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‘शिखर पर शब्द’: 35 मिनट की डॉक्यूमेंट्री, नामी लेखक के 83 वर्षों का संघर्ष
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 29 Aug 2016 03:52 PM IST
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गुरदयाल सिंह के जीवन पर बनाई गई डोक्यूमेंट्री
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35 मिनट की डॉक्यूमेंट्री में समेटी गई पंजाबी के प्रसिद्ध नॉवलिस्ट गुरदयाल सिंह के 83 वर्षों के संघर्ष की कहानी बेहद दिलचस्प है। गवर्नमेंट म्यूजियम और आर्ट गैलरी में रविवार को पंजाबी के प्रसिद्ध नॉवलकार गुरदयाल सिंह को दलित वर्ग के लोगों को अपनी लेखनी में हीरो बनाकर पेश किया गया। यहां रविवार को उनके जीवन पर आधारित दो फिल्मों की स्क्रीनिंग की गई।
‘शिखर पर शब्द’ नाम की 35 मिनट की शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री में जहां गुरदयाल सिंह के जीवन को छुआ। वहीं उनके साथ पंजाब यूनिवर्सिटी के पंजाबी अध्ययन विभाग के एचओडी डॉक्टर सुखदेव सिंह द्वारा 1999 में किए गए साक्षात्कार के कुछ अंशों को भी दिखाया गया। इस मौके पर होम सेक्रेटरी अनुराग अग्रवाल विशेष तौर पर उपस्थित रहे।
35 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री के बाद ग्लिम्प्सेस ऑफ परसा नाम से गुरदयाल सिंह के नावल परसा को 38 मिनट की फिल्म के जरिये दिखाया गया। दोनों मूवीज का निर्माण प्रवीन अरोड़ा ने कबीर प्रोडक्शन के साथ मिलकर किया। शिखर पर शब्द नाम की इस फिल्म की शुरुआत जैतों मंडी के रेलवे स्टेशन के दृश्य से होती है। उसके बाद गुरदयाल सिंह का इंटरव्यू आता है।
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इनका जन्म पंजाब के भाइनी फतेह में 10 जनवरी 1933 को हुआ था। अभी हाल ही में बठिंडा में 16 अगस्त 2016 को उनका देहांत हो गया है। वह 83 साल के थे। 1999 में डॉक्टर सुखदेव सिंह द्वारा लिए गए इंटरव्यू के जरिये जानते हैं गुरदयाल सिंह की जिंदगी के बारे में।
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‘शिखर पर शब्द’ नाम की 35 मिनट की शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री में जहां गुरदयाल सिंह के जीवन को छुआ। वहीं उनके साथ पंजाब यूनिवर्सिटी के पंजाबी अध्ययन विभाग के एचओडी डॉक्टर सुखदेव सिंह द्वारा 1999 में किए गए साक्षात्कार के कुछ अंशों को भी दिखाया गया। इस मौके पर होम सेक्रेटरी अनुराग अग्रवाल विशेष तौर पर उपस्थित रहे।
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35 मिनट की इस डॉक्यूमेंट्री के बाद ग्लिम्प्सेस ऑफ परसा नाम से गुरदयाल सिंह के नावल परसा को 38 मिनट की फिल्म के जरिये दिखाया गया। दोनों मूवीज का निर्माण प्रवीन अरोड़ा ने कबीर प्रोडक्शन के साथ मिलकर किया। शिखर पर शब्द नाम की इस फिल्म की शुरुआत जैतों मंडी के रेलवे स्टेशन के दृश्य से होती है। उसके बाद गुरदयाल सिंह का इंटरव्यू आता है।
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इनका जन्म पंजाब के भाइनी फतेह में 10 जनवरी 1933 को हुआ था। अभी हाल ही में बठिंडा में 16 अगस्त 2016 को उनका देहांत हो गया है। वह 83 साल के थे। 1999 में डॉक्टर सुखदेव सिंह द्वारा लिए गए इंटरव्यू के जरिये जानते हैं गुरदयाल सिंह की जिंदगी के बारे में।
