सरस्वती नदीः क्या कहती हैं मान्यताएं और दस्तावेज?
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यमुनानगर और आसपास के लोग मानते हैं कि आदिबद्री में सरस्वती नदी का उदगम स्थल है। पहाड़ों से उतरने के बाद सरस्वती नदी मैदानी क्षेत्र में सबसे पहले यहां नजर आती है।
पहाड़ों से बूंदों के रूप में जमीन पर नदी उतरती है और उद्गम स्थल पर बने एक कुंड में पानी एकत्र होता है। वर्ष 2004 में सरस्वती उदगम स्थल के नजदीक एक सरोवर का निर्माण करवाया गया।
उदगम स्थल के कुंड से सरस्वती के जल को सरोवर तक पहुंचाया जाता है। सरस्वती नदी के उदगम स्थल को देखने के लिए प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु यहां आने लगे हैं।
ईसा से 3000 साल पहले लुप्त हुई सरस्वती
इसरो के जोधपुर स्थित रीजनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने ‘लुप्त वैदिक सरस्वती’ नदी के पूरे ड्रेनेज नेटवर्क का ट्रेस किया है। यह शिवालिक की तराई से अरब सागर तक सरस्वती का रास्ता बताता है, जबकि रिपोर्ट में यह संभावना भी व्यक्त की गई है कि नदी का स्रोत ऊंचे हिमालय में रहा होगा।
यह ग्रेट हिमालय से निकल कर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान होते हुए गुजरात के रण के कच्छ तक जाती थी। ईसा से 3000 साल पहले यह लुप्त हो गई। मगर इसके पेलियोचैनल अब भी उक्त राज्यों में हैं। नदी के तलछट की जांच में रेडियोमीट्रिक उम्र 28000 साल आई है।
यह नदी 8000 साल ईसा पूर्व से 5000 साल पूर्व तक अपने पूरे प्रवाह में थी। राजस्थान में इसके पेलियो चैनल से निकले पानी की जांच की गई। यह 18800 साल पुराना था, जितना कि सरस्वती नदी।
ब्रिटिश काल के दस्तावेज
कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के जियोलॉजीकल विभाग के प्रोफेसर एके चौधरी सरस्वती नदी पर शोध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राजस्व विभाग के ब्रिटिश कालीन दस्तावेजों में सरस्वती नदी की स्थिति को दर्शाया गया है।
इसी आधार पर सरस्वती की सूखी धारा की जमीन की पहचान की गई है। पटवारियों के इस आकलन को झुठलाया नहीं जा सकता। ब्रिटिशकालीन इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर सरस्वती नदी की खुदाई शुरू की गई है।
ये कहना है पुरात्तवविदों का
रेत, पत्थरों और खनिजों की पांच परतें यह सिद्ध करती हैं कि मुगलवाल के इस इलाके में कोई नदी रही है। पानी की जांच रिपोर्ट आने में अभी समय लगेगा। राजस्व रिकार्ड और धार्मिक मान्यताओं में जिसे सरस्वती का बहाव क्षेत्र कहा गया है, ठीक उसी जगह पर खुदाई की जा रही है। ऐसे में इस जगह से निकल रहा पानी सरस्वती या उसकी किसी सहायक नदी का जल होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
- प्रो. डॉ. एआर चौधरी, चेयरमैन, जियोलॉजी विभाग, केयू
सरस्वती का मिलना अतीत, वर्तमान और भविष्य का संकेत
राजस्व रिकार्ड में सरस्वती नदी का जिक्र है। राजस्व रिकार्ड के अनुसार बिल्कुल सही जगह पर सरस्वती नदी की खुदाई की जा रही है। मुगलवाली में जहां से पानी निगला है उसके आसपास कहीं भी इतनी कम गहराई में पानी नहीं है।
-गगनदीप सिंह, डीडीपीओ (सरस्वती खुदाई प्रोजेक्ट में अहम भूमिका)
हरियाणा में पेलियोचैनल इतने विशालकाय हैं कि इनमें अथाह पानी स्टोर किया जा सकता है। बरसात में पहाड़ों से आने वाला बाढ़ के रूप में तबाही मचाता है। इस पानी को इन पेलियो चैनल्स में स्टोर किया जा सकता है। बाद में जरूरत के मुताबिक इस पानी को इस्तेमाल किया जा सकता है।
-डॉ. आर हुड्डा, चीफ साइंटिस्ट, हरियाणा स्पेस एप्लीकेशन सेंटर
मुगलवाली में खुदाई में जो संगमरमर और अन्य गोल पत्थर निकले हैं, वैसे पत्थर जमीन के नीचे नहीं मिलते। पत्थरों पर पानी में बहने से हुए कटाव साफ नजर आते हैं। इससे जाहिर है कि पत्थर काफी दूर से बहकर आए हैं। ऐसे पत्थर नदी के साथ ही आते हैं।
-जीएन श्रीवास्तव, अधीक्षक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग