हरियाणा चुनाव : जातिगत गणित ने इस तरह रखी भाजपा की बड़ी जीत की नींव, काम आ गई बीजेपी की लामबंदी
महीनों तक विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा कांग्रेस पार्टी की ओर से जाट और भाजपा की ओर से गैर-जाट जातियों को एकजुट करने के इर्द-गिर्द घूमती रही। निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वी दलों ने उन लोगों को लामबंद किया, जिन्हें वे अपना मुख्य समर्थक मानते थे।
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संख्यात्मक रूप से महत्वपूर्ण और सामाजिक रूप से प्रभावशाली जाटों में से 53 फीसदी ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया, जबकि केवल 29 फीसदी ने भाजपा को वोट दिया। अगर 2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों से तुलना करें तो भाजपा के लिए यह एक बड़ा नकारात्मक बदलाव है। भाजपा ने मुख्य रूप से गैर-जाट और ओबीसी मतदाताओं को लक्षित किया और इस रणनीति में सफल भी दिखी। इसके अलावा, कांग्रेस के मुकाबले भाजपा ब्राह्मणों, पंजाबी खत्रियों, यादवों और गैर-जाटव दलितों के बीच अपनी बढ़त बनाने में सफल रही, जिसने हरियाणा विधानसभा चुनाव में उसकी लगातार तीसरी जीत में योगदान दिया।
कांग्रेस बड़ी संख्या में जाटव मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल रही, जिस समुदाय से उसकी नेता कुमारी सैलजा आती हैं। साथ ही, कांग्रेस को गुर्जर समुदाय, मुसलमानों और सिखों का भी समर्थन मिला जो कुल मतदाताओं का क्रमश: 7 और 4 प्रतिशत हैं (तालिका 1)। कांग्रेस और भाजपा के पक्ष में जाटों और ओबीसी की लामबंदी का श्रेय चुनाव से पहले आयोजित सामुदायिक बैठकों को दिया जा सकता है। जाटों में 60 फीसदी ने माना कि उनके समुदाय के सदस्यों ने यह तय करने के लिए बैठकें आयोजित की थीं कि किस पार्टी या प्रत्याशी को वोट देना है। ओबीसी मतदाताओं में 58 प्रतिशत ने बैठकें आयोजित किए जाने की बात कही। अन्य जाति समुदायों के मतदाताओं ने भी चुनाव से पहले सामुदायिक बैठकों का उल्लेख किया था, लेकिन उनकी संख्या जाटों और ओबीसी की तुलना में बहुत कम थीं।
कांग्रेस और भाजपा के लिए मतदाताओं का यह विभाजित समर्थन इस धारणा पर पैदा हुआ है कि भाजपा ने उनके जाति समुदाय के हितों का कितने प्रभावी तरीके से ख्याल रखा। सर्वेक्षण के निष्कर्षों से स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में जाटों का मानना है कि उनके समुदाय के हितों की उपेक्षा की गई है। इस भावना को समझा जा सकता है क्योंकि भाजपा ने उस राज्य में पिछले 10 वर्षों में अपने दोनों मुख्यमंत्रियों को गैर-जाट समुदाय से चुना है जहां जाटों की ऐतिहासिक रूप से राजनीति में प्रमुख भूमिका रही है। इसी तरह की भावनाएं जाटव और मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं ने भी व्यक्त कीं, यद्यपि अलग-अलग स्तर तक।
कुल मिलाकर, चुनाव के नतीजे मतदाताओं की लामबंदी में समाज में गहराई तक व्याप्त जातिगत गतिशीलता की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हैं, जिसमें कांग्रेस और भाजपा दोनों अपने-अपने जातीय आधार पर काम कर रही हैं। जाटों, जाटवों और अल्पसंख्यक समुदायों को एकजुट करने में कांग्रेस की सफलता और गैर-जाट और ओबीसी को अपने पाले में करने में भाजपा की कामयाबी, हरियाणा में जाति की राजनीति की विभाजित प्रकृति को उजागर करती है।