एचएसजीपीसी को मान्यता: SGPC का सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानने से इन्कार, दाखिल करेगी पुनर्विचार याचिका
एसजीपीसी अध्यक्ष ने कहा कि सिख गुरुद्वारा एक्ट-1925 में किसी भी तरह का संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है और वह भी एसजीपीसी के जनरल हाउस की मंजूरी से ही संभव है। सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 में संशोधन के मानदंड निर्धारित हैं, इसलिए राज्य सरकारें इसके अधिकार क्षेत्र को कम नहीं कर सकती।
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शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन अधिनियम-2014 को मान्यता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राजनीति से प्रेरित बता खारिज कर दिया है। चंडीगढ़ के कलगीधर निवास में शुक्रवार को एसजीपीसी के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई आंतरिक कमेटी की आपात बैठक में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विचार करने के बाद एक विशेष प्रस्ताव पारित किया गया।
इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि सिख गुरुद्वारा एक्ट 1925 लागू रहते, कोई भी राज्य अधिनियम एसजीपीसी के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित नहीं कर सकता। यह भी फैसला लिया गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की जाएगी। इस बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में धामी ने पारित प्रस्ताव की जानकारी देते हुए आरोप लगाया कि अलग हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एचएसजीपीसी) के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की ओर से लिया गया फैसला विशुद्ध रूप से राजनीतिक है।
उन्होंने कहा कि आंतरिक कमेटी ने एचएसजीपीसी के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का भी फैसला किया है। इसके साथ ही एसजीपीसी के सभी सदस्यों की एक विशेष बैठक 30 सितंबर को अमृतसर में बुलाई गई है, जिसमें आगे की रणनीति पर चर्चा की जाएगी।
आंतरिक कमेटी की बैठक में एसजीपीसी के सीनियर उपाध्यक्ष रघुजीत सिंह विर्क, महासचिव जत्थेदार करनैल सिंह पंजोली, कमेटी के सदस्य सुरजीत सिंह कंग, सरवन सिंह कुलार, जरनैल सिंह डोगरांवाला, बलविंदर सिंह वेईंपुईं, गुरिंदरपाल सिंह गोरा, अमरजीत सिंह बंडाला, गुरप्रीत कौर, जौध सिंह समरा, बाबा गुरप्रीत सिंह, एसजीपीसी के अतिरिक्त सचिव परमजीत सिंह सरोओ, प्रताप सिंह, सुखमिंदर सिंह भी मौजूद रहे।
सिख गुरुद्वारा एक्ट-1925 में संशोधन संभव, लेकिन...
एसजीपीसी अध्यक्ष ने कहा कि सिख गुरुद्वारा एक्ट-1925 में किसी भी तरह का संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है और वह भी एसजीपीसी के जनरल हाउस की मंजूरी से ही संभव है। सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 में संशोधन के मानदंड निर्धारित हैं, इसलिए राज्य सरकारें इसके अधिकार क्षेत्र को कम नहीं कर सकती।
समय-समय पर सरकारें सिख शक्ति को कमजोर करने और एसजीपीसी में हस्तक्षेप करने के लिए कदम उठाती रही हैं लेकिन उन्हें हर बार सिख समुदाय के रोष के आगे झुकना पड़ा है। 1959 में कांग्रेस की केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की लेकिन उसे आखिरकार सिख समुदाय के विरोध के आगे झुकना पड़ा।
उस समय सिख समुदाय के विरोध के बाद अप्रैल 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और एसजीपीसी के अध्यक्ष मास्टर तारा सिंह के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके तहत सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 में संशोधन के लिए एसजीपीसी के साधारण इजलास की मंजूरी अनिवार्य घोषित की गई थी।
भाजपा के साथ हुड्डा, कैप्टन और आप पर साधा निशाना
एडवोकेट धामी ने आरोप लगाते हुए कहा कि सिख समुदाय को इस बात का दुख है कि भाजपा और इसे चलाने वाला आरएसएस भी कांग्रेस के नक्शेकदम पर चल रहे हैं। अगर हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने एचएसजीपीसी के लिए असांविधानिक साजिश के तहत एक्ट पास करके एसजीपीसी को तोड़ने की कोशिश की थी तो भाजपा की मौजूदा सरकार भी पीछे नहीं रही। धामी ने कहा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अकाली सरकार के दौरान अपना हलफनामा बदलकर सिख विरोधी होने का सबूत पेश किया और मौजूदा आम आदमी पार्टी सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा का ही पक्ष लिया।
एचएसजीपीसी को नहीं दे सकते मान्यता: धामी
धामी ने कहा कि एचएसजीपीसी को असांविधानिक, गैर-सैद्धांतिक और अवैध दृष्टिकोण से दी गई मान्यता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है और सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 के अस्तित्व को राज्य सरकारें अपनी इच्छा से समाप्त नहीं कर सकती हैं। एसजीपीसी का अधिकार क्षेत्र सिख गुरुद्वारा अधिनियम 1925 के अनुसार है, जो पहले की तरह बरकरार है इसलिए हरियाणा सरकार को गुरुद्वारा अधिनियम 1925 के तहत कार्यशील किसी भी गुरुद्वारा साहिब या संस्था को हथियाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हम हरियाणा के सिख संगतों की भावनाओं की सराहना करते हैं लेकिन सर्वोच्च सिख निकाय एसजीपीसी को तोड़ने वाली शक्तियों की चालों को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।