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इंसाफ पाने के लिए जज साहब को लड़नी पड़ी नौ साल तक लड़ाई
Fri, 28 Jun 2019 06:08 AM IST
देव कश्यप
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
विवेक शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: देव कश्यप
Updated Fri, 28 Jun 2019 06:08 AM IST
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प्रतिकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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दूसरों के लिए इंसाफ देने वाले न्यायाधीश को खुद इंसाफ पाने के लिए नौ साल की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। मेडिकल बिल का रि-इंबरसमेंट पूरा न करने के स्थान पर एम्स के रेट के अनुसार करने के लिए एडिशनल सेशन जज डीके मोंगा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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मोंगा ने याचिका में बताया था कि जब वह पंजाब लीगल सर्विस अथॉरिटी के मेंबर सेक्रेटरी थे तो उस दौरान उनका इलाज चला था। कुल बिल 4,36,943 रुपये का बना था जिसे 2010 में पंजाब सरकार को सौंप दिया । पंजाब सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करते हुए कहा था कि जो भी जुडीशियल ऑफिसर होंगे उन्हें उनके मेडिकल बिल का कुल भुगतान किया जाएगा न की एम्स के रेट के अनुसार। जब याची के बिल के भुगतान का समय आया तो उनको एम्स रेट के अनुसार केवल 3,08,924 रुपये का भुगतान किया गया। इस बारे में सरकार को रिप्रजेंटेशन देने के बाद भी मोंगा को कोई फायदा नहीं हुआ। इसके चलते याची ने 2012 में हाईकोर्ट की शरण ली।
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हाईकोर्ट ने याची पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद पंजाब सरकार से जवाब मांगा। पंजाब सरकार ने इस नोटिफिकेशन को तो स्वीकार किया, लेकिन याची की दलीलों का विरोध किया। पंजाब सरकार की दलीलों से असंतुष्ट होते हुए हाईकोर्ट ने अब लंबित राशि का 9 प्रतिशत ब्याज के साथ दो माह में भुगतान करने के आदेश दिए हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि यादि याची को इस राशि का भुगतान समय पर नहीं किया गया तो राशि का भुगतान 12 प्रतिशत ब्याज के साथ करना होगा।
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