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पंजाब में घमासान: हाईकोर्ट के एक फैसले से शुरू हुई थी तल्खी, अब कांग्रेस के सामने नया सीएम चुनने की चुनौती

Sat, 18 Sep 2021 02:00 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 18 Sep 2021 02:00 PM IST
सार

पिछले पांच माह से पार्टी में विरोध का सामना कर रहे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए सियासी उठापटक कोई नई बात नहीं है। चार दशक के अपने राजनीतिक सफर में वे कई मुश्किल दौर से गुजर चुके हैं। 2002 और 2017 में अपनी अहमियत आलाकमान को दिखा भी चुके हैं। हालांकि शनिवार को पार्टी हाईकमान ने ही कैप्टन से इस्तीफा मांग लिया है। 

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Punjab Congress Crisis Reached on Peak
मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह। - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

इसी साल अप्रैल में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कोटकपूरा फायरिंग मामले की जांच कर रही एसआईटी को रद्द कर रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। इस एक फैसले ने पंजाब कांग्रेस में कलह की नींव रखी। जो अब अपने चरम पर पहुंच गई है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद पंजाब कांग्रेस के प्रधान नवजोत सिद्धू और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच तल्खी इस कदर बढ़ी कि पार्टी दो फाड़ हो चुकी है। अभी तक कैप्टन और सिद्धू के मामले में आलाकमान समझौते के मूड में था लेकिन अब बात आर-पार की हो रही है। इसी सिलसिले में शनिवार को पार्टी विधायक दल की बैठक बुलाई गई है। हालांकि अचानक बैठक बुलाए जाने से कैप्टन नाराज हैं। 

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वैसे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए ये सियासी उठापटक नई नहीं है। 41 साल के अपने राजनीतिक सफर में कैप्टन कई मुश्किल दौर से गुजर चुके हैं। कई पार्टी प्रधानों से कैप्टन का 36 का आंकड़ा रहा है। इन सबके बाद भी पार्टी आलाकमान कैप्टन पर ही विश्वास जताता रहा। 2002 और 2017 में कैप्टन अपनी अहमियत आलाकमान को दिखा भी चुके हैं। हालांकि शनिवार को पार्टी हाईकमान ने ही कैप्टन से इस्तीफा मांग लिया है। 
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यह भी पढ़ें - पंजाब कांग्रेस के लिए आगे कुआं, पीछे खाई: कैप्टन हटे और उनके खेमे के विधायकों ने दिया साथ तो सरकार बचा पाना मुश्किल
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पंजाब में कांग्रेस की धुरी माने जाते कैप्टन अमरिंदर को उनके स्कूली दोस्त राजीव गांधी 1980 में कांग्रेस में लाए थे। उसी साल कैप्टन ने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता। 1984 में मतभेदों के बाद उन्होंने संसद और कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। एक साल बाद अगस्त 1985 में वे शिरोमणि अकाली दल में शामिल हो गए। विधानसभा चुनाव लड़ा और सुरजीत सिंह बरनाला की सरकार में मंत्री बने। 

आतंकवाद के दौर में 1987 में बरनाला सरकार को बर्खास्त कर केंद्र ने पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। पांच साल बाद वर्ष 1992 में अमरिंदर सिंह शिअद से भी अलग हो गए और एक अलग दल अकाली दल (पंथिक) का गठन किया। 1998 में इस दल का कांग्रेस में विलय कर दिया गया। 1998 में कांग्रेस आलाकमान ने कैप्टन को पंजाब में कांग्रेस संगठन की कमान सौंपी। आपातकाल और आतंकवाद के दौर से गुजरी कांग्रेस को कैप्टन ने फिर से खड़ा किया और 2002 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत हासिल हुई। 

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