गुरदयाल सिंह ने मजबूरी में स्कूल छोड़ा
गुरदयाल सिंह के जीवन पर बनाई गई डोक्यूमेंट्री
गुरदयाल सिंह का कहना है कि वह स्कूल छोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन मजबूरी में स्कूल छोड़ना पड़ा। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पिता जी का साथ देने वाला कोई नहीं था। इसलिए उनके साथ कारपेंटर के काम में हाथ बटाना शुरू कर दिया। पढ़ने और सीखने की लगन थी, इसलिए काम के साथ-साथ साहित्यिक किताबें भी पढ़ता।
खुद को व्यक्त करने के लिए चुना लेखन
इंटरव्यू में वह बताते हैं कि पहले कविताएं लिखनी शुरू की लेकिन उसमें कामयाब नहीं मिली। फिर कहानियों की राह चुनी। लेकिन एक कहानी में अपनी बात रख नहीं पाते थे। इसलिए कई कहानियां लिखनी पड़ती थी। उसके बाद अपनी बात कहने में कामयाब हो पाता था। फिर उन्होंने उपन्यास लिखने का मन बनाया और 1964 में पहला नावल मढ़ी दा दीवा पब्लिश हुआ।
खुद को व्यक्त करने के लिए चुना लेखन
इंटरव्यू में वह बताते हैं कि पहले कविताएं लिखनी शुरू की लेकिन उसमें कामयाब नहीं मिली। फिर कहानियों की राह चुनी। लेकिन एक कहानी में अपनी बात रख नहीं पाते थे। इसलिए कई कहानियां लिखनी पड़ती थी। उसके बाद अपनी बात कहने में कामयाब हो पाता था। फिर उन्होंने उपन्यास लिखने का मन बनाया और 1964 में पहला नावल मढ़ी दा दीवा पब्लिश हुआ।
रशियन साहित्य का पड़ा गहरा प्रभाव
गुरदयाल सिंह के जीवन पर बनाई गई डोक्यूमेंट्री
गुरदयाल सिंह बताते हैं कि मुझ पर सबसे ज्यादा प्रभाव रशियन साहित्य का पड़ा। लियो टॉलस्टॉय, एंटन चेखव और दोस्तोवसकी जैसे लेखक गहराई में जाकर लिखते थे। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद कालिदास को भी पढ़ा। इस तरह इन सभी का उन पर मिलाजुला प्रभाव पड़ा। इनमें से किसका साहित्य सबसे ऊपर है। यह वह नहीं कह सकते लेकिन यह कहा जाता है कि वह कालिदास शेक्सपीयर जैसे हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं कहा गया कि शेक्सपीयर कालिदास जैसे हैं।
50 प्रतिशत श्रेय पत्नी को
उस समय मुझे सब यही कहते थे कि कागज काले कर रहे हो, इसका क्या फायदा है। ऐसा काम करो जिसमें पैसे मिलें। उस समय मेरी पत्नी बलवंत कौर ने ही मेरा साथ दिया और लिखने के लिए प्रेरित किया।
1998 में पद्मश्री अवॉर्ड मिला
उनके द्वारा लिखे दो नावलों मढ़ी दा दीवा और अन्ने घोड़े दा दान पर फिल्में भी बनी हैं। इसके अलावा परसा, अध्ध चानणी रात, कुवेला, रुखे मिस्से बंदे उनके चर्चित नावलों में से एक हैं। 1998 में उन्हें पद्मश्री और 1999 में ज्ञानपीठ अवॉर्ड मिला था।
50 प्रतिशत श्रेय पत्नी को
उस समय मुझे सब यही कहते थे कि कागज काले कर रहे हो, इसका क्या फायदा है। ऐसा काम करो जिसमें पैसे मिलें। उस समय मेरी पत्नी बलवंत कौर ने ही मेरा साथ दिया और लिखने के लिए प्रेरित किया।
1998 में पद्मश्री अवॉर्ड मिला
उनके द्वारा लिखे दो नावलों मढ़ी दा दीवा और अन्ने घोड़े दा दान पर फिल्में भी बनी हैं। इसके अलावा परसा, अध्ध चानणी रात, कुवेला, रुखे मिस्से बंदे उनके चर्चित नावलों में से एक हैं। 1998 में उन्हें पद्मश्री और 1999 में ज्ञानपीठ अवॉर्ड मिला था।