैक डिवाइस का प्रयोग किया। उस डिवाइस की मदद से उन मरीजों का बायो फीडबैक तकनीक से समस्या का कारण और समाधान तलाशा गया।
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क्या है बायोफीडबैक तकनीक...आप भी जान लें

बायोफीडबैक एक ऐसी तकनीक है जिसका उपयोग आप अपने शरीर के कुछ कार्यों को नियंत्रित करना सीखने के लिए कर सकते हैं। जैसे कि हृदय गति। बायो फीडबैक के दौरान व्यक्ति इलेक्ट्रिकल सेंसर से जुड़ा होता है, जो शरीर के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायक होता है।
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इनसेट-

मरीजों पर ऐसे किया तकनीक का प्रयोग

बायोफीडबैक सिस्टम पर ऐसे मरीजों को 60 सेकेंड के लिए आंखों को खोलकर खड़ा किया गया। उन्हीं मरीजों को फिर से इस उपकरण पर दोनों आखों को बंद करवाकर 60 सेकेंड के लिए खड़ा किया गया। फिर उन्हें इस उपकरण पर आंखे खोलकर 3 मिनट तक खड़े रहकर अपनी स्थिति को नियंत्रित करने का निर्देश दिया गया। दाएं और बाएं दोनों ही तरफ अपने शरीर का संतुलन बनाने को कहा गया। फिर अपने शरीर के आगे और पीछे के भाग को संतुलित करने को कहा गया। इस पूरी प्रक्रिया को तीन बार दोहराया गया।


ऐसे किया मूल्यांकन

ऊपर बताई गई प्रक्रिया को पूरा करने के बाद मरीज को उपकरण के माध्यम से मिली जानकारी को साझा किया गया। इस दौरान बायोफीडबैक तकनीक से मरीज के दोनों पैरों के बीच के असंतुलन को चिह्नित कर उसे सही किया गया। ठीक ऐसे ही दोनों पैरों की एड़ी और उंगली के बीच पड़ रहे अलग अलग दबाव को ट्रेस कर उसे संतुलित किया गया। इसकी मदद से उन मरीजों को खुद के लड़खड़ाने की असली वजह पता चली। जिसे उन मरीजों ने कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद खुद संभलने में सफल हुए।
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