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कला भवन में 'ठंड दा इंतजाम', कुछ यूं देखने को मिला कि खूब तालियां बजीं
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 03 Dec 2016 09:07 AM IST
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पंजाब कला भवन में ‘ठंड दा इंतजाम’ नाटक का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
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इंपैक्ट आर्ट्स की ओर से पंजाब कला भवन में थिएटर फेस्टिवल के दूसरे दिन ‘ठंड दा इंतजाम’ नाटक का मंचन किया गया। इसका निर्देशन विवेक रॉय और गुरजंट सिंह ने किया। नाटक में दिखाया कि विवेक नाम का एक युवक अपने सपने पूरे करने के लिए एक बड़े शहर में पहुंचता है। लेकिन नौकरी न मिल पाने के कारण वह बेरोजगार है।
वह एक पार्क में बेंच में रातें गुजारता है। ठंड का महीना है और वह जुगाड़ लगाता है कि कैसे ठंड से बचे। इसके बाद वह जेल जाने की तरकीब बनाता है। लेकिन हर बार असफल हो जाता है। वह लड़की छेड़ता है, होटल जाकर पहले खाना खाता है, फिर पैसे नहीं देता। कई लोगों से लड़ाई करता है। लेकिन कोई उसके खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराता है।
एक दिन उसे एक बुजुर्ग मिलता है और वह उसे अपनी सारी बात बताता है। बात सुनने के बाद बुजुर्ग राय देता है कि बेटा अधिक से अधिक मेहनत करो और तभी जिंदगी में सफल हाेंगे। विवेक चलता चलता उसी बेंच पर आकर बैठकर मन में कहता है आज से पूरी मेहनत करूंगा।
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लेकिन तभी वहां एक सिपाही आ जाता है और उसे पकड़कर कहता है कि तू वही है न जो इस बेंच पर बैठकर आते जाते लोगों को परेशान करता है, चल थाने। यहीं नाटक खत्म हो जाता है।
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वह एक पार्क में बेंच में रातें गुजारता है। ठंड का महीना है और वह जुगाड़ लगाता है कि कैसे ठंड से बचे। इसके बाद वह जेल जाने की तरकीब बनाता है। लेकिन हर बार असफल हो जाता है। वह लड़की छेड़ता है, होटल जाकर पहले खाना खाता है, फिर पैसे नहीं देता। कई लोगों से लड़ाई करता है। लेकिन कोई उसके खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराता है।
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एक दिन उसे एक बुजुर्ग मिलता है और वह उसे अपनी सारी बात बताता है। बात सुनने के बाद बुजुर्ग राय देता है कि बेटा अधिक से अधिक मेहनत करो और तभी जिंदगी में सफल हाेंगे। विवेक चलता चलता उसी बेंच पर आकर बैठकर मन में कहता है आज से पूरी मेहनत करूंगा।
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लेकिन तभी वहां एक सिपाही आ जाता है और उसे पकड़कर कहता है कि तू वही है न जो इस बेंच पर बैठकर आते जाते लोगों को परेशान करता है, चल थाने। यहीं नाटक खत्म हो जाता है।