पंजाब का राजनीतिक इतिहास: उपचुनाव में हमेशा नहीं जीतती सत्ताधारी पार्टी, दो सीएम भी नहीं टाल पाए थे हार
जालंधर की पश्चिम विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी के मोहिंदर भगत को एकतरफा जीत मिली थी। पंजाब में आमतौर पर उपचुनाव में सत्ताधारी पार्टी ही जीतती है लेकिन दो बार इसका उलट हो चुका है।
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जालंधर पश्चिम उपचुनाव में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी को एकतरफा जीत मिली है। आमतौर पर माना जाता है कि उपचुनाव में हमेशा सत्ताधारी पार्टी ही जीतती है लेकिन ऐसा नहीं है।
पंजाब में प्रकाश सिंह बादल व बेअंत सिंह दोनों बेशक शक्तिशाली मुख्यमंत्री के रूप में जाने जाते हैं लेकिन वह सत्ता में होते हुए भी अपनी पार्टी को दो विधानसभा उपचुनाव में जीत नहीं दिला सके थे।
1995 में पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी और बेअंत सिंह सीएम थे। 1992 में अकाली दल के बायकॉट पर जीते कांग्रेस विधायक रघुबीर सिंह को चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिए जाने पर सीट खाली हुई थी। 1995 में उपचुनाव हुए तो प्रकाश सिंह बादल ने अपने भतीजे मनप्रीत सिंह बादल को इस सीट पर उतारा।
बेअंत सिंह की सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी। बेहद कांटे की टक्कर में मनप्रीत ने कांग्रेस के दीपक कुमार को 1800 वोटों से हराया था। सरकार कांग्रेस की होने के बावजूद वह सीट नहीं बचा पाई थी। यहीं से अकाली दल दोबारा पंजाब में मजबूत होने लगा।
1997 में बादल सरकार के रहते जीते थे कांग्रेस के राकेश पांडे
1997 में प्रकाश सिंह बादल की सरकार बनी। कांग्रेस के राकेश पांडे लुधियाना से जीते थे। भाजपा के दो दावेदारों का नामांकन रद्द हुआ। भाजपा चुनाव अफसर पर समय न देने का आरोप लगा हाईकोर्ट गई। 1999 में फिर चुनाव हुए और पांडे फिर जीते। उस समय प्रकाश सिंह बादल सत्ता में थे।
1998 में अकाली दल भाजपा की संयुक्त सरकार थी। बापू सरूप सिंह निकाय मंत्री थे लेकिन उनका स्वर्गवास हो गया। उपचुनाव हुए तो आदमपुर उपचुनाव में विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कंवलजीत सिंह लाली ने सत्ताधारी अकाली दल के दलबीर सिंह धीरोवाल को मात्र 6 वोट से हराया था। लाली को 35285 वोट मिले तो धीरोवाल को 35279 वोट। कांग्रेस ने 31 साल बाद यह सीट जीती थी। इससे पहले दर्शन सिंह यहां से 1967 में जीते थे।
ज्यादातर सत्ताधारी पार्टी जीतती आ रही है चुनाव..
पंजाब में अधिकतर उपचुनावों में सत्ताधारी पार्टी की जीत होती रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के 2017 के कार्यकाल में पूर्व मंत्री अजीत सिंह कोहाड़ का निधन हुआ तो शाहकोट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के लाडी ने 38 हजार से ज्यादा मतों की जीत हासिल की।
2009 में जब शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठजोड़ की सरकार थी तो काहनूवान की सीट पर हुए उपचुनाव में सेवा सिंह सेखवां ने कांग्रेस के फतेहजंग बाजवा को 12,044 मतों से परास्त किया। भाजपा के विधायक अमरजीत सिंह शाही के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी सुखजीत कौर शाही ने कांग्रेस के अरुण डोगरा को 47,431 मतों के भारी अंतर से परास्त किया। तब पंजाब में अकाली दल भाजपा की सरकार थी।
2013 में कांग्रेस को छोड़कर अकाली दल में शामिल हुए जोगिंदरपाल जैन अकाली दल की टिकट पर मोगा से फिर से विजयी हो गए जैन ने कांग्रेस के विजय साथी को 18849 वोटों के अंतर से हराया। तब पंजाब में अकाली भाजपा सरकार थी। 2014 में अकाली दल ने कांग्रेस की एक और विकेट अपने पक्ष में गिरा ली। तलवंडी साबो से कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी माने जाने वाले जीत मोहिंदर सिंह सिद्धू अकाली दल में शामिल हो गए और उन्होंने उपचुनाव में कांग्रेस के हरमिंदर सिंह जस्सी को 46642 मतों के अंतर से हराया।
2015 में धूरी से कैप्टन के एक और करीबी अरविंद खन्ना के पार्टी के साथ साथ सियासत छोड़ जाने से खाली हुई सीट फिर से सत्ताधारी पार्टी अकाली दल के हाथ लगी। अकाली दल के गोबिंद सिंह लोंगोवाल ने युवा नेता सिमरप्रताप सिंह को 37 हजार मतों के अंतर से हराया। खडूर साहिब सीट पर 2016 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने चुनाव न लडऩे का फैसला किया। एकतरफा मैच में अकाली दल के रविंदर सिंह ब्रह्मपुरा भारी मतों के अंतर से जीत गए। अब भगत चुन्नी लाल ने आप की टिकट पर उपचुनाव में 37 हजार 325 से वेस्ट सीट जीती है।