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मनीष तिवारी के पार्षदों पर दिए बयान से कांग्रेस में बवाल

Mon, 28 Dec 2015 12:44 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Mon, 28 Dec 2015 12:44 PM IST
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political organically on manish tiwari statement

पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी के मनोनीत पार्षदों पर दिए गए बयान से कांग्रेस पार्टी में बवाल मच गया है। बंसल गुट इस बयान के खिलाफ एकजुट हो गया है।

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मालूम हो कि मनीष तिवारी ने यह कहा था कि नगर निगम में मनोनीत पार्षद नहीं होने चाहिए। निगम में निर्वाचित पार्षद ही होने चाहिए। तिवारी के इस बयान से कांग्रेस के समक्ष इसलिए भी मुश्किल खड़ी हो गई है क्योंकि नए साल में मेयर की कुर्सी मनोनीत पार्षदों के दम पर ही हासिल हो सकती है।
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मनोनीत पार्षदों के मुद्दे पर कांग्रेस ने भाजपा को घेरने की योजना बना रही थी जो कि फेल होती नजर आ रही है क्योंकि चार साल पहले भाजपा के अपने नेता भी मनोनीत पार्षदों को वोटिंग अधिकार न देने के मांग कर चुके हैं। इस मामले को भुनाकर ही कांग्रेस अब तक मेयर की कुर्सी पर कब्जा करती आ रही है।
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तिवारी के दिए गए ब्यान पर कांग्रेास अध्यक्ष, मेयर पूनम शर्मा, डिप्टी मेयर गुरबख्श रावत सहित सभी 8 पार्षदों ने आपत्ति जताई है। इन सभी ने संयुक्त बयान जारी किया है कि पूरी कांग्रेस पार्टी और वह मनोनीत पार्षदों के समर्थन में हैं क्योंकि शहर के विकास में मनोनीत पार्षदों का अहम योगदान रहा है।

इन नेताओं का कहना है कि साल 1996 में जब संसद में शहर में नगर निगम का गठन करने का फैसला तत्कालीन सांसद पवन बंसल ने करवाया था उस समय जो एक्ट पास हुआ था उसमे अलग अलग फील्ड से विशेषज्ञों को मनोनीत करने का प्रावधान शामिल किया गया था क्योंकि चंडीगढ़ एक प्लान सिटी है और इसमे विशेषज्ञों की जरूरत उस समय से ही समझी गई थी। इन नेताओं का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी लोकल बाडीज को मजबूत करना चाहते थे उनकी सोच के अनुसार ही एक्ट में मनोनीत पार्षदों को शामिल किया गया है।


कांग्रेस अधिकार देने के हक में
कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा का कहना है कि उनकी पार्टी मनोनीत पार्षदों को अधिकार देने के हक में हैं और नगर निगम में मनोनीत पार्षद होने भी चाहिए। ोउनका कहना है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने जो ब्यान दिया है वह उनकी निजी राय हो सकती है लेकिन पार्टी का स्टैंड मनोनीत के समर्थन में हैं। उनका कहना है कि भाजपा हमेशा ही मनोनीत पार्षदों को वोटिंग अधिकार देने के खिलाफ बोलती रही है।

मेयर पद का चुनाव अगले माह
कांग्रेस और भाजपा बिना मनोनीत पार्षदों के समर्थन के मेयर की कुर्सी पर कब्जा करने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि 9 मनोनीत पार्षद है और कांग्रेस व भाजपा के लिए इनकी वोट के बिना चुनाव जीतना मुश्किल है। मेयर की सीट जीतने केलिए 19 वोट चाहिए जबकि भाजपा अकाली गठबंधन के पास सांसद को मिलाकर कुल 16 वोट है अगर भाजपा में क्रास वोटिंग नहीं होती है तो उन्हें तीन मनोनीत की वोट चाहिए। इसी तरह से कांग्रेस के कुल 8 पार्षद है। उन्हें मनोनीत, बसपा के दो और निर्दलीय का एक वोट चाहिए।

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