शोध में खुलासा: शैवाल से तैयार हो सकता है बायो डीजल, पीयू के प्रोफेसर की रिसर्च में सामने आया परिणाम
प्रो. आहलुवालिया ने पीयू के बॉटनीकल गार्डन के अलावा हिमाचल प्रदेश, पंजाब के कई क्षेत्रों में जाकर शैवाल पर अध्ययन किया है। उन्होंने शैवाल में पाए जाने वाले अवयवों के बारे में जाना।
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पंजाब विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो. एएस आहलुवालिया के शोध में बड़े खुलासे हुए हैं। उन्होंने शैवाल (काई) पर शोध किया है। उसके परिणाम चौंकाने वाले हैं। शैवाल के जरिए बायो डीजल तैयार हो सकता है। इसके अलावा शैवाल वायुमंडल में सीओटू की मात्रा कम करने में कारगर है। साथ ही यह सीवर ट्रीटमेंट में भी सहायक है। प्रो. आहलुवालिया ने भारत सरकार को सुझाव दिया है कि डीजल की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी को शैवाल के जरिए भी काबू में किया जा सकता है।
प्रो. आहलुवालिया ने पीयू के बॉटनीकल गार्डन के अलावा हिमाचल प्रदेश, पंजाब के कई क्षेत्रों में जाकर शैवाल पर अध्ययन किया है। उन्होंने शैवाल में पाए जाने वाले अवयवों के बारे में जाना। उन अवयवों की वजह से ही शैवाल की ग्रोथ होती है। शोध में पाया गया है कि समुद्रों में भी शैवाल बड़ी संख्या में होता है, जो पानी का शोधन करता है। बायो डीजल में काम आने वाले कच्ची सामग्री के रूप में शैवाल को मिलाया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने सलाह दी है कि खाली खेतों में शैवाल उगाया जा सकता है। यह बारिश के पानी से ही पैदा हो जाएगा। विशेष पानी के प्रबंध नहीं करने पड़ेंगे।
वजीराबाद में चल रहा है ट्रीटमेंट
शोध के जरिए उन्होंने सीवर ट्रीटमेंट का भी अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि दिल्ली के वजीराबाद में वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगा है। वहां शैवाल का प्रयोग शोधन में शुरू हो गया है। यही नहीं शैवाल से बायो फर्टिलाइजर भी बनाए जा सकते हैं। शोध में प्रो. अहलुवालिया को पांच साल लगे हैं। उनके साथ कई शोधार्थियों ने भी काम किया है। शोध के जरिए इस टीम ने यह भी बताया है कि ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को यह कम करता है।
शैवाल पर किए गए अध्ययन के चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। इससे कई लाभ होंगे। शोध की रिपोर्ट और पूरा प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा गया है। इससे बायो डीजल आदि बन सकेगा। यह वायुमंडल में सीओटू की मात्रा कम करने में कारगर है। क्योंकि शैवाल को खुद सीओटू की आवश्यकता होती है। सीवरेज ट्रीटमेंट में भी यह सहायक है। -प्रो. एएस अहलुवालिया, वरिष्ठ प्रोफेसर, वनस्पति विज्ञान विभाग पीयू