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शिअद और बादलों की हार का एक बड़ा कारण ये भी रहा, मोहाली तक नहीं जीत पाए
अमित शर्मा/अमर उजाला, मोहाली
Updated Sun, 12 Mar 2017 10:25 AM IST
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CM Parkash singh badal & Sukhbir singh badal
- फोटो : File Photo
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शिअद-भाजपा सरकार ने कार्यकाल के दौरान दस वर्षों में मोहाली में करोड़ों की लागत से विकास कार्य करवाए, लेकिन वहां भी जीत कायम नहीं रख पाए। शहर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, इसके बावजूद हलके से पार्टी को जीत का स्वाद नसीब नहीं हुआ। पिछले विधानसभा चुनाव में पैराशूट उम्मीदवार बलवंत सिंह रामूवालिया ने अकाली दल की नैया डूबो दी थी।
वहीं, इस बार नेतृत्व विहीन व आपसी फूट के कारण पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। इस बार लोकल उम्मीदवार चुनाव मैदान में था और वह मोहाली में कई साल बतौर डीसी सेवाएं भी दे चुके थे। फिर भी अकाली दल तीसरे नंबर पर रहा और कांग्रेस ने बाजी मार ली। जानकारी के मुताबिक, करीब दो साल पहले नगर निगम चुनाव हुए थे। हलका इंचार्ज रामूवालिया की अगुवाई में चुनाव लड़ा गया था।
इस दौरान शिअद-भाजपा गठबंधन 23 सीटों पर विजयी रहा था। जबकि शिअद के बागी दस सीटें जीतने में कामयाब रहे थे। इसके बावजूद भी नगर निगम में अकाली दल मेयर नहीं बना पाया था और अकाली दल-बीजेपी को विपक्ष की भूमिका निभानी पड़ी। जिस पर रामूवालिया ने सवाल उठाया था। इसके बाद रामूवालिया मोहाली हलके को छोड़कर यूपी चले गए थे और वहां पर सपा की सरकार में जेल मंत्री बन गए।
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वहीं, इस बार नेतृत्व विहीन व आपसी फूट के कारण पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। इस बार लोकल उम्मीदवार चुनाव मैदान में था और वह मोहाली में कई साल बतौर डीसी सेवाएं भी दे चुके थे। फिर भी अकाली दल तीसरे नंबर पर रहा और कांग्रेस ने बाजी मार ली। जानकारी के मुताबिक, करीब दो साल पहले नगर निगम चुनाव हुए थे। हलका इंचार्ज रामूवालिया की अगुवाई में चुनाव लड़ा गया था।
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इस दौरान शिअद-भाजपा गठबंधन 23 सीटों पर विजयी रहा था। जबकि शिअद के बागी दस सीटें जीतने में कामयाब रहे थे। इसके बावजूद भी नगर निगम में अकाली दल मेयर नहीं बना पाया था और अकाली दल-बीजेपी को विपक्ष की भूमिका निभानी पड़ी। जिस पर रामूवालिया ने सवाल उठाया था। इसके बाद रामूवालिया मोहाली हलके को छोड़कर यूपी चले गए थे और वहां पर सपा की सरकार में जेल मंत्री बन गए।
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रामूवालिया के जाने बाद कोई इंचार्ज नहीं मिला
कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया
- फोटो : amar ujala
रामूवालिया के जाने बाद हलके को कोई इंचार्ज नहीं मिला। कुछ समय के लिए चंदूमाजरा परिवार ने हलका इंचार्ज की सीट पर हक जताया। पार्टी हाईकमान ने जैसे ही उन्हें सन्नौर सीट दी, इसके बाद पूरा परिवार यहां से गायब हो गया। दूसरी तरफ अकाली दल ने निगम में बागी चल रहे अपने गुट को पुन: पार्टी में शामिल करवाया। उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव में फायदा मिलेगा, लेकिन इस दौरान कई बाहरी अकाली नेता हलके में घुसपैठ करते रहे।
वहीं, इस चीज का कांग्रेस ने भरपूर फायदा उठाया और खुद को हर तरीके से मजबूत करती रही। अकाली नेता कहते थे कि सिद्धू भोग की राजनीति करते हैं। जबकि वही उनके लिए फायदेमंद साबित हो गई। सिद्धू को गांवों से जो बढ़त मिली थी, वह शहर में बढ़ती ही चली गई। हालांकि शहर के 50 वार्डों में से 36 पर अकाली दल बीजेपी का कब्जा है। इसके बाद भी पार्टी को वहां कोई फायदा नहीं हुआ।
इसके अलावा कई पार्षद ऐसे भी थे, जिन्होंने स्थानीय उम्मीदवार के हक में प्रचार न कर बाहरी जिलों में जाकर किया था। साथ ही नाम के लिए सोशल मीडिया पर कुछ मैसेज फ्लैश कर हाजिरी लगाई। वहीं, अकाली दल के सीनियर नेताओं का कहना है कि हार का मंथन किया जाएगा।
वहीं, इस चीज का कांग्रेस ने भरपूर फायदा उठाया और खुद को हर तरीके से मजबूत करती रही। अकाली नेता कहते थे कि सिद्धू भोग की राजनीति करते हैं। जबकि वही उनके लिए फायदेमंद साबित हो गई। सिद्धू को गांवों से जो बढ़त मिली थी, वह शहर में बढ़ती ही चली गई। हालांकि शहर के 50 वार्डों में से 36 पर अकाली दल बीजेपी का कब्जा है। इसके बाद भी पार्टी को वहां कोई फायदा नहीं हुआ।
इसके अलावा कई पार्षद ऐसे भी थे, जिन्होंने स्थानीय उम्मीदवार के हक में प्रचार न कर बाहरी जिलों में जाकर किया था। साथ ही नाम के लिए सोशल मीडिया पर कुछ मैसेज फ्लैश कर हाजिरी लगाई। वहीं, अकाली दल के सीनियर नेताओं का कहना है कि हार का मंथन किया जाएगा।
खरड़ में भी हार की कहानी कुछ ऐसी ही
प्रकाश सिंह बादल
इसी तरह खरड़ में हुई शिअद की हार की कहानी भी कुछ ऐसी है। शिअद ने आखिर में रणजीत सिंह गिल को उम्मीदवार घोषित किया, जो इलाके की राजनीति में बिल्कुल नया था। वहीं, उन्हें टिकट देते ही हलका इंचार्ज उजागर सिंह बडाली ने बगावत कर दी थी।
चुनाव में भी उनके साथ नहीं चले। इससे पार्टी को नुकसान हुआ और इस चीज को आम आदमी पार्टी ने अपनी ताकत बनाया। साथ ही चुनाव में 54171 मत लेकर जीत हासिल की, जबकि यहां अकाली दल तीसरे नंबर पर रहा। अकाली दल को 46807 मत मिले।
चुनाव में भी उनके साथ नहीं चले। इससे पार्टी को नुकसान हुआ और इस चीज को आम आदमी पार्टी ने अपनी ताकत बनाया। साथ ही चुनाव में 54171 मत लेकर जीत हासिल की, जबकि यहां अकाली दल तीसरे नंबर पर रहा। अकाली दल को 46807 मत मिले।