{"_id":"69600f786dca967097061b2d","slug":"rehabilitation-plans-for-urban-poor-cannot-be-thwarted-on-technical-objections-high-court-chandigarh-news-c-16-1-pkl1017-918613-2026-01-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"शहरी गरीबों के पुनर्वास की योजनाएं तकनीकी आपत्तियों से विफल नहीं की जा सकतीं: हाईकोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शहरी गरीबों के पुनर्वास की योजनाएं तकनीकी आपत्तियों से विफल नहीं की जा सकतीं: हाईकोर्ट
विज्ञापन
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ स्मॉल फ्लैट्स स्कीम-2006 से जुड़े एक अहम और मानवीय फैसले में स्पष्ट किया है कि शहरी गरीबों के पुनर्वास से संबंधित कल्याणकारी योजनाओं को महज तकनीकी आपत्तियों के आधार पर विफल नहीं किया जा सकता। अदालत ने चंडीगढ़ प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि वह एक युवती को 15 दिनों के भीतर फ्लैट आवंटित करे, जो बायोमेट्रिक सर्वे के समय न केवल नाबालिग थी, बल्कि मां के गर्भ में थी।
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रशासन द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में यदि किसी मान्यता प्राप्त निवासी की मृत्यु हो जाती है तो उसके नाबालिग वारिसों के अधिकारों को मान्यता देने पर प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए। खंडपीठ ने कहा कि हाशिए पर रह रहे वर्गों के पुनर्वास से जुड़े मामलों में संवैधानिक अदालतों को संकीर्ण और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय उदार और समग्र दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि योजना का मूल उद्देश्य ही विफल न हो।
मामला क्या है
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2015 में, मात्र नौ वर्ष की आयु में, अपने चाचा के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख किया था। उसके पिता वर्ष 1994 से बुरैल स्थित लेबर कॉलोनी नंबर-5 की झुग्गी में रह रहे थे। स्थायी लोक अदालत ने मार्च 2010 में उन्हें स्मॉल फ्लैट योजना के तहत पात्र घोषित किया था। हालांकि, 15 फरवरी 2013 को फ्लैट आवंटन से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। वहीं, याचिकाकर्ता की मां वर्ष 2014 से लापता है, जिसकी डीडीआर भी दर्ज कराई गई थी।
विज्ञापन
‘सर्वे के समय गर्भ में थी याचिकाकर्ता’
चंडीगढ़ प्रशासन ने याचिकाकर्ता का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उसका नाम न तो बायोमेट्रिक सर्वे में दर्ज है और न ही मतदाता सूची में, साथ ही योजना में नाबालिग को फ्लैट देने का कोई प्रावधान नहीं है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि वर्ष 2006 में हुए बायोमेट्रिक सर्वे के समय याचिकाकर्ता मां के गर्भ में थी, ऐसे में उसका नाम सर्वे या मतदाता सूची में होना संभव ही नहीं था। वह वर्ष 2024 में वयस्क हुई, इसलिए प्रशासन की आपत्ति पूरी तरह अव्यावहारिक और अमानवीय है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पिता को योजना के तहत पात्र घोषित किया जा चुका था, तो केवल आवंटन में देरी और बीच में मृत्यु हो जाने के कारण उसकी संतान के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता, जो लगभग अनाथ की स्थिति में है और पिता की एकमात्र कानूनी वारिस है, को फ्लैट से वंचित नहीं किया जा सकता।
फैसले में अदालत ने दोहराया कि चंडीगढ़ स्मॉल फ्लैट्स स्कीम का उद्देश्य अति-हाशिए पर रह रहे झुग्गीवासियों का पुनर्वास कर उन्हें गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवास उपलब्ध कराना है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में आवास का अधिकार भी शामिल है। ऐसे मामलों में अदालतों का दायित्व है कि वे पीड़ितों को प्रभावी राहत प्रदान करें।
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि राज्य को एक कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और असाधारण परिस्थितियों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर कमजोर वर्गों की पीड़ा को कम करना ही संवैधानिक न्याय का मूल उद्देश्य है।
विज्ञापन
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रशासन द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि भविष्य में यदि किसी मान्यता प्राप्त निवासी की मृत्यु हो जाती है तो उसके नाबालिग वारिसों के अधिकारों को मान्यता देने पर प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए। खंडपीठ ने कहा कि हाशिए पर रह रहे वर्गों के पुनर्वास से जुड़े मामलों में संवैधानिक अदालतों को संकीर्ण और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने के बजाय उदार और समग्र दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि योजना का मूल उद्देश्य ही विफल न हो।
विज्ञापन
मामला क्या है
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2015 में, मात्र नौ वर्ष की आयु में, अपने चाचा के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख किया था। उसके पिता वर्ष 1994 से बुरैल स्थित लेबर कॉलोनी नंबर-5 की झुग्गी में रह रहे थे। स्थायी लोक अदालत ने मार्च 2010 में उन्हें स्मॉल फ्लैट योजना के तहत पात्र घोषित किया था। हालांकि, 15 फरवरी 2013 को फ्लैट आवंटन से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। वहीं, याचिकाकर्ता की मां वर्ष 2014 से लापता है, जिसकी डीडीआर भी दर्ज कराई गई थी।
विज्ञापन
‘सर्वे के समय गर्भ में थी याचिकाकर्ता’
चंडीगढ़ प्रशासन ने याचिकाकर्ता का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उसका नाम न तो बायोमेट्रिक सर्वे में दर्ज है और न ही मतदाता सूची में, साथ ही योजना में नाबालिग को फ्लैट देने का कोई प्रावधान नहीं है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि वर्ष 2006 में हुए बायोमेट्रिक सर्वे के समय याचिकाकर्ता मां के गर्भ में थी, ऐसे में उसका नाम सर्वे या मतदाता सूची में होना संभव ही नहीं था। वह वर्ष 2024 में वयस्क हुई, इसलिए प्रशासन की आपत्ति पूरी तरह अव्यावहारिक और अमानवीय है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पिता को योजना के तहत पात्र घोषित किया जा चुका था, तो केवल आवंटन में देरी और बीच में मृत्यु हो जाने के कारण उसकी संतान के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता, जो लगभग अनाथ की स्थिति में है और पिता की एकमात्र कानूनी वारिस है, को फ्लैट से वंचित नहीं किया जा सकता।
फैसले में अदालत ने दोहराया कि चंडीगढ़ स्मॉल फ्लैट्स स्कीम का उद्देश्य अति-हाशिए पर रह रहे झुग्गीवासियों का पुनर्वास कर उन्हें गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवास उपलब्ध कराना है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में आवास का अधिकार भी शामिल है। ऐसे मामलों में अदालतों का दायित्व है कि वे पीड़ितों को प्रभावी राहत प्रदान करें।
हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि राज्य को एक कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और असाधारण परिस्थितियों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर कमजोर वर्गों की पीड़ा को कम करना ही संवैधानिक न्याय का मूल उद्देश्य है।