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रिसर्च बना शौक: 5 वैज्ञानिकों पर छाया खोई याददाश्त वापस लाने का जुनून, जानिए क्या है अल्जाइमर
Fri, 06 Mar 2020 02:03 PM IST
खुशबू गोयल
सुशील कुमार, चंडीगढ़
सुशील कुमार, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Fri, 06 Mar 2020 02:03 PM IST
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फाइल फोटो
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हर व्यक्ति को किसी न किसी चीज का शौक होता है और वही पैशन आगे जाकर उनका भविष्य गढ़ता है। कुछ ऐसा ही शौक लगा है पांच वैज्ञानिकों को। पीयू के डॉ. अशेाक कुमार, एम्स कोलकाता के डॉ. अमित व डीएमसी हॉस्पिटल लुधियाना में क्लीनिकल रिसर्च को-ऑर्डिनेटर डॉ. शीतल गुप्ता को शोधपरक कार्य करने का शौक हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद लगा।
इसी को पूरा करने के लिए उन्होंने दुनियाभर की उन क्षेत्रों को देखा जो सबसे अधिक गहरा हो और कार्य करने के बाद लोगों को उस रिसर्च के जरिये कुछ नया हासिल हो। इन्होंने अपने रिसर्च का विषय मेमोरी से जोड़ा, जो लोगों की याददाश्त एक उम्र के बाद जा रही है। इस बीमारी को अल्जाइमर कहते हैं, इसकी चपेट में युवा भी हैं।
इन वैज्ञानिकों ने यही ठान लिया कि दुनियाभर के लोगों की जा रही याददाश्त को वापस लाया जाए और उस जिद को पूरा करने के लिए जुट गए। इनके साथ तीन अन्य वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया और परिणाम आज सामने हैं। रिसर्च का पहला पड़ाव पूरा कर लिया और अब दूसरे पड़ाव पर काम करने की योजना बना रहे हैं।
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इसी को पूरा करने के लिए उन्होंने दुनियाभर की उन क्षेत्रों को देखा जो सबसे अधिक गहरा हो और कार्य करने के बाद लोगों को उस रिसर्च के जरिये कुछ नया हासिल हो। इन्होंने अपने रिसर्च का विषय मेमोरी से जोड़ा, जो लोगों की याददाश्त एक उम्र के बाद जा रही है। इस बीमारी को अल्जाइमर कहते हैं, इसकी चपेट में युवा भी हैं।
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इन वैज्ञानिकों ने यही ठान लिया कि दुनियाभर के लोगों की जा रही याददाश्त को वापस लाया जाए और उस जिद को पूरा करने के लिए जुट गए। इनके साथ तीन अन्य वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया और परिणाम आज सामने हैं। रिसर्च का पहला पड़ाव पूरा कर लिया और अब दूसरे पड़ाव पर काम करने की योजना बना रहे हैं।
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आंकड़ों पर एक नजर
- शरीर के 22 हजार जीन में खोजे तीन जीन, इनकी जांच से लग जाएगा बढ़े व कम हुए मेट्ल्स का पता
- मेटल्स के प्रतिशत के मुताबिक ही डॉक्टर शुरू कर देंगे मरीज का इलाज, घट जाएगी मरीजों की संख्या
- कॉपर, आयरन, जिंक मेटल्स की मात्रा शरीर में बढ़ने के कारण गड़बड़ा जाते हैं जीन, होता है अल्जाइमर
- साइटोस्केप सॉफ्टवेयर के जरिये पीयू के डॉ. अशोक कुमार के नेतृत्व में हुई जीन टू जीन नेटवर्क स्टडी
ये आंकड़े कुछ कहते हैं
देश व दुनिया में 4.40 करोड़ लोग अल्जाइमर के शिकार हैं। उनकी याददास्त कम हो गई या फिर बिल्कुल जा चुकी है। भविष्य में ऐसे रोगी नहीं बढ़ें, इसके लिए पंजाब विश्वविद्यालय, पीजीआई चंडीगढ़ व एम्स जोधपुर (राजस्थान) के पांच वैज्ञानिकों ने एक बड़ा रिसर्च किया है। पांच माह के रिसर्च में इन वैज्ञानिकों ने उन जीन का पता लगाया है जिसके कारण अल्जाइमर की बीमारी होती है।
शरीर में पाए जाने वाले 22 हजार जीन में तीन जीन को खोजा है। अब इनकी जांच के जरिये यह पता लग जाएगा कि शरीर में कौनसे मेट्ल्स की अधिकता व कमी के कारण यह रोग हुआ है। पहले कारणों का पता लगने के कारण डॉक्टर आसानी से इसका इलाज कर सकेंगे।
