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Loksabha Election: पंजाब में खोई जमीन तलाश रहीं पार्टियां, अकाली दल पंथक तो कांग्रेस पारंपरिक वोट पर केंद्रित
Tue, 21 May 2024 05:29 PM IST
निवेदिता वर्मा
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Tue, 21 May 2024 05:29 PM IST
सार
पंजाब में एक जून को मतदान होगा। इस बार सभी पार्टियां अपने दम पर चुनाव मैदान में हैं। किसी पार्टी का गठबंधन न होने से मुकाबला काफी रोचक हो गया है।
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पंजाब लोकसभा चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब में लोकसभा चुनाव में चंद दिन ही शेष बचे हैं और तमाम राजनीतिक दल या तो अपनी खोई हुई जमीन तलाश रहे हैं या फिर अपना वोट सहेजकर रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। लोकसभा के चुनाव तमाम राजनीतिक पार्टियों के लिए कड़ी चुनौती व परीक्षा लेकर आए
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हैं।
शिरोमणि अकाली दल हमेशा पंथक वोट पर आधारित रहा है, जबकि भाजपा शहरी वोटरों पर। इसी कारण गठबंधन की तीन बार सरकार बनी, लेकिन 1997 के बाद यह पहली बार लोकसभा चुनाव में है कि शिरोमणि अकाली दल का भाजपा से गठबंधन नहीं है। 2017 में भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाले शिरोमणि अकाली दल के हिस्से 25.2 फीसदी वोट और 15 सीटें आई थीं, शिअद का ग्राफ यहीं से तेजी से गिरना शुरू हुआ।
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शिअद के कार्यकाल में बेअदबी की घटनाओं, गुरमीत राम रहीम को श्री अकाल तख्त साहिब से माफी, बरगाड़ी में सिख संगत पर गोलियां चलाने की घटनाओं ने पंथक वोटरों में उसके प्रति गहरी नाराजगी पैदा कर दी। पंथक वोट शिअद से बुरी तरह से खिसका और पिछले साल विधानसभा चुनाव में अकाली दल महज तीन सीटों पर ही आकर अटक गया। 2019 में भी शिअद लोकसभा चुनाव में दो सीटों पर सिमट गया था, जिसमें सुखबीर व उनकी पत्नी हरसिमरत कौर बादल ही चुनाव जीत पाए थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल का वोट शेयर घटकर 18.36 फीसदी रह गया। सीटें भी सिर्फ तीन ही आईं। अकाली दल अब पंजाब के मुद्दों को लेकर मैदान में है और पूरी रणनीति तैयार की जा रही है कि पंजाब की क्षेत्रीय पार्टी होने का फायदा उठाकर पंथक वोट को वापस लाया जा सके जो अकाली दल से दूर जा चुकी है।
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2019 में कांग्रेस को मिले थे 40 फीसदी वोट
2019 में कांग्रेस अकेले राज्य की 13 में से आठ सीटें जीतने में सफल रही थी। इसी प्रकार आम आदमी पार्टी भी एक सीट जीत पाई थी। तब पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के सीएम थे जो अब भाजपा में है। कांग्रेस के लिए अपनी जीत को बरकरार रखने के साथ