उम्र होने को है 100 साल, जिंदगी जीते हैं बेमिसाल
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घंटे दिन बनते हैं। दिन हफ्ते और हफ्ते महीनों का रूप लेते हुए कब बरस बन जाते हैं, पता नहीं चलता। वक्त चलता रहता है। अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ता हुआ। कभी-कभी जिंदगी के उजाले भी इसी दौड़ में पीछे छूट जाते हैं।
वही उजाले, जिनकी बदौलत हमारा आज रोशन है। ...लेकिन उजाले तो उजाले हैं, उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि कोई उन्हें साथ रखे या पीछे छोड़ दे। उनका काम है अंधेरे को मिटाना, सो वे अपना उजला धर्म निभाते जाते हैं।
शनिवार को कुछ ऐसे ही उजालों से मुलाकात हुई। यह उजाले हैं हमारे पूर्व सैनिक। इन पूर्व सैनिकों की उम्र 100 साल होने को है, लेकिन इनसे रूबरू हों तो लगता है कि इनका हर साल बेमिसाल गुजरा है। फ्लैग-डे पर छह दिसंबर को प्रशासन इन्हें सम्मानित करने जा रहा है।
97 की उम्र में भी एकदम फिट
बेमिसाल जिंदगी की पहली बानगी से मुखातिब करवाया लेफ्टिनेंट बीएस मलिक ने। सेक्टर-11ए के हाउस नंबर 203 में मलिक साहब से बातचीत हुई। करीब 97 साल के हैं बीएस मलिक। इन्होंने 1942 में फौज में एंट्री की थी। लाहौर स्थित रिजर्व बेस्ड सप्लाइड डिपो में सुपरवाइजर ऑफिसर पद पर तैनात हुए।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बर्मा के नजदीक रामरी आयरलैंड भेज दिया गया। यहां जैपनीज सैनिकों के साथ युद्ध चल रहा था। लेफ्टिनेंट मलिक के पास 26वीं इंडियन डिवीजन (टाइगर डिवीजन) के सैनिकों को खाना पहुंचाने की जिम्मेदारी थी। कई बार उनके नजदीक बम गिरे, लेकिन वे ड्यूटी से नहीं चूके।
रिटायरमेंट के बाद पंजाब सिविल सर्विसेस ज्वाइन की। सेना के अनुशासन और जिंदादिली की झलक अब तक उनमें दिखती है। सुबह चार बजे सैर से दिनचर्या शुरू होती है। रात दस बजे तक अपना हर काम खुद करते हैं।
यही कारण है कि इस उम्र में भी वे फिट हैं। घुटनों का दर्द तक नहीं। मलिक बताते हैं कि इतने साल में कोई सम्मान देने नहीं आया, लेकिन कोई शिकवा नहीं। अब जिला सैनिक वेलफेयर बोर्ड की ओर से फोन आया तो खुशी जरूर हुई।
आधी पेंशन प्रधानमंत्री राहत कोष में
दूसरी मुलाकात सेक्टर-22 डी के हाउस नंबर 3990 में। आर्मी की सिग्नल रेजीमेंट में तैनात रहे रतनचंद 1936 में फौज का हिस्सा बने थे। कागज इनकी उम्र 96 साल बताते हैं और परिजन दावा करते हैं कि वे 100 साल के होने वाले हैं। उम्र के सवाल पर रतनचंद जवाब देते हैं कि उम्र में क्या रखा है। देखा जाए तो बात ठीक भी है।
इस उम्र में रतनचंद रोज दूसरी मंजिल तक सीढ़ियों से जाते हैं। जाने कितनी बार रामायण पढ़ चुके हैं। रिटायरमेंट के बाद भी एक्टिव रहे। खेती की। दो साल पहले तो कमाल कर दिखाया। बीमार थे तो परिजन पीजीआई ले गए। डॉक्टरों ने कहा कि अब इन्हें जाने दो। मत रोको। निराश होकर परिजन उन्हें घर ले आए। घर पहुंचते ही रतनचंद ठीक हो गए।
सैर से उनकी सुबह शुरू होने लगी। सेना ने हमेशा देना सिखाया है, इसलिए रतनचंद अपनी आधी पेंशन प्रधानमंत्री राहत कोष में देना नहीं भूलते। जिला प्रशासन की ओर से सम्मान की बात पर रतनचंद मुस्कुराते हैं। कहते हैं कि सम्मान सिर्फ आपको खास होने का अहसास करवाते हैं। दूसरों के दर्द को साझा करना ही जीने का नाम है, जो बदस्तूर जारी है।