- मेटल्स के प्रतिशत के मुताबिक ही डॉक्टर शुरू कर देंगे मरीज का इलाज, घट जाएगी मरीजों की संख्या
- कॉपर, आयरन, जिंक मेटल्स की मात्रा शरीर में बढ़ने के कारण गड़बड़ा जाते हैं जीन, होता है अल्जाइमर
- साइटोस्केप सॉफ्टवेयर के जरिये पीयू के डॉ. अशोक कुमार के नेतृत्व में हुई जीन टू जीन नेटवर्क स्टडी
ये आंकड़े कुछ कहते हैं
देश व दुनिया में 4.40 करोड़ लोग अल्जाइमर के शिकार हैं। उनकी याददास्त कम हो गई या फिर बिल्कुल जा चुकी है। भविष्य में ऐसे रोगी नहीं बढ़ें, इसके लिए पंजाब विश्वविद्यालय, पीजीआई चंडीगढ़ व एम्स जोधपुर (राजस्थान) के पांच वैज्ञानिकों ने एक बड़ा रिसर्च किया है। पांच माह के रिसर्च में इन वैज्ञानिकों ने उन जीन का पता लगाया है जिसके कारण अल्जाइमर की बीमारी होती है।
शरीर में पाए जाने वाले 22 हजार जीन में तीन जीन को खोजा है। अब इनकी जांच के जरिये यह पता लग जाएगा कि शरीर में कौनसे मेट्ल्स की अधिकता व कमी के कारण यह रोग हुआ है। पहले कारणों का पता लगने के कारण डॉक्टर आसानी से इसका इलाज कर सकेंगे।
ऐसे चला रिसर्च का पहला चरण
पंजाब विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिस्टम बायोलॉजी एंड बायोइन्फोर्मेटिक्स के चेयरमैन डॉ. अशोक कुमार ने अल्जाइमर पर नवंबर 2018 से काम शुरू किया। उन्होंने पता लगाया कि शरीर में पाए जाने वाले जीन के मस्तिष्क में गड़बड़ा जाने के कारण अल्जाइमर होता है। यह जीन शरीर में कॉपर, जिंक, आयरन आदि मेट्ल्स की अधिकता व कमी के कारण गड़बड़ाते हैं। सबसे पहले उन्होंने ओपन सॉर्स सॉफ्टवेयर साइटोस्केप के जरिये जीन टू जीन नेटवर्क स्टडी की। शरीर के 22 हजार जीन पर स्टडी धीरे-धीरे चलती रही।
कुछ परिणाम सामने आने लगे तो खुशी हुई। तीन माह में रिसर्च पर 80 फीसद काम पूरा हो गया। आखिर में अब रिजल्ट सामने हैं। इसमें तीन जीन मिले हैं। ऑस्टिवन, कोगलेशन फैक्टर पांच व सात जीन कॉपर व आयरन के शरीर में अधिकता होने के कारण गड़बड़ाने लगते हैं। एबीआईए जीन आयरन की मात्रा के कारण प्रभावित होता है। इसके कारण ही अल्जाइमर जन्म लेता है। जैसे ही किसी मरीज में अल्जाइमर के लक्षण दिखाई देंगे तो डॉक्टर तीन जीन की जांच कराकर आसानी से इस बीमारी का इलाज कर सकेंगे।
कॉपर, आयरन, जिंक आदि को शरीर में कम-अधिक चिकित्सक कर सकेंगे। इस रिसर्च में एम्स जोधपुर के प्रो. प्रवीण शर्मा, एम्स कोलकाता के डॉ. अमित, पीजीआई चंडीगढ़ से सेवानिवृत प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद व डीएमसी हॉस्पिटल लुधियाना में क्लीनिकल रिसर्च को-ऑर्डिनेटर डॉ. शीतल गुप्ता का बड़ा योगदान रहा। अब इस रिसर्च पर ह्यूमन स्टडी करने के डॉ. अशोक कुमार ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है।
कुछ परिणाम सामने आने लगे तो खुशी हुई। तीन माह में रिसर्च पर 80 फीसद काम पूरा हो गया। आखिर में अब रिजल्ट सामने हैं। इसमें तीन जीन मिले हैं। ऑस्टिवन, कोगलेशन फैक्टर पांच व सात जीन कॉपर व आयरन के शरीर में अधिकता होने के कारण गड़बड़ाने लगते हैं। एबीआईए जीन आयरन की मात्रा के कारण प्रभावित होता है। इसके कारण ही अल्जाइमर जन्म लेता है। जैसे ही किसी मरीज में अल्जाइमर के लक्षण दिखाई देंगे तो डॉक्टर तीन जीन की जांच कराकर आसानी से इस बीमारी का इलाज कर सकेंगे।
कॉपर, आयरन, जिंक आदि को शरीर में कम-अधिक चिकित्सक कर सकेंगे। इस रिसर्च में एम्स जोधपुर के प्रो. प्रवीण शर्मा, एम्स कोलकाता के डॉ. अमित, पीजीआई चंडीगढ़ से सेवानिवृत प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद व डीएमसी हॉस्पिटल लुधियाना में क्लीनिकल रिसर्च को-ऑर्डिनेटर डॉ. शीतल गुप्ता का बड़ा योगदान रहा। अब इस रिसर्च पर ह्यूमन स्टडी करने के डॉ. अशोक कुमार ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा है।
