चंडीगढ़ एस्टेट ऑफिस के हाल: 28 साल तक एक बूथ के लिए कटवाए चक्कर, सुप्रीम कोर्ट तक के आदेश नहीं माने, अब आयोग ने लगाया जुर्माना
लखबीर सिंह ने वर्ष 1991 में सेक्टर-44 में 99 साल के लिए एक बूथ खरीदा। उन्होंने 25 फीसदी राशि का भुगतान कर दिया। बूथ के आवंटन के बाद एस्टेट ऑफिस ने वादे अनुसार मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं कराईं तो वे अप्रैल 1993 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट चले गए कि जब एस्टेट ऑफिस ने सुविधाएं ही नहीं दी, तो वो बाकी के पैसे क्यों दें।
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चंडीगढ़ एस्टेट ऑफिस किस तरह से लोगों को परेशान करता है, इसका उदाहरण सेक्टर-44 में रहने वाले मुकेश गोयल हैं। उन्हें एक बूथ के लिए करीब 28 साल संघर्ष करना पड़ा। बूथ का मामला एसडीएम कोर्ट से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गया। बूथ को बहाल करने के आदेश भी हुए लेकिन एस्टेट ऑफिस ने लटकाए रखा। अंत में सेवा का अधिकार आयोग ने मामले में संज्ञान लिया और ब्रांच हेड पर जुर्माना लगाने के साथ कार्रवाई के आदेश दिए हैं।
लखबीर सिंह ने वर्ष 1991 में सेक्टर-44 में 99 साल के लिए एक बूथ खरीदा। उन्होंने 25 फीसदी राशि का भुगतान कर दिया। बूथ के आवंटन के बाद एस्टेट ऑफिस ने वादे अनुसार मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं कराईं तो वे अप्रैल 1993 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट चले गए कि जब एस्टेट ऑफिस ने सुविधाएं ही नहीं दी, तो वो बाकी के पैसे क्यों दें। इसके कुछ ही दिन बाद एस्टेट ऑफिस ने बूथ का आवंटन रद्द कर दिया।
मुकेश गोयल (जीपीए ऑफ लखबीर सिंह) ने बताया कि किसी भी संपत्ति के आवेदन को रद्द करने के बाद कब्जा लेने के लिए दो महीने के अंदर स्थानीय एसडीएम को फाइल पेश करनी होती है, लेकिन एस्टेट ऑफिस ने ऐसा नहीं किया। हाईकोर्ट में कई वर्ष केस चला लेकिन एस्टेट ऑफिस ने कभी नहीं जिक्र किया कि उन्होंने बूथ रद्द कर दिया है। वर्ष 2012 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और उन्होंने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया। इसके खिलाफ एस्टेट ऑफिस ने एसएलपी दाखिल कर दी, जिसे शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया। इसके साथ ही एस्टेट ऑफिस केस हार गया। वर्ष 2015 में 4 लाख 9500 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट मुकेश गोयल ने जमा कराया और मांग रखी कि कोर्ट के आदेशानुसार उन्हें बाकी बकाये की राशि की जानकारी दी जाए, ताकि वो जमा कराने के बाद काम शुरु कर सकें। लेकिन एस्टेट ऑफिस ने उन्हें फिर प्रशासन के वित्त सचिव के पास अपील में जाने के लिए कहा।
एस्टेट ऑफिस के अधिकारियों के बहाने सुनकर आयोग के चेयरमैन भी हुए खफा
मुकेश गोयल ने बताया कि वित्त सचिव के पास अपील में जाने के बाद भी वो बूथ के लिए पांच साल एसडीएम-कम-एस्टेट ऑफिसर साउथ के पास चक्कर काटते रहे। दिसंबर 2020 में एसडीएम-कम-एस्टेट ऑफिसर ने ब्रांच इंचार्ज को आदेश दिए कि उनकी लापरवाही की वजह से ये देरी हुई है, इसलिए 15 दिन के अंदर बकाया राशि बताएं और मुकेश गोयल को कहा गया कि वो दो महीने के अंदर इस राशि को जमा करें। इस आदेश के बाद भी मुकेश गोयल ने कई बार एस्टेट ऑफिस को पत्र लिखा, वो दफ्तर भी गए लेकिन उन्हें राशि नहीं बताई गई। गोयल ने बताया कि तंग आकर मार्च 2022 में उन्होंने सेवा का अधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया। दो सुनवाई हुई। सुनवाई में आयोग के चेयरमैन केके जिंदल ने एस्टेट ऑफिस से अधिकारी से देरी का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि वो वरिष्ठ अधिकारियों से मंजूरी का इंतजार कर रहे थे। इस पर आयोग ने जमकर फटकार लगाई और कहा कि जब पहले ही एस्टेट ऑफिसर बकाया राशि बताने के आदेश दे चुके हैं, तो फिर वो किस आदेश का इंतजार कर रहे थे।
आयोग ने सुनवाई के बाद जारी किए ये आदेश
आयोग ने एस्टेट ऑफिस के ब्रांच इंजार्च पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। कहा गया है कि इसमें से 9 हजार रुपये मुकेश गोयल को मुआवजा के तौर पर दिया जाएगा। एस्टेट ऑफिसर को आदेश दिए हैं कि बकाया राशि को बताने में देरी करने पर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ जांच के आदेश दें या फिर सख्त कार्रवाई करें।
काम नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट भी लगा चुका है फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में चंडीगढ़ एस्टेट ऑफिस को जमकर फटकार लगाई थी। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने अपने आदेश में यहां तक लिखा कि एस्टेट ऑफिस की कार्यप्रणाली ये है कि, तुम मुझे चेहरा दिखाओ, मैं नियम दिखाऊंगा। सुप्रीम कोर्ट ने एस्टेट ऑफिस को अंडरबेली तक कह दिया था। आदेश में लिखा कि, अधिकारी ऐसे निर्णय लेने में असमर्थ हैं जो नागरिक हितैषी हैं। यहां तक कि एस्टेट ऑफिस के कामकाज में आ रही बाधाओं को दूर करने का भी प्रयास नहीं किया जाता है।