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Hindi News ›   Chandigarh ›   Term of Chandigarh Administrator VP Singh Badnore is End on August 22

चंडीगढ़: इसी माह खत्म होगा प्रशासक का कार्यकाल, अलग प्रशासक या मुख्य सचिव का पद बहाल करने पर छिड़ी चर्चा  

Mon, 02 Aug 2021 09:58 AM IST
निवेदिता वर्मा रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 02 Aug 2021 09:58 AM IST
सार

सरकारी कर्मचारी, अधिकारी व वरिष्ठ राजनेता मुख्य आयुक्त के पक्ष में नजर आ रहे हैं, जबकि कुछ राजनीतिक दल अलग प्रशासक की नियुक्ति के पक्ष में हैं। दोनों ही मामलों में कोई भी पंजाब के राज्यपाल व चंडीगढ़ का प्रशासक का पद एक ही व्यक्ति को देने के पक्ष में नहीं है।

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Term of Chandigarh Administrator VP Singh Badnore is End on August 22
चंडीगढ़ के प्रशासक वीपी सिंह बदनौर। - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

पंजाब के राज्यपाल व यूटी प्रशासक वीपी सिंह बदनौर का कार्यकाल खत्म होने के साथ चंडीगढ़ के लिए अलग प्रशासक की चर्चाएं एक बार फिर तेज हो गई हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि अलग प्रशासक होगा तो शहर के काम जल्दी होंगे। उधर, कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मुख्य सचिव का पद फिर से बहाल करना चाहिए, क्योंकि शहर के लिए वह दौर ज्यादा बेहतर था।

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प्रशासक वीपी सिंह बदनौर का कार्यकाल 22 अगस्त को खत्म हो रहा है। अगले प्रशासक को लेकर क्षेत्रीय और केंद्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई है। राजनीतिक दल अपने स्तर पर कोशिश करने में जुटे हुए हैं। सरकारी कर्मचारी, अधिकारी व वरिष्ठ राजनेता मुख्य आयुक्त के पक्ष में नजर आ रहे हैं, जबकि कुछ राजनीतिक दल अलग प्रशासक की नियुक्ति के पक्ष में हैं। दोनों ही मामलों में कोई भी पंजाब के राज्यपाल व चंडीगढ़ का प्रशासक का पद एक ही व्यक्ति को देने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, केंद्र सरकार का मत भी कुछ ऐसा ही है। 
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साल 2016 में केंद्र ने चंडीगढ़ को पंजाब के राज्यपाल से अलग करने की कोशिश की थी। दिल्ली में ‘डेमोलिशन मैन’ के तौर पर मशहूर रहे पूर्व आईएएस अधिकारी एवं भाजपा नेता केजे अल्फोंस को चंडीगढ़ का प्रशासक बना दिया गया था। उन्हें जिम्मेदारी संभालने की सूचना भी दे दी गई थी, लेकिन पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के विरोध के बाद उनकी नियुक्ति टल गई, लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। 

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इस बार ज्यादा हैं अलग प्रशासक की नियुक्ति की संभावनाएं

एक वरिष्ठ पूर्व आईएएस ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में अलग प्रशासक की नियुक्ति की संभावनाएं काफी ज्यादा हैं। वर्ष 2016 में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन था। तत्कालीन सीएम बादल की बात केंद्र को माननी पड़ी, लेकिन अब गठबंधन टूट चुका है और न ही अकाली दल सत्ता में है। इसके अलावा पंजाब में अगले वर्ष चुनाव भी हैं।

तालमेल बनाने के लिए ही पंजाब के राज्यपाल को दी गई थी चंडीगढ़ की कमान
वर्ष 1952 से 1966 तक चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी थी और मुख्य आयुक्त स्थानीय प्रशासन का नेतृत्व करता था। जब पंजाब का विभाजन हुआ तो केंद्र सरकार ने एक नवंबर 1966 को चंडीगढ़ को एक केंद्रशासित प्रदेश बना दिया। यहां का प्रशासन केंद्र सरकार के अधीन काम करने लगा, लेकिन मुख्य आयुक्त की व्यवस्था को जारी रखा गया। यह व्यवस्था 31 मई 1984 तक जारी रही। वर्ष 1984 में पंजाब आतंकवाद और दंगों से जूझ रहा था तो चंडीगढ़ में भी हालात बेहद खराब थे। 

पंजाब और चंडीगढ़ में तालमेल बनाने के लिए ही चंडीगढ़ की कमान पंजाब के राज्यपाल को प्रशासक के तौर पर सौंपी गई और मुख्य आयुक्त के पद को प्रशासक के सलाहकार के तौर पर बदल दिया गया। इसके साथ ही सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए आईजी और एसएसपी के पदों पर भी पंजाब के अधिकारियों को नियुक्त किया गया था। दंगों से निपटने के बाद आईजी का पद तो वापस लेकर यूटी कैडर से भरा जाने लगा, लेकिन एसएसपी आज भी पंजाब का ही बनता है।

सिर्फ चंडीगढ़ के लिए अगर प्रशासक की नियुक्ति होती है तो यह चंडीगढ़ के लोगों के लिए अच्छा होगा। हालांकि, बड़ा मुद्दा डेपुटेशन का भी है। पंजाब और हरियाणा के अधिकारी चंडीगढ़ में काम करते हैं, लेकिन चंडीगढ़ का कोई अपना कैडर नहीं है।  - अरुण सूद, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा

चंडीगढ़ में मुख्य सचिव के पद को बहाल करना चाहिए, क्योंकि उस दौरान स्थितियां ज्यादा बेहतर थीं। शहर का विकास करना है कि मेयर को ताकत देनी होगी। एमसी एक्ट में संशोधन कर मेयर इन कांउसिल बनाया जाना चाहिए। इसमें मेयर के साथ दो पार्षद हों, जिन्हें विभाग दिए जाएं और वह काम करें।  - पवन कुमार बंसल, पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री (कांग्रेस)

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