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ध्यान दें, दिवाली पर ये पटाखे चलाने से नहीं होगा प्रदूषण, दिव्यांग भी कर सकेंगे आतिशबाजी

Mon, 05 Nov 2018 02:03 PM IST
अमित शर्मा, अमर उजाला, मोहाली
अमित शर्मा, अमर उजाला, मोहाली Updated Mon, 05 Nov 2018 02:03 PM IST
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Pollution and Noise Free Crackers Prepared by Indian Institute of Science & Research
पटाखों से निकलता है जहरीला धुआं - फोटो : अमर उजाला
दिवाली या अन्य मौकों पर पटाखे चलाने पर अब प्रदूषण नहीं होगा। इतना ही नहीं दिव्यांग लोग भी परिवार वालों के साथ मिलकर आतिशबाजी का मजा ले पाएंगे। वहीं, इन पटाखों से न तो जलने का डर होगा और न गंदगी फैलेगी। साथ ही लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। मोहाली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजूकेशन एंड रिसर्च के डॉ. प्रोफेसर सम्राट घोष ने ऐसे पटाखे तैयार किए हैं। उन्हें उम्मीद है कि जल्दी ये आम लोगों तक पहुंच जाएंगे।
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साइंस किट से निकला पटाखे बनाने का फार्मूला
प्रो. घोष ने बताया कि वर्ष 2016 में उनके संस्थान के संस्थापक निदेशक एन. सत्यामूर्ति ने लोगों की साइंस में दिलचस्पी जगाने के लिए साइंस किट बनाने को कहा था। इसी बीच उन्होंने साइंस किट तैयार की जिसे मार्च 2017 में आईआईटी रोपड़ के अद्वितीय फेस्ट में प्रदर्शित किया गया। फेस्ट में इस प्रोजेक्ट को दूसरा पुरस्कार मिला। इसी बीच उन्होंने अपनी किट में सुधार कर पटाखे बना डाले।
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प्लास्टिक की बोतलों से बनाए पटाखे
प्रो. घोष ने बताया कि पटाखों को बनाने के लिए वह प्लास्टिक की खाली बोतलों का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा अपने घरों एवं आसपास प्रयोग होने वाले सामान का इस्तेमाल करते हैं।
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किसानों के लिए भी वरदान हैं यह पटाखे

Pollution and Noise Free Crackers Prepared by Indian Institute of Science & Research
crackers - फोटो : pexels.com
यह पटाखे किसानों के लिए भी मददगार हैं क्योंकि इसकी आवाज से जंगली जानवर डरकर भाग जाएंगे। प्रो. घोष ने बताया कि उन्होंने दो तरह के पटाखे बनाए हैं। इसमें एक का नाम फायर फ्लाई रखा है, जो राकेट की तरह साठ फुट ऊंचाई तक जाता है। इससे आग भी निकलती है, लेकिन नुकसान नहीं होता है। जबकि दूसरे पटाखे को उन्होंने बाज बाजी का नाम दिया है। पटाखों की लागत दो रुपये से पांच रुपये तक आती है।

ऐसे मिलेगा लोगों को रोजगार के अवसर
प्रो. घोष ने बताया कि वह खादी ग्रामोद्योग की तरह लोगों को रोजगार देने की तैयारी में हैं। पटाखों को बनाने के लिए खाली प्लास्टिक की बोतलों का प्रयोग करते हैं। उनका कहना है कि वह पटाखों का पेटेंट नहीं कराएंगे।

अमेरिका से नौकरी छोड़ आए देश सेवा के लिए
प्रो. घोष मूलरूप से बंगाल के रहने वाले हैं और काफी समय से दिल्ली में रह रहे हैं। उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजूकेशन एंड रिसर्च ज्वाइन किया था। इसके बाद अमेरिका में चले गए थे। इसी बीच, उनके दिल में आया कि वह वापस लौटकर देश की सेवा करें। इसलिए वहां से नौकरी छोड़कर वापस आ गए।
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