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वायुसेना ने गोल्डन एरो को किया 'जिंदा', यही स्क्वाड्रन संभालेगी राफेल, गौरवपूर्ण है इतिहास

Wed, 29 Jul 2020 12:16 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Wed, 29 Jul 2020 12:16 PM IST
सार

  • एयरफोर्स खत्म कर चुका था 17 गोल्डन एरो स्क्वाड्रन
  • राफेल के लिए इस स्क्वाड्रन को फिर से जिंदा किया गया
  • 1965 और 1971 की लड़ाई में इसी स्क्वाड्रन ने जीत में अहम योगदान दिया था

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Rafale fighters to join Golden Arrows Squadron of IAF
फाइल फोटो - फोटो : IAF

विस्तार

अंबाला में राफेल की तैनाती के लिए एक ऐसी स्क्वाड्रन को जिंदा किया गया है। जिसे एयरफोर्स ने फिलहाल समाप्त कर दिया था। यह स्क्वाड्रन है 17 गोल्डन एरो। गत वर्ष वायु सेना के पूर्व अध्यक्ष बीएस धनोआ इस स्क्वाड्रन फिर से जिंदा किया था। यही स्क्वाड्रन अब अंबाला में राफेल की कमान संभालेगी।

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इससे पहले अंबाला में स्पेस जेट लड़ाकू विमान जगुआर आईएएस और आईबीएस की स्क्वाड्रन 14 मौजूद है जबकि मिग 21 बायसन की स्क्वाड्रन यहां तैनात है। यानी राफेल की स्क्वाड्रन के बाद वेस्टर्न एयर कमांड में अंबाला एयरफोर्स की ताकत और बढ़ जाएगी। रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो अंबाला बहुत ही महत्वपूर्ण एयरफोर्स स्टेशन है। 
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1965 की लड़ाई में पाकिस्तान इस एयरफोर्स स्टेशन को निशाना बनाते हुए यहां बमबारी कर चुका है। लिहाजा स्पष्ट है कि दुश्मन की निगाह भी अंबाला एयरफोर्स स्टेशन पर गढ़ी रहती है। सन 1971 युद्ध में भी अंबाला एयरफोर्स स्टेशन ने जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी। दुश्मनों को खटकने वाला अंबाला का यह 7 विंग एयरफोर्स स्टेशन इसलिए भी अहम है, क्योंकि वेस्टर्न एयर कमांड में न केवल यह एक बड़ा एयरफोर्स स्टेशन है। बल्कि देश की राजधानी दिल्ली से महज 200 किलोमीटर की दूरी पर एक महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थापित है। यानी देश की राजधानी की सुरक्षा में भी अंबाला एयरफोर्स स्टेशन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।


ये है गोल्डन एरो स्क्वाड्रन को जिंदा करने की वजह
वैसे तो इस स्क्वाड्रन का गठन 1 अक्टूबर 1951 में किया गया था। मगर सन 1965 और सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में इस स्क्वाड्रन की भूमिका अहम रही थी। इस स्क्वाड्रन के तहत हावर्ड एयरक्रॉफ्ट, वैंपायर व हंटर जैसे लड़ाकू विमान मौजूद थे। सन 1971 की लड़ाई में हंटर विमानों ने ही पाकिस्तान को नाको तले चने चबाए थे। उस वक्त भी यही स्क्वाड्रन हीरो बनकर उभरी थी।

उसके बाद इस स्क्वाड्रन को सन 1975 में मिग-21 एयरक्राफ्ट भी दिए गए। कारगिल युद्ध के दौरान इस स्क्वाड्रन को बठिंडा एयरफोर्स स्टेशन शिफ्ट कर दिया गया था। उसके बाद अंबाला में इस स्क्वाड्रन का वजूद खत्म हो गया था। कारगिल में एयरफोर्स के ऑपरेशन सफेद सागर में भी इस स्क्वाड्रन ने बेहतरीन रोल अदा किया था। मगर बाद में धीरे-धीरे मिग-21 विमानों के बेड़े से बाहर होने के साथ-साथ वर्ष 2016 में इस स्क्वाड्रन को समाप्त कर दिया गया था। लेकिन अब इस गौरवशाली स्क्वाड्रन को इंडियन एयरफोर्स के सबसे खतरनाक लड़ाकू विमान राफेल के लिए फिर से वजूद में लाया गया है।

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