युवक के उड़ गए होश, बिना कर्ज लिए पैन नंबर से जारी हो गए 45 लोन, लाखों का बना कर्जदार
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ऑटो मार्केट में मिस्त्री का काम करने वाले रामनगर निवासी रमेश स्कूटर खरीदने के लिए लोन लेने बैंक गए तो उन्हें पता चला कि वह तो पहले से करोड़ों रुपयों के कर्जदार हैं। उन्होंने विभिन्न बैंकों से गोल्ड, ऑटो, पर्सनल, कामर्शियल और कस्टमर सहित दर्जनों लोन ले रखे हैं।
सभी लोन रमेश के पैन नंबर पर जारी किए गए हैं। जबकि रमेश ने किसी भी बैंक से किसी भी प्रकार का कोई लोन नहीं लिया है। जानकारों का कहना है कि ऐसा सी-बिल में किसी गड़बड़ी की वजह से हो सकता है।
रमेश ने बताया कि उनके परिवार में उनकी पत्नी कांता है, जो हाउस वाइफ हैं। बेटा सुनील बी-टेक कर रहा है, बेटी पूजा बीए फाइनल में है। परिवार में कमाने वाला वह अकेला है। ऑटो मार्केट में खोखा डाला हुआ है। गाड़ियों में शीशे लगाने और पेंट का काम करके परिवार का गुजारा करता है।
उन्हें अपने काम से एक दोपहिया वाहन की जरूरत पड़ी, तो बैंक से लोन लेने की सोची। एक दिन इस सिलसिले में बैंक गए तो जानकर हैरान रह गए कि उनके नाम से दर्जनों लोन लिए जा चुके हैं। इस कारण बैंक ने लोन देने से ही इनकार कर दिया।
रमेश के नाम कुल 45 लोन, फिलहाल चल रहे बारह
रमेश के अनुसार बैंक के अधिकारियों ने बताया कि उसके नाम से कुल 45 लोन लिए गए हैं, जिनमें से 12 फिलहाल चल रहे हैं। रमेश के नाम पर ऑटो के हिसार के आठ लोन, ट्रैक्टर का एक लोन मुगलपुरा उकलाना हिसार, पांच गोल्ड लोन, एक कामर्शियल लोन, तीन हाउसिंग लोन, टूव्हीलर लोन आदि लिए गए हैं। फिलहाल जो चल रहे हैं, उनमें 3 अदर्स लोन, 2-2 पर्सनल और बिजनेस लोन, ऑटो, हाउसिंग, कंज्यूमर, ओवरड्राफ्ट, टू व्हीलर के 1-1 लोन शामिल हैं।
जितने की किस्त, उतनी आय नहीं
रमेश के नाम से झुंझुनू राजस्थान में 10 लाख रुपये का हाउसिंग लोन लिया गया है, जिसकी मासिक किस्त 24 हजार रुपये है, जबकि रमेश की इतनी मंथली इनकम नहीं है। इसी प्रकार रमेश के नाम से कहीं 10 लाख का तो कहीं 5 लाख का और कहीं 7 लाख का लोन लिया गया है। कुछ लोन 1-2 लाख के भी हैं तो कुछ हजारों में भी हैं।
सॉफ्टवेयर की हो सकती है गड़बड़ी
बैंकिंग क्षेत्र में 5-6 साल पहले सी-बिल नाम का सॉफ्टवेयर आया था। उसमें पैन नंबर डालते ही संबंधित व्यक्ति की डिटेल आ जाती है कि उसने कहां-कहां से लोन लिया है। अगर डिफॉल्टर है तो वह भी आ जाता है। कई बार सी-बिल में डाटा एंट्री करते समय गड़बड़ी हो जाती है। जो डाटा शुरू में कैप्चर किया होगा, वही बाद तक उठाता रहता है।
ऐसे बहुत सारे केस आते हैं। इसमें बैंक भी क्वेरी डाल सकता है और पीड़ित भी। इसके बाद डाटा को ठीक कर दिया जाता है। जिसके नाम लोन दिखाई दे रहे हैं, उसे ज्यादा नुकसान नहीं होता, लेकिन जब उसे लोन की जरूरत होती है तो लोन पास नहीं हो पाता। - राजबहादुर आर्य, सेवानिवृत्त मैनेजर, एसबीआई।