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...जब उठी मेयर के अधिकार बढ़ाने की मांग
अमर उजाला, पंचकूला
Updated Wed, 18 Dec 2013 02:06 PM IST
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म्यूनिसिपल काउंसिल के पूर्व वाइस प्रेजीडेंट बीबी सिंघल ने मुख्यमंत्री को ई-मेल भेजकर स्थानीय शहरी निकायों में चुने गए जन प्रतिनिधियों और मेयर के अधिकार बढ़ाए जाने की मांग की है।
मेल में लिखा है कि शहरी क्षेत्र के विकास और इसकी मेंटीनेंस के लिए गठित नगर परिषद, नगर निगम या नगर पालिका में चुने गए प्रतिनिधियों को नगण्य अधिकार हैं।
उन्हें वित्तीय अधिकार भी दिए जाने चाहिए। विभागीय खींचतान में विकास की रफ्तार धीमी हो गई है।
सिंघल ने म्यूनिशिपल कॉरपोरेशन एक्ट-1994 की धारा 42, 43 और 44 का हवाला देते हुए कहा कि निगमों के पास कई जिम्मेदारियां हैं, लेकिन अभी तक मेयर के पास पूर्ण अधिकार नहीं मिले हैं, नतीजतन विकास कार्यों में दिक्कतें पेश आ रही हैं।
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इन जिम्मेदारियों में अर्बन प्लानिंग, सामाजिक एवं आर्थिक विकास से संबंधित योजनाएं, सड़क एवं ब्रिज के निर्माण, स्लॉटर हाउस से संबंधित प्रावधान, ड्रेनेज और सीवरेज की सफाई के साथ साथ जन सुविधाओं के इंतजाम, पानी की आपूर्ति और मेंटीनेंस, चिल्ड्रंस होम, रेस्ट हाउस, गरीबों के लिए घर, निशक्तों के लिए भवन निर्माण सहित दर्जनों कार्य शामिल हैं। ई-मेल में जन प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित मेयर को भी केवल हाउस की मीटिंग, सब-कमेटी की मीटिंग के अलावा कोई भी प्रशासनिक अधिकार नहीं दिए जाने का जिक्र किया गया है।
इसके अलावा ई-मेल में यह भी जिक्र किया गया है कि हाउस की मीटिंग में पास होने वाले किसी भी एजेंडा पर अंतिम स्वीकृति भी अफसरों द्वारा दी जाती है।
ऐसे में जन प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई समस्याओं या विकास संबंधी योजनाओं को सिरे चढ़ाना मुश्किल हो जाता है। म्यूनिसिपल काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि नगर निगम और चुने हुए प्रतिनिधियों को एक्ट के तहत अन्य अधिकार भी दिए जाने चाहिए, साथ ही वित्तीय अधिकार भी बढ़ाए जाने चाहिए। इससे विकास की रफ्तार में तेजी आएगी और आम लोगों की समस्याओं का भी जल्द से जल्द निपटारा होगा।
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मेल में लिखा है कि शहरी क्षेत्र के विकास और इसकी मेंटीनेंस के लिए गठित नगर परिषद, नगर निगम या नगर पालिका में चुने गए प्रतिनिधियों को नगण्य अधिकार हैं।
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उन्हें वित्तीय अधिकार भी दिए जाने चाहिए। विभागीय खींचतान में विकास की रफ्तार धीमी हो गई है।
सिंघल ने म्यूनिशिपल कॉरपोरेशन एक्ट-1994 की धारा 42, 43 और 44 का हवाला देते हुए कहा कि निगमों के पास कई जिम्मेदारियां हैं, लेकिन अभी तक मेयर के पास पूर्ण अधिकार नहीं मिले हैं, नतीजतन विकास कार्यों में दिक्कतें पेश आ रही हैं।
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इन जिम्मेदारियों में अर्बन प्लानिंग, सामाजिक एवं आर्थिक विकास से संबंधित योजनाएं, सड़क एवं ब्रिज के निर्माण, स्लॉटर हाउस से संबंधित प्रावधान, ड्रेनेज और सीवरेज की सफाई के साथ साथ जन सुविधाओं के इंतजाम, पानी की आपूर्ति और मेंटीनेंस, चिल्ड्रंस होम, रेस्ट हाउस, गरीबों के लिए घर, निशक्तों के लिए भवन निर्माण सहित दर्जनों कार्य शामिल हैं। ई-मेल में जन प्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित मेयर को भी केवल हाउस की मीटिंग, सब-कमेटी की मीटिंग के अलावा कोई भी प्रशासनिक अधिकार नहीं दिए जाने का जिक्र किया गया है।
इसके अलावा ई-मेल में यह भी जिक्र किया गया है कि हाउस की मीटिंग में पास होने वाले किसी भी एजेंडा पर अंतिम स्वीकृति भी अफसरों द्वारा दी जाती है।
ऐसे में जन प्रतिनिधियों द्वारा उठाई गई समस्याओं या विकास संबंधी योजनाओं को सिरे चढ़ाना मुश्किल हो जाता है। म्यूनिसिपल काउंसिल के पूर्व उपाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि नगर निगम और चुने हुए प्रतिनिधियों को एक्ट के तहत अन्य अधिकार भी दिए जाने चाहिए, साथ ही वित्तीय अधिकार भी बढ़ाए जाने चाहिए। इससे विकास की रफ्तार में तेजी आएगी और आम लोगों की समस्याओं का भी जल्द से जल्द निपटारा होगा।