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पंजाब विधानसभा चुनाव: पांच तरफा जंग में सबको वोट कटने की चिंता, बड़े दलों को किसानों और छोटे दलों से खतरा  

Thu, 03 Feb 2022 04:48 PM IST
निवेदिता वर्मा हर्ष कुमार सलारिया, अमर उजाला, चंडीगढ़
हर्ष कुमार सलारिया, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 03 Feb 2022 04:48 PM IST
सार

कांग्रेस अनुसूचित जाति के मुख्यमंत्री चेहरे के आधार पर अनुसूचित जाति वर्ग के वोटों की उम्मीद तो लगा रही है लेकिन इसमें रविदासीय और वाल्मीकि वर्ग बंटे हुए हैं। वहीं बसपा भी अनुसूचित जाति के वोटों में अपना प्रतिशत बढ़ाएगी।

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Punjab Assembly Elections: Big parties are threatened by farmers and small parties
पंजाब विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब में इस बार विधानसभा चुनाव की छटा पूरी तरह बदल रही है। अब तक कांग्रेस और अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच होते रहे सीधे मुकाबले के बाद 2017 में आम आदमी पार्टी (आप) के आने से चुनावी जंग त्रिकोणीय हो गई थी। अब 2022 के चुनाव के लिए पांच कोणीय मुकाबला सज गया है। इससे जहां पारंपरिक सियासी दलों की मुश्किल बढ़ी है वहीं चुनाव रणनीतिकारों ने पांच हिस्सों में वोट बंटने के कारण गड़बड़ा रहे गणित पर माथापच्ची शुरू कर दी है।

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सत्ताधारी कांग्रेस अपने दम पर चुनाव मैदान में है तो शिरोमणि अकाली दल ने इस बार भाजपा से अलग होकर बसपा से गठबंधन कर लिया है। आप भी इस बार सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कमर कस चुकी है, जबकि कांग्रेस से अलग हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब लोक कांग्रेस (पीएलसी) का गठन कर भाजपा और संयुक्त अकाली दल से गठबंधन कर नया मोर्चा खड़ा कर दिया है। वहीं, केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल तक आंदोलन करके लौटे 22 किसान संगठन भी संयुक्त समाज मोर्चा (एसएसएम) बनाकर चुनाव में कूद गए हैं। इनके अलावा कुछ छोटे दल और निर्दलीय प्रत्याशी भी पारंपरिक दलों की वोटों में सेंध लगाएंगे। 
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पीएलसी-भाजपा-संयुक्त अकाली दल गठबंधन और एसएसएम के आने से मुख्य दलों कांग्रेस, शिअद व आप की चिंता बढ़ी है क्योंकि इन्हीं के वोट बैंक में सेंध लगना तय है। पीएलसी की 37 सीटों पर कैप्टन अपने रसूख का लाभ उठाना चाहेंगे वहीं भाजपा उन हिंदू और एससी-एसटी वोटों पर नजर गढ़ाए है, जिनका लाभ 2017 में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मिला था। दूसरी ओर एसएसएम के तहत एकजुट हुए किसान संगठनों की पूरी कोशिश है कि वह अपने संगठन के प्रभाव वाले गांवों के एकमुश्त वोट हासिल कर लें। सूबे के ग्रामीण इलाकों के यह वोट आज तक अकाली दल-भाजपा के लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त करते रहे थे। नए समीकरण में शिअद के हिस्से की वोटों में एसएसएम द्वारा सेंध लगाई जा रही है।

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पार्टियों के लिए अपने-अपने वोट बैंक संभालना हुआ मुश्किल

2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टियों के वोट प्रतिशत पर नजर डालें तो, कांग्रेस 38.5 फीसदी वोटों के साथ 77 सीटों पर विजयी रही थी, जबकि आप 23.7 प्रतिशत वोट लेकर 20 सीटों पर विजयी रही। शिअद-भाजपा गठबंधन को क्रमश: 25.2 और 5.4 प्रतिशत वोटों के साथ कुल 18 सीटें मिलीं थी। आप के साथ रही लोक इंसाफ पार्टी ने 1.2 प्रतिशत वोटों के साथ दो सीटें जीती थीं। बाकी दलों में बसपा का वोट प्रतिशत 1.5 फीसदी, शिअद (एम) का 0.3 फीसदी, अपना पंजाब पार्टी का 0.2 फीसदी और अन्य छोटे दलों के हिस्से में कुल 2.2 फीसदी वोट आए थे। 


इस बार, सियासी दलों के इस गणित में गड़बड़ी होने वाली है। माना जा रहा है कि कांग्रेस अनुसूचित जाति के मुख्यमंत्री चेहरे के आधार पर अनुसूचित जाति वर्ग के वोटों की उम्मीद तो लगा रही है लेकिन इसमें रविदासीय और वाल्मीकि वर्ग बंटे हुए हैं। वहीं बसपा भी अनुसूचित जाति के वोटों में अपना प्रतिशत बढ़ाएगी। उसे शिअद के साथ गठबंधन में दलित सिख वोटरों का साथ मिलने की भी आस है। 


आम आदमी पार्टी मालवा क्षेत्र में अपने पिछले प्रदर्शन के आधार पर मान चुकी है कि सूबे के ओबीसी वर्ग में उसकी पैठ बनी हुई है। फिर भी पार्टी का अगला लक्ष्य माझा और दोआबा के शहरी वोटरों, जिनमें बुद्धिजीवी वर्ग शामिल है, पर ध्यान केंद्रित किया हुआ है। शिअद अपने परंपरागत वोटरों के सहारे है, लेकिन किसान संगठनों के मैदान में उतरने से पार्टी को ग्रामीण सिख वोटरों के बंटने की आशंका है। उधर, भाजपा इस बार किसान आंदोलन के कारण पंजाब के लोगों के गुस्से का सामना कर रही है, लेकिन समय बीतने के साथ अनेक हिंदू संगठन पार्टी के साथ खड़े हो गए हैं। फिर भी हिंदू वोट कांग्रेस और आप में भी बंटना तय है।

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