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रोजाना शिक्षक घर से बुलाकर लाते हैं बच्चे, फिर लगता है स्कूल, वेतन से खरीदना पड़ रहा स्टेशनरी
अनिल कुमार, अमर उजाला, फिरोजपुर (पंजाब)
Updated Mon, 06 Aug 2018 09:44 AM IST
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भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय बार्डर से सटे सीमांत गांवों के सरकारी प्राइमरी स्कूलों के अध्यापकों को रोजाना बच्चों को लेने के लिए उनके घर जाना पड़ता है। आधा समय बच्चों को एकत्र करने में गुजर जाता है, बावजूद इसके स्कूलों में बच्चों की संख्या पूरी नहीं हो रही है। इतना ही नहीं सरकार की ओर से स्कूलों में स्टेशनरी व फर्नीचर के लिए कोई खर्च नहीं दिया जाता, जिससे यह सामान भी उन्हें अपने वेतन से ही खरीदना पड़ता है।
हुसैनीवाला बार्डर स्थित गांवों के सरकारी प्राइमरी अध्यापकों ने बताया कि वर्तमान में धान की रोपाई सहित खेतों में कृषि कार्य जोरों पर चल रहा है। इसी के चलते सीमावर्ती गांवों के लोग खेतों में जाते समय अपने बच्चों को भी साथ ले जाते हैं। ऐसे में अध्यापकों को दूर-दराज गांवों में पहुंचकर बच्चों को घरों से लेकर स्कूल जाना पड़ता है। इसके बाद भी स्कूलों में संख्या पूरी नहीं हो रही।
अध्यापकों का कहना है कि स्कूलों में स्टेशनरी व फर्नीचर के लिए सभी अध्यापक हर माह अपने वेतन से 500 रुपये एकत्रित करते हैं। इसी राशि से कमरों की मरम्मत और रंग-रोगन कराना पड़ता है। सीमावर्ती गांवों के बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए अलग से पुस्तकें प्रिंट कराई हैं, ताकि उन्हें अंग्रेजी के बारे में बताया जा सके। इसके अलावा व्यर्थ के सामान जैसे कोल्ड ड्रिक की बोतलों के ढक्कन, माचिस की डब्बी व उसकी तिल्लियां, टूटी चूड़ियों के अलावा अन्य वस्तुओं से प्रोजेक्ट बनाना सिखाया जा रहा है।
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सीमांत गांव के बच्चे सिर्फ स्कूल में ही पढ़ते हैं, उन्हें घर में कोई पढ़ाने वाला नहीं है। इसीलिए इन्हें मैथ, अंग्रेजी व हिंदी सिखाने में काफी दिक्कत पेश हो रही है। अध्यापकों का कहना है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से युद्ध जैसे हालात में बार-बार उजड़ने के कारण इन गांवों में मजदूर वर्ग के लोगों की संख्या अधिक है। जो बच्चों की शिक्षा की ओर ध्यान नहीं देते हैं। इस बारे में कई बार सरकार से इस ओर ध्यान देने की मांग की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
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हुसैनीवाला बार्डर स्थित गांवों के सरकारी प्राइमरी अध्यापकों ने बताया कि वर्तमान में धान की रोपाई सहित खेतों में कृषि कार्य जोरों पर चल रहा है। इसी के चलते सीमावर्ती गांवों के लोग खेतों में जाते समय अपने बच्चों को भी साथ ले जाते हैं। ऐसे में अध्यापकों को दूर-दराज गांवों में पहुंचकर बच्चों को घरों से लेकर स्कूल जाना पड़ता है। इसके बाद भी स्कूलों में संख्या पूरी नहीं हो रही।
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अध्यापकों का कहना है कि स्कूलों में स्टेशनरी व फर्नीचर के लिए सभी अध्यापक हर माह अपने वेतन से 500 रुपये एकत्रित करते हैं। इसी राशि से कमरों की मरम्मत और रंग-रोगन कराना पड़ता है। सीमावर्ती गांवों के बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए अलग से पुस्तकें प्रिंट कराई हैं, ताकि उन्हें अंग्रेजी के बारे में बताया जा सके। इसके अलावा व्यर्थ के सामान जैसे कोल्ड ड्रिक की बोतलों के ढक्कन, माचिस की डब्बी व उसकी तिल्लियां, टूटी चूड़ियों के अलावा अन्य वस्तुओं से प्रोजेक्ट बनाना सिखाया जा रहा है।
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सीमांत गांव के बच्चे सिर्फ स्कूल में ही पढ़ते हैं, उन्हें घर में कोई पढ़ाने वाला नहीं है। इसीलिए इन्हें मैथ, अंग्रेजी व हिंदी सिखाने में काफी दिक्कत पेश हो रही है। अध्यापकों का कहना है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान से युद्ध जैसे हालात में बार-बार उजड़ने के कारण इन गांवों में मजदूर वर्ग के लोगों की संख्या अधिक है। जो बच्चों की शिक्षा की ओर ध्यान नहीं देते हैं। इस बारे में कई बार सरकार से इस ओर ध्यान देने की मांग की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।