दुश्मन के सामने जाकर खुलवाना पड़ता था फायर, वहीं डटकर देखते थे कहां से आ रही गोलियां
दुनिया के सबसे दुर्लभ कारगिल युद्ध में बेहद खतरनाक था दुश्मन की लोकेशन पता करना
चोटियों पर जमे दुश्मन ने मेन और शॉर्टकट रास्तों पर कर रखा था कब्जा, ढूंढे जाते थे मुश्किल नए रास्ते
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दुश्मन कारगिल की उन दुर्गम चोटियों पर इतनी अच्छी पोजीशन पर बैठा था, कि उनकी फायरिंग से न केवल भारतीय जवानों के सीने छलनी हुए बल्कि चेहरे और आंखों में भी सीधे गोलियां आकर लगी। जबकि एक अनदेखे दुश्मन से लड़ने पहुंचे हमारे भारतीय जवानों को यही मालूम नहीं था कि आखिरकार गोलियों की बौछार आ कहां से रही है।
ऐसे में भारतीय सेना के अफसरों ने मौके पर ही दुश्मन के ठिकानों का पता लगाने के लिए बेहद खतरनाक प्लानिंग अपनाई थी। इस योजना के तहत ऊंची चोटियों की जिस दिशा से गोलियों की बौछार आती थी। उसी ओर जांबाज अफसर और जवान जानबूझकर सामने जाते और ऊपर चोटियों की ओर देखकर बिना टारगेट के फायरिंग करते।
हमारे जवानों के ऐसा करने पर गुस्साई पाक सेना के जवान ऊपर से जवाबी कार्रवाई में ताबड़तोड़ फायरिंग का मुंह खोल देते हैं। दुश्मन द्वारा फायरिंग खोलने के कुछ सेकंड बाद तक जांबाजों को इस बात का अंदाजा लगाने के लिए वहीं खड़े देखना पड़ता था कि आखिरकार गोलियां ऊपर पहाड़ी के किस प्वाइंट से आ रही हैं। उसके बाद कहीं जाकर दुश्मन की लोकेशन का मालूम चलता था। इतना ही नहीं गोलियों की दिशा को भांपने के लिए कई बार अफसर व जवान गोलियों से घायल भी हुए।
रास्ते तय करके थे जीत, जान हथेली पर रख पहुंचते थे दुश्मन के करीब
मुशको वैली के प्वाइंट 4875 फ्लैप टॉप को फतेह करने में अहम रोल निभाने वाले परमवीर चक्र विजेता सूबेदार संजय कुमार (एलओसी कारगिल फिल्म में सुनील शेट्टी ने निभाई थी भूमिका) बताते हैं कि फायर खुलवाने के बाद जब दुश्मन की पोजीशन लोकेट हो जाती थी। तो उस तक पहुंचने की नई प्लानिंग बनानी होती थी। सीधे और शॉर्टकट रास्तों पर तो पहले ही दुश्मन का कब्जा होता था। इसलिए उन अनजान वादियों में दुश्मन के नजदीक पहुंचने के लिए नए रास्तों का चयन करना पड़ता था।
ये रास्ते बहुत ज्यादा खतरनाक और जोखिम भरे होते थे। जहां चलते हुए ही जवानों के गहरी खाई में गिरने का खतरा बना रहता था। बमुश्किल एक-दूसरे को संभालते हुए ऐसे ही रास्तों से आगे बढ़कर दुश्मन के करीब पहुंचा जाता था। फिर दुश्मन के नजदीक जाकर उससे आमने-सामने की लड़ाई की जाती था। सूबेदार संजय बताते हैं दुश्मन को ढूंढते हुए आगे बढ़ने में, फिर उनकी व गोलियों की लोकेशन का पता लगाने में और उसके बाद दुर्गम रास्तों से दुश्मन तक पहुंचने में ही कई भारतीय जवान और अफसर शहीद हो जाते थे। फिर भी भारतीय जवानों ने दुश्मन के आगे पीठ नहीं दिखाई। दुश्मन तक पहुंचने के लिए खतरनाक, लेकिन सही रास्तों का चयन ही हमारी जीत तय करता था।
रसद, गोला बारूद भी बड़ी मुश्किल से जवानों तक पहुंचता था
कारगिल की चोटियों पर लड़ रहे जवानों तक रसद और गोला-बारूद भी बड़ी मुश्किल से तक पहुंचता था। जिन मुख्य रास्तों से सेना की गाड़ियां आगे बढ़ती थी। उन रास्तों पर दुश्मन लगातार आर्टलरी फायर कर हमारी गाड़ियों और रास्तों को नुकसान पहुंचाने में जुटा रहा था। इसलिए रसद, गोला बारूद और जवानों को उनके फायर बेस कैंप तक पहुंचाने के लिए इन वादियों में बहुत ही ज्यादा मुश्किल रास्तों का चयन करना पड़ता था।
इस काम में यहां के स्थानीय लोगों ने सेना की बहुत मदद की। यही लोग सेना की बटालियन को बताते थे कि ऊपर चोटियों तक पहुंचने के लिए किन नए रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है। रास्ते लंबे और जोखिम भरे जरूर होते थे। जवानों की टोलियां, रसद और गोला बारूद सुरक्षित अपने फायरिंग बेस कैंप तक पहुंच जाते थे।
ठंड, बर्फीले तूफान से काला पड़ रहा था शरीर, उखड़ने लगी थी चमड़ी
युद्ध के दौरान जवान जब फील्ड में पहुंचे थे। तो उन्हें वहां के मौसम का भी बिल्कुल अनुमान नहीं था। लिहाजा अपने साथ सिर्फ स्लीपिंग बैग और 3 दिन का राशन लेकर दुश्मन से लड़ने ऊपर चले थे। मगर जैसे-जैसे ऊपर चोटियों की ओर बढ़ते गए कम ऑक्सीजन, बर्फीली और शुष्क हवाओं के थपेड़ों में हमारे जवानों को सताना शुरू कर दिया।
पूरे युद्ध के दौरान कई बार वहां बर्फ भी गिरी। ठंड से ठिठुरते हुए जवान दिन भर वहीं बड़े-बड़े पत्थरों की आड़ में बैठे रहते और रात होने के बाद हमला बोलते। मौसम की दुश्वारियां ने जवानों का हौसला तो पस्त नहीं किया। मगर जवानों की चेहरे और हाथों की चमड़ी काली पड़ उखड़ने लगी। उसके बावजूद जवानों ने युद्ध लड़ते हुए फतह हासिल की। बाद में जवानों को चेहरा ढकने के लिए पटके, ग्लव्स और वैसलीन दी गई।
युद्ध भूमि में एक बार फायर बेस कैंप से निकलने के बाद कितना ऊपर जवानों को जाना है। यह भी मालूम नहीं होता था। जहां-जहां चलते हुए वे रुकते थे, वहां किसी प्रकार के टेंट की व्यवस्था भी नहीं थी। खुले आसमान में विपरीत मौसम का सामना करते हुए जवानों को आगे बढ़ना था और अपना लक्ष्य जीत हासिल करना था।