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ट्रांसप्लांट गेम्सः प्रतियोगियों की दर्दभरी कहानी, उनकी खुद की जुबानी
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 28 Mar 2016 09:07 AM IST
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ट्रांसप्लांट गेम्स में हिस्सा लेने पहुंचे मरीज
- फोटो : फाइल फोटो
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चंडीगढ़ पीजीआई में चल रही ट्रांसप्लांट गेम्स में हिस्सा लेने पहुंचे देश भर के मरीजों ने अपना दर्द पत्रकार से कुछ इस तरह साझा किया। किडनी खराब होने के बाद परिवार पर समस्याओं का पहाड़ टूट जाता है। पहले किडनी का इंतजाम करना पड़ता है। जब तक परिवार का कोई सदस्य किडनी देने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक डायलिसिस से काम चलाना पड़ता है। एक बार के डायलिसिस में हजार रुपये का खर्च होता है। हफ्ते में तीन बार डायलिसिस होते हैं।
किडनी का इंतजाम होने के बाद ट्रांसप्लांट का खर्च और उसके बाद दवाइयों का खर्च। कुल मिलाकर अगर मध्यवर्गीय परिवार के किसी सदस्य की किडनी खराब हुई तो उसका कर्ज में डूबना तय है। ट्रांसप्लांट गेम्स में हिस्सा लेने आए बिहार, झारखंड व यूपी के मरीजों का कहना है कि उनके लिए पीजीआई वरदान है, लेकिन दवाओं का खर्च इतना अधिक है कि उनके लिए इसे वहन करना मुश्किल होता है। एक नजर डालते हैं मरीजों के अनुभव पर।
इलाज के लिए जमीन बेचनी पड़ी
26 वर्षीय मिथुन कुमार सिंह झोलाछाप डाक्टर के चक्कर में फंस गए और उनकी दोनों किडनी खराब हो गई। पटना से उन्हें पीजीआई रेफर किया गया। मिथुन की मां ने किडनी दी और पीजीआई के रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी डिपार्टमेंट ने उनका सक्सेसफुल ट्रांसप्लांट कर दिया। ट्रांसप्लांट के बाद उनकी दवाओं का खर्च हर महीने दस हजार रुपये है। ट्रांसप्लांट में करीब तीन लाख रुपये खर्च हुए। पिता किसान हैं। इलाज के लिए उन्होंने आधा बीघा जमीन बेची। अब भी उन पर 45 हजार रुपये का कर्ज है।
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नहीं उतार पा रहे कर्ज
यूपी मुरादाबाद के दीपक कुमार ने भी अपनी किडनी झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करवा कर गवां दी। 2006 में उनकी किडनी खराब हुई थी। पहले डॉक्टरों ने किडनी दवाओं से ठीक करने की कोशिश की। 2011 उसकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। मां ने किडनी दी और पीजीआई ने सफल ट्रांसप्लांट किया। अब भी उसकी दवाएं चल रही हैं। हर महीने नौ से दस हजार रुपये की दवाएं लेनी पड़ती हैं। पिता रिक्शा चलाते हैं। हजारों का कर्जा हो गया है, जो उतर नहीं पा रहा है।
कर्ज लेकर खर्च चला रहे हैं
हिमाचल के बद्दी के रहने वाले दिनेश की भी किडनी खराब हो गई। उनकी पत्नी पूनम ने किडनी देने का फैसला लिया। वह मेकेनिकल काम करते हैं। ट्रांसप्लांट के बाद उनका भी खर्च आठ से दस हजार रुपये है। दिनेश का कहना है कि ट्रांसप्लांट व दवाओं में चार लाख रुपये से ज्यादा का खर्च हो चुका है। अब दवाओं पर खर्च हो रहा है। घर का खर्च कर्ज लेकर चल रहा है।
दवाओं का खर्च काफी ज्यादा
