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सिद्धू का इस्तीफाः पुराने पैंतरे से नई इबारत लिखने की प्रयास
Mon, 15 Jul 2019 03:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अशोक नीर, अमृतसर
अशोक नीर, अमृतसर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 15 Jul 2019 03:07 AM IST
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नवजोत सिंह सिद्धू
- फोटो : facebook
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मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से बीते 6 जून को मंत्रिमंडल में किए फेरबदल की बाद ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी नहीं संभाल रहे नवजोत सिद्दू के इस्तीफे ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया है।
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लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ पैदा हुई नाराजगी के बाद मामला उस समय तूल पकड़ गया जब मुख्यमंत्री ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए उनसे स्थानीय निकाय विभाग छीन लिया गया।
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इस के बाद सिद्धू अज्ञातवास में चले गए। तीन दिन पहले ही माता वैष्णो देवी के दरबार से लोटे सिद्धू ने अपने कुछ सहयोगियों की सलाह पर इस्तीफे की कॉपी सोशल मीडिया पर जारी की है। सिद्धू का इस्तीफा अपने पुराने पैतरे से नई राजनीति इबारत लिखने की प्रयास है।
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सिद्धू ने भाजपा के राज्यसभा सदस्य से इस्तीफा दे कर भी सभी को स्तब्ध कर दिया था। सांसद पद से इस्तीफा देने के बाद सिद्धू कांग्रेस में शामिल हुए थे। मंत्री पद से त्यागपत्र दे कर सिद्धू कौन सी पार्टी में शामिल होंगे, यह अभी वक्त के गर्भ में है।
लेकिन सिद्धू की राजनीती उसी तरह करवट ले रही है, जैसे भाजपा के सांसद के नाते उनका विरोध न केवल प्रदेश भाजपा इकाई, अकाली दल की लीडरशिप के साथ-साथ भाजपा की केंद्रीय लीडरशिप के साथ भी था।
विभाग बदलने की बाद सिद्धू कैप्टन अमरिंदर सिंह से ऐसे नाराज हुए जैसे वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अमृतसर संसदीय क्षेत्र से उनका टिकट काटकर वरिष्ठ नेता अरुण जेटली को चुनाव मैदान में उतरा था।
इसके बाद सिद्धू व जेटली के मतभेद गहरा गए थे। उस समय भी भाजपा के कई केंद्रीय नेताओं ने सिद्धू को अपनी नाराजगी दूर कर अरुण जेटली के चुनाव प्रचार में शामिल होने की कई बार अपील की थी। सिद्धू का इन सभी अपीलों पर कोई असर नहीं हुआ।
जैसे उनके मंत्रिमंडल के कई सहयोगियों द्वारा सिद्धू से अपना विभाग संभलाने की जा रही अपील का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। भाजपा द्वारा लोक सभा चुनाव की टिकट काटने का सिद्धू को इतना गुस्सा था की वह मतगणना की दिन भी अरुण जेटली के पक्ष में अपना मत डालने की लिए नहीं आए थे।
जब सिद्धू ने वर्ष 2004, 2007 का उपचुनाव व 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा था तो जेटली ने इनके चुनाव की बागडोर संभाली थी। चुनाव प्रचार के दौरान सिद्धू जेटली को अपने राजनितिक गुरु का दर्जा देते थे।
जट्ट सिख होने के कारण भाजपा ने सिद्धू के झेले कई नखरे
सिद्धू-जेटली के बीच पैदा हुई दूरियों के बावजूद भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा। पंजाब में भाजपा के पास एक मात्र जट्ट सिख नेता सिद्धू ही थ, इसलिए भाजपा ने सिद्धू का हर राजनीतिक नखरा झेला। प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की पास कैप्टन अमरिंदर सिंह सहित सैकड़ों जट्ट सिख नेता है, इसलिए सिद्धू के रुठ जाने के इस नखरे को स्वीकार नहीं किया।
सिद्धू व कैप्टन के बीच बड़ी दुर्रियों को मिटने की लिए राहुल गांधी ने भी कोई प्रयास नहीं किए। यही कारण है की सिद्धू द्वारा 6 जून को दिए इस्तीफे की बावजूद राहुल गांधी ने उस पर चुपी साधे रखी। अंत कोई हल न देखकर सिद्धू ने अपने इस्तीफे की कॉपी 34 दिन बाद सार्वजनिक कर दी।