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खुलासाः वसूली और बदनामी के डर से खुदकुशी को मजबूर मानसा के किसान
ब्यूरो/अमर उजाला, मानसा(पंजाब)
Updated Mon, 09 May 2016 11:47 AM IST
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पंजाब के किसानों की सुसाइड
- फोटो : डेमो फोटो
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मानसा का इलाका पंजाब की मशहूर कपास पट्टी में आता है। कभी किसानों को मालामाल करने वाली कपास ने पिछले कुछ वर्षों में कर्ज और तंगहाली का ऐसा फंदा बुना है कि धरती के पुत्र अब जान देने को मजबूर हैं। अकेले मानसा जिले में इस साल जनवरी से अब तक 31 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यहां के किसान किन परिस्थितियों में जी रहे हैं? क्यों वे जान देने को मजबूर हैं? जमीनी हकीकत क्या है? अमर उजाला की टीम ने जिले में इसकी पड़ताल की। जो हकीकत सामने आई, उसी पर अमर उजाला यह सीरीज शुरू कर रहा है। इस कड़ी में प्रस्तुत है हमारे मुख्य संवाददाता भूपेंदर सिंह भटिया की ग्राउंड जीरो से यह रिपोर्ट...।
पिछले साल कपास के खेतों पर जो सफेद मक्खी का हमला हुआ, जिले के ज्यादातर किसान उसकी मार से चौपट हो गए। मदद के नाम पर सिस्टम का खून भी सफेद साबित हुआ और हालात बदतर होते चले गए। इस साल पंजाब में अब तक 65 किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। इनमें से 31 मानसा से हैं। हालांकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 19 है। कपास की फसल तबाह होने से सबसे कठिन समय उन किसानों का है, जिन्होंने ठेके पर जमीन लेकर खेती की। बैंक और आढ़तियों से कर्ज लेकर पैसा जमीन में लगाया।
सफेद मक्खी मेहनत और पैसे के साथ-साथ किसानों की उम्मीदें भी निगल गई। बैंक और आढ़ती अपने कर्ज के लिए उनके दरवाजे पर डटे हैं। वसूली और बदनामी के डर से वे जान देने को मजबूर हैं। उन पर व्यवस्था का खौफ इतना हावी है कि किसान की खुदकुशी के बाद परिवार पोस्टमार्टम करवाने को भी राजी नहीं होता। यही वजह है कि सरकारी आंकड़ों में आत्महत्या करने वालों की संख्या सिर्फ 19 है। सरकारी रिकॉर्ड में जो आत्महत्या साबित नहीं कर पाते, उन परिवारों को कोई मुआवजा भी नहीं मिलता।
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डरा देते हैं लोग
मानसा के झुनीर गांव के गुरनाम सिंह मार्च में खुदकुशी की थी। मगर आज तक परिवार को मुआवजा नहीं मिला। परिवार में पत्नी, बेटा और बेटी हैं। पिता की मौत के बाद बेटे की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। गुरनाम सिंह की पत्नी कहती है कि उन्हें गांव के कुछ लोगों ने पोस्टमार्टम न करवाने का डर दिखाया। इसलिए आनन-फानन में पति का अंतिम संस्कार कर दिया । आज सरकारी रिकॉर्ड में उनके पति की खुदकुशी का कोई जिक्र नहीं है। सिर्फ गुरनाम सिंह ही नहीं जिले में ऐसे कम से कम 12 और किसान परिवार हैं।
पूरी प्रक्रिया के बाद भेजी जाती है रिपोर्ट
किसानों की मौत की संख्या और सरकारी आंकड़ों में विभिन्नता होने पर मानसा के उपायुक्त वरिंदर कुमार शर्मा का कहना है कि सरकार की ओर से किसानों को तीन लाख रुपये मुआवजा दिया जाता है। इसके लिए मृतक किसान के परिवार की ओर से पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफआईआर की कॉपी और कर्ज का विवरण संबंधित विभाग को देना होता है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मुआवजे के लिए रिपोर्ट भेजी जाती है। कई किसानों के परिवार वाले पोस्टमार्टम और अन्य औपचारिकताओं को पूरा नहीं करते, इसी कारण यह समस्या पैदा होती है।
आढ़तियों का कर्ज बड़ी वजह
