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Chandigarh News: जिन हाथों ने कभी बिखेरे थे खुशियों के रंग, आज वही हुए सूने
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चंडीगढ़। वह भी एक दौर था जब रातभर फूलों को पीसकर, तवे की कालिख को इकट्ठा कर होली के लिए रंग तैयार किए जाते थे। घर पर पकवान बनते थे और मंदिर में ठंडाई मिलती थी। सेक्टर-15 के वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों ने होली से जुड़ी यादें साझा कीं। एक ओर जहां बीते समय की यादों को जीवंत कर बुजुर्गों के चेहरों पर मुस्कान दिखी, वहीं परिवार से अलग रहने का गम भी झलका। हालांकि वृद्धाश्रम में बुजुर्गों को सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं पर त्योहारों का समय ही ऐसा होता है कि घरवालों की याद आ जाती है। 60-70-80 के दशक में खेली जाने वाली होली का बखान करते हुए बुजुर्गों ने होली से जुड़ी अलग-अलग परंपराओं के बारे में बताया। किसी ने होली का बंगाली गीत गाया तो किसी ने उत्तर प्रदेश की गोबर और कीचड़ की होली और किसी ने आर्य समाज में हवन कर होली मनाने के बारे में बताया।
छत में पानी की बाल्टियां भरकर लोगों का इंतजार करते थे
बुजुर्ग कृष्णा ने बताया वह टेसू के फूलों को रातभर भिगो कर रखते थे और तांबे के बर्तन में उसे पीसकर रंग बनाते थे। उस समय दुकानों से रंग नहीं लिया करते थे। बड़ों को पैरों में रंग लगाया करते थे और उनसे आशीर्वाद लिया करते थे। इस दिन सबसे ज्यादा उत्सुकता छत पर जाकर साफ सुथरे लोगों पर रंग फेंकने की होती थी। हम छत पर पानी की बाल्टियां भरकर लोगों के निकलने का इंतजार किया करते थे।
होलिका दहन पर बच्चों को पहनाते थे गोबर की माला
उत्तर प्रदेश की रहने वाली सोमवती ने बताया कि होली से पूर्व होलिका दहन पर बच्चों को गोबर की माला पहनाई जाती थी, जिसे उनकी सुरक्षा के लिए अच्छा माना जाता था। होली एक नहीं बल्कि तीन-तीन दिन तक खेला करते थे। पहले के समय में रंग न मिले तो मिट्टी, गोबर में रम कर होली खेलते थे। पिचकारी की जगह चुन्नी में रंग लगाकर दूसरों पर फेंका करते थे। भाई दूज तक यह सिलसिला कायम रहता था।
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सादगी से मनाते थे होली
100 वर्षीय परमजीत ने बताया कि वह हर वर्ष होली पर पूजा-पाठ करती थीं और परिवार के सदस्यों के लिए पकवान बनाती थीं। होली से एक दिन पूर्व घर पर पूजा की जाती थी और अगले दिन सुबह जल्दी उठकर, स्नान कर खाना बनाया जाता था, जिसमें गुझिया का बनना अनिवार्य रहता था। बचपन पाकिस्तान में गुजरा जहां त्योहार को अधिक नहीं मनाया जाता था और भारत आकर 16 वर्ष की आयु में शादी हो गई। ऐसे में कभी अलहड़पन वाली होली तो उन्होंने नहीं खेली, पर सबके लिए पकवान बनाकर अन्य तरह की होली जरूर खास बनाई।
तवे की कालिख से रंगते थे दोस्तों को
जब पक्के रंग नहीं थे तब बर्तनों की कालिख से चेहरे रंगते थे। पहले सभी के घरों में चूल्हे जलते थे जिससे बर्तनों में आग की कालिख लग जाती थी। इसी कालिख को इकट्ठा कर लड़कियां होली खेला करती थीं। इसके लिए बाकायदा बर्तनों को आग पर बिठा कर उनसे रंग निकाला जाता था।
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छत में पानी की बाल्टियां भरकर लोगों का इंतजार करते थे
बुजुर्ग कृष्णा ने बताया वह टेसू के फूलों को रातभर भिगो कर रखते थे और तांबे के बर्तन में उसे पीसकर रंग बनाते थे। उस समय दुकानों से रंग नहीं लिया करते थे। बड़ों को पैरों में रंग लगाया करते थे और उनसे आशीर्वाद लिया करते थे। इस दिन सबसे ज्यादा उत्सुकता छत पर जाकर साफ सुथरे लोगों पर रंग फेंकने की होती थी। हम छत पर पानी की बाल्टियां भरकर लोगों के निकलने का इंतजार किया करते थे।
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होलिका दहन पर बच्चों को पहनाते थे गोबर की माला
उत्तर प्रदेश की रहने वाली सोमवती ने बताया कि होली से पूर्व होलिका दहन पर बच्चों को गोबर की माला पहनाई जाती थी, जिसे उनकी सुरक्षा के लिए अच्छा माना जाता था। होली एक नहीं बल्कि तीन-तीन दिन तक खेला करते थे। पहले के समय में रंग न मिले तो मिट्टी, गोबर में रम कर होली खेलते थे। पिचकारी की जगह चुन्नी में रंग लगाकर दूसरों पर फेंका करते थे। भाई दूज तक यह सिलसिला कायम रहता था।
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सादगी से मनाते थे होली
100 वर्षीय परमजीत ने बताया कि वह हर वर्ष होली पर पूजा-पाठ करती थीं और परिवार के सदस्यों के लिए पकवान बनाती थीं। होली से एक दिन पूर्व घर पर पूजा की जाती थी और अगले दिन सुबह जल्दी उठकर, स्नान कर खाना बनाया जाता था, जिसमें गुझिया का बनना अनिवार्य रहता था। बचपन पाकिस्तान में गुजरा जहां त्योहार को अधिक नहीं मनाया जाता था और भारत आकर 16 वर्ष की आयु में शादी हो गई। ऐसे में कभी अलहड़पन वाली होली तो उन्होंने नहीं खेली, पर सबके लिए पकवान बनाकर अन्य तरह की होली जरूर खास बनाई।
तवे की कालिख से रंगते थे दोस्तों को
जब पक्के रंग नहीं थे तब बर्तनों की कालिख से चेहरे रंगते थे। पहले सभी के घरों में चूल्हे जलते थे जिससे बर्तनों में आग की कालिख लग जाती थी। इसी कालिख को इकट्ठा कर लड़कियां होली खेला करती थीं। इसके लिए बाकायदा बर्तनों को आग पर बिठा कर उनसे रंग निकाला जाता था।