झारखंड के रहने वाले सुशील कुमार दास के बेटे नितेश की किडनी खराब हो गई थी। झारखंड में इलाज नहीं मिला और पीजीआई के लिए रेफर कर दिया। पीजीआई में ट्रांसप्लांट कराया। रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी के एचओडी प्रोफेसर मुकुट मिंज मरीजों के लिए वरदान हैं। उनकी वजह से किडनी का सफल ट्रांसप्लांट हुआ है। सुशील कुमार खुद स्वस्थ सेवाओं से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें अधिक परेशानी नहीं आई। लेकिन वह भी मानते हैं कि दवाओं का खर्च अधिक है। वह भी हर महीने दस हजार रुपये दवाओं पर खर्च कर रहे हैं।
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किडनी का इंतजाम होने के बाद ट्रांसप्लांट का खर्च और उसके बाद दवाइयों का खर्च। कुल मिलाकर अगर मध्यवर्गीय परिवार के किसी सदस्य की किडनी खराब हुई तो उसका कर्ज में डूबना तय है। ट्रांसप्लांट गेम्स में हिस्सा लेने आए बिहार, झारखंड व यूपी के मरीजों का कहना है कि उनके लिए पीजीआई वरदान है, लेकिन दवाओं का खर्च इतना अधिक है कि उनके लिए इसे वहन करना मुश्किल होता है। एक नजर डालते हैं मरीजों के अनुभव पर।
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इलाज के लिए जमीन बेचनी पड़ी
26 वर्षीय मिथुन कुमार सिंह झोलाछाप डाक्टर के चक्कर में फंस गए और उनकी दोनों किडनी खराब हो गई। पटना से उन्हें पीजीआई रेफर किया गया। मिथुन की मां ने किडनी दी और पीजीआई के रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी डिपार्टमेंट ने उनका सक्सेसफुल ट्रांसप्लांट कर दिया। ट्रांसप्लांट के बाद उनकी दवाओं का खर्च हर महीने दस हजार रुपये है। ट्रांसप्लांट में करीब तीन लाख रुपये खर्च हुए। पिता किसान हैं। इलाज के लिए उन्होंने आधा बीघा जमीन बेची। अब भी उन पर 45 हजार रुपये का कर्ज है।
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नहीं उतार पा रहे कर्ज
यूपी मुरादाबाद के दीपक कुमार ने भी अपनी किडनी झोलाछाप डॉक्टर से इलाज करवा कर गवां दी। 2006 में उनकी किडनी खराब हुई थी। पहले डॉक्टरों ने किडनी दवाओं से ठीक करने की कोशिश की। 2011 उसकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। मां ने किडनी दी और पीजीआई ने सफल ट्रांसप्लांट किया। अब भी उसकी दवाएं चल रही हैं। हर महीने नौ से दस हजार रुपये की दवाएं लेनी पड़ती हैं। पिता रिक्शा चलाते हैं। हजारों का कर्जा हो गया है, जो उतर नहीं पा रहा है।
कर्ज लेकर खर्च चला रहे हैं
हिमाचल के बद्दी के रहने वाले दिनेश की भी किडनी खराब हो गई। उनकी पत्नी पूनम ने किडनी देने का फैसला लिया। वह मेकेनिकल काम करते हैं। ट्रांसप्लांट के बाद उनका भी खर्च आठ से दस हजार रुपये है। दिनेश का कहना है कि ट्रांसप्लांट व दवाओं में चार लाख रुपये से ज्यादा का खर्च हो चुका है। अब दवाओं पर खर्च हो रहा है। घर का खर्च कर्ज लेकर चल रहा है।
दवाओं का खर्च काफी ज्यादा
झारखंड के रहने वाले सुशील कुमार दास के बेटे नितेश की किडनी खराब हो गई थी। झारखंड में इलाज नहीं मिला और पीजीआई के लिए रेफर कर दिया। पीजीआई में ट्रांसप्लांट कराया। रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी के एचओडी प्रोफेसर मुकुट मिंज मरीजों के लिए वरदान हैं। उनकी वजह से किडनी का सफल ट्रांसप्लांट हुआ है। सुशील कुमार खुद स्वस्थ सेवाओं से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें अधिक परेशानी नहीं आई। लेकिन वह भी मानते हैं कि दवाओं का खर्च अधिक है। वह भी हर महीने दस हजार रुपये दवाओं पर खर्च कर रहे हैं।