कोशिकाओं को होता है नुकसान
शरीर को मेट्ल्स की आवश्यकता बहुत कम होती है लेकिन यदि इसकी अधिक मात्रा शरीर में चली जाती है या फिर कम रह जाती है तो लोग अल्जाइमर रोग की चपेट में आने लगते हैं। अल्जाइमर दिमाग की कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है। पहले लोग समझते हैं कि उम्र बढ़ने के कारण ऐसा हो रहा है लेकिन असल में वह इस रोग से ग्रसित हो चुके होते हैं। इसका पता आठ से दस साल बाद लगने लगता है। मालूम हो कि 0.00034 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर को मेट्ल्स की आवश्यकता होती है। यह मेट्ल्स शरीर में पानी, सब्जी या अन्य आहार के जरिये मिलते हैं।
स्टील के बर्तन में भी होते हैं मेट्ल्स
रिसर्च में शरीर में कॉपर की मात्रा बढ़ने का एक कारण यह भी निकलकर सामने आया है कि स्टील के कुछ बर्तन ऐसे होते हैं जिनके नीचे कॉपर लगा होता है या फिर स्टील में ही उसकी मात्रा होती है। जैसे ही उस बर्तन में खाना बनता है तो वह शरीर में पहुंचता है। ऐसे में बर्तन खरीदते समय दुकानदार से पूछें कि जिस स्टील को वह खरीद रहे हैं उसमें तांबे का मिश्रण तो नहीं है। साथ ही पानी जो पी रहे हैं उसका टीडीएस चेक कराते रहें।
ओपन सॉर्स साइटोस्केप सॉफ्टवेयर के जरिये जीन टी जीन नेटवर्क स्डटी के परिणाम बेहतर आए हैं। इसके जरिये अल्जाइमर बीमारी का पहले ही पता लग जाएगा और उसका चिकित्सक आसानी से इलाज कर सकेंगे। ह्यूमन स्टडी के जरिये इसे आगे बढ़ाएंगे, इसके लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है।
--- डॉ. अशोक कुमार, चेयरमैन, सेंटर फॉर सिस्टम बायोलॉजी एंड बायोइन्फोर्मेटिक्स पीयू
स्टील के बर्तन में भी होते हैं मेट्ल्स
रिसर्च में शरीर में कॉपर की मात्रा बढ़ने का एक कारण यह भी निकलकर सामने आया है कि स्टील के कुछ बर्तन ऐसे होते हैं जिनके नीचे कॉपर लगा होता है या फिर स्टील में ही उसकी मात्रा होती है। जैसे ही उस बर्तन में खाना बनता है तो वह शरीर में पहुंचता है। ऐसे में बर्तन खरीदते समय दुकानदार से पूछें कि जिस स्टील को वह खरीद रहे हैं उसमें तांबे का मिश्रण तो नहीं है। साथ ही पानी जो पी रहे हैं उसका टीडीएस चेक कराते रहें।
ओपन सॉर्स साइटोस्केप सॉफ्टवेयर के जरिये जीन टी जीन नेटवर्क स्डटी के परिणाम बेहतर आए हैं। इसके जरिये अल्जाइमर बीमारी का पहले ही पता लग जाएगा और उसका चिकित्सक आसानी से इलाज कर सकेंगे। ह्यूमन स्टडी के जरिये इसे आगे बढ़ाएंगे, इसके लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है।
--- डॉ. अशोक कुमार, चेयरमैन, सेंटर फॉर सिस्टम बायोलॉजी एंड बायोइन्फोर्मेटिक्स पीयू
अल्जाइमर के लक्षण
- मरीज की याददाश्त कम हो जाती है।
- सोचने की क्षमता का कम होना।
- उच्च रक्तचाप होना।
- मोटापा लगातार बढ़ना।
- गुस्सा आने लगता है।
- चिड़चिड़ापन होने लगता है।
- अपने शब्दों को दोहराना
- बेचैनी होना
- एकाग्रता में कमी आने लगती है।
- बेवजह कहीं भी घूमते रहना और खो जाना, रास्ता भटकना।
- मूड में बदलाव होना
- मनोवैज्ञानिक समस्याएं जैसे डिप्रेशन, हैल्यूसिनेशन या पैरानोइया हो जाता है।
- आखिर में पूरी याददास्त चली जाती है।
- सोचने की क्षमता का कम होना।
- उच्च रक्तचाप होना।
- मोटापा लगातार बढ़ना।
- गुस्सा आने लगता है।
- चिड़चिड़ापन होने लगता है।
- अपने शब्दों को दोहराना
- बेचैनी होना
- एकाग्रता में कमी आने लगती है।
- बेवजह कहीं भी घूमते रहना और खो जाना, रास्ता भटकना।
- मूड में बदलाव होना
- मनोवैज्ञानिक समस्याएं जैसे डिप्रेशन, हैल्यूसिनेशन या पैरानोइया हो जाता है।
- आखिर में पूरी याददास्त चली जाती है।