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Patiala: अब पानी के संपर्क से नहीं गलेगा स्टील, पंजाबी यूनिवर्सिटी ने किया अनोखा शोध
Sun, 09 Oct 2022 07:53 PM IST
ajay kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटियाला (पंजाब)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटियाला (पंजाब)
Published by: ajay kumar
Updated Sun, 09 Oct 2022 07:53 PM IST
सार
पीयू के वाइस चांसलर प्रोफेसर अरविंद ने खोज के लिए शोधकर्ता व उनके निगरानी की सराहना की। कहा कि ऐसा शोध अकादमिक क्षेत्र को उद्योग क्षेत्र के साथ जोड़ने में कारगर साबित होता है। ऐसा होने से दोनों क्षेत्रों में एक सही तालमेल पैदा होता है और सार्थक नतीजे सामने आते हैं।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : iStock
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विस्तार
पंजाबी यूनिवर्सिटी (पीयू) के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग ने एक शोध किया है। शोध के मुताबिक पानी के संपर्क में रहने से स्टेनलेस स्टील के गलन को कम किया जा सकता है। पीएचडी करने वाले शोधकर्ता मुनीष कुमार ने अपने शोध नतीजों से साबित किया है कि क्रायोजेनिक उपचार नामक विधि के जरिये स्टील के इस तरह के गलन को कम किया जा सकता है। यह खोज प्रोफेसर हजूर सिंह और डॉ. बूटा सिंह सिद्धू की निगरानी में किया गया है।
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मुनीष कुमार ने बताया कि स्टेनलेस स्टील को इसके रसायनिक गुणों के कारण विभिन्न पुर्जों के निर्माण के लिए पन बिजली घरों में बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है लेकिन इसकी बायोलॉजिकल विशेषता के कारण स्टील गल जाता है। खास तौर पर जब बारिश का मौसम होता है तो पानी में ठोस कणों की गिनती बढ़ जाती है। यह ठोस कण टरबाइनों के ब्लेडों के साथ टकराते हैं तो यह ब्लेडों के रेखा गणित को बिगाड़ देते हैं। ऐसा होने से ब्लेड की काम करने की क्षमता कम हो जाती है। दुनिया भर के पन बिजली प्लांटों में स्टील का ऐसा गलना गंभीर समस्या है। इस गलन को कम करने के लिए एक ठोस शोध करने की जरूरत थी।
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उन्होंने बताया कि शोध के दौरान तलाशे गए उपचार से स्टेनलेस स्टील के विभिन्न नमूने बहुत कम तापमान के साथ संशोधित किए गए। इसके बाद इन नमूनों की मैकेनिकल विशेषताओं की जांच की गई। इसके अलावा गलन संबंधी कुछ प्रोफेशनल स्तर के निरीक्षणों के दौरान इसकी गुणवत्ता को जांचा गया। उन्होंने बताया कि इस संबंधी एक स्व निर्मित गलन निरीक्षण मशीन यादविंदरा कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग तलवंडी साबो में तैयार की गई थी। विभिन्न प्रयोगों के दौरान प्राप्त नतीजों से साफ हो गया कि इन उपचारों के बाद स्टील का गलना काफी हद तक कम हो गया था।
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डॉ. हजूर सिंह ने बताया कि इसका मुख्य कारण स्टील की कठोरता में वृद्धि व माइक्रो स्ट्रक्चर में सुधार है। उन्होंने बताया कि क्रायोजेनिक उपचार रिवायती तकनीकों की तुलना में एक महत्वपूर्ण व बढ़िया नतीजे देने वाली विधि है। यह उद्योगों में भी उपयोग हो सकती है। डॉ. बूटा सिंह सिद्धू ने शोध की सराहना करते हुए कहा कि स्टील के गलन को कम करने के लिए यह एक बढ़िया व सरल उपचार है।
इससे पन बिजली प्लांटों में बिजली पैदा करने की क्षमता में वृद्धि होगी। गलन के नुक्स के अब भविष्य में न होने से रिपेयर को प्लांट बंद करने का समय भी कम होगा। पीयू के वाइस चांसलर प्रोफेसर अरविंद ने खोज के लिए शोधकर्ता व उनके निगरानी की सराहना की। कहा कि ऐसा शोध अकादमिक क्षेत्र को उद्योग क्षेत्र के साथ जोड़ने में कारगर साबित होता है। ऐसा होने से दोनों क्षेत्रों में एक सही तालमेल पैदा होता है और सार्थक नतीजे सामने आते हैं।