कपास की खेती में महंगा बीटी कॉटन बीज और काफी मात्रा में पेस्टीसाइड का इस्तेमाल होता है। इसके लिए ज्यादातर किसान फसल के आधार पर आढ़तियों से पैसा उधार लेते हैं। फसल खराब होने पर यह पैसा चुकाना किसानों के लिए मुश्किल हो जाता है। किसान परिवारों का कहना है कि आढ़ती वसूली के लिए तरह-तरह के दबाव डालते हैं। फसल खराब होने पर सरकार की ओर से कोई उचित मदद नहीं मिलती। अगर मदद मिले तो किसान जान क्यों दें।
449 किसानों ने पिछले साल की थी आत्महत्या
65 किसान इस साल अप्रैल तक दे चुके हैं जान
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पिछले साल कपास के खेतों पर जो सफेद मक्खी का हमला हुआ, जिले के ज्यादातर किसान उसकी मार से चौपट हो गए। मदद के नाम पर सिस्टम का खून भी सफेद साबित हुआ और हालात बदतर होते चले गए। इस साल पंजाब में अब तक 65 किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। इनमें से 31 मानसा से हैं। हालांकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 19 है। कपास की फसल तबाह होने से सबसे कठिन समय उन किसानों का है, जिन्होंने ठेके पर जमीन लेकर खेती की। बैंक और आढ़तियों से कर्ज लेकर पैसा जमीन में लगाया।
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सफेद मक्खी मेहनत और पैसे के साथ-साथ किसानों की उम्मीदें भी निगल गई। बैंक और आढ़ती अपने कर्ज के लिए उनके दरवाजे पर डटे हैं। वसूली और बदनामी के डर से वे जान देने को मजबूर हैं। उन पर व्यवस्था का खौफ इतना हावी है कि किसान की खुदकुशी के बाद परिवार पोस्टमार्टम करवाने को भी राजी नहीं होता। यही वजह है कि सरकारी आंकड़ों में आत्महत्या करने वालों की संख्या सिर्फ 19 है। सरकारी रिकॉर्ड में जो आत्महत्या साबित नहीं कर पाते, उन परिवारों को कोई मुआवजा भी नहीं मिलता।
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डरा देते हैं लोग
मानसा के झुनीर गांव के गुरनाम सिंह मार्च में खुदकुशी की थी। मगर आज तक परिवार को मुआवजा नहीं मिला। परिवार में पत्नी, बेटा और बेटी हैं। पिता की मौत के बाद बेटे की पढ़ाई बीच में ही छूट गई। गुरनाम सिंह की पत्नी कहती है कि उन्हें गांव के कुछ लोगों ने पोस्टमार्टम न करवाने का डर दिखाया। इसलिए आनन-फानन में पति का अंतिम संस्कार कर दिया । आज सरकारी रिकॉर्ड में उनके पति की खुदकुशी का कोई जिक्र नहीं है। सिर्फ गुरनाम सिंह ही नहीं जिले में ऐसे कम से कम 12 और किसान परिवार हैं।
पूरी प्रक्रिया के बाद भेजी जाती है रिपोर्ट
किसानों की मौत की संख्या और सरकारी आंकड़ों में विभिन्नता होने पर मानसा के उपायुक्त वरिंदर कुमार शर्मा का कहना है कि सरकार की ओर से किसानों को तीन लाख रुपये मुआवजा दिया जाता है। इसके लिए मृतक किसान के परिवार की ओर से पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफआईआर की कॉपी और कर्ज का विवरण संबंधित विभाग को देना होता है। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मुआवजे के लिए रिपोर्ट भेजी जाती है। कई किसानों के परिवार वाले पोस्टमार्टम और अन्य औपचारिकताओं को पूरा नहीं करते, इसी कारण यह समस्या पैदा होती है।
आढ़तियों का कर्ज बड़ी वजह
कपास की खेती में महंगा बीटी कॉटन बीज और काफी मात्रा में पेस्टीसाइड का इस्तेमाल होता है। इसके लिए ज्यादातर किसान फसल के आधार पर आढ़तियों से पैसा उधार लेते हैं। फसल खराब होने पर यह पैसा चुकाना किसानों के लिए मुश्किल हो जाता है। किसान परिवारों का कहना है कि आढ़ती वसूली के लिए तरह-तरह के दबाव डालते हैं। फसल खराब होने पर सरकार की ओर से कोई उचित मदद नहीं मिलती। अगर मदद मिले तो किसान जान क्यों दें।
449 किसानों ने पिछले साल की थी आत्महत्या
65 किसान इस साल अप्रैल तक दे चुके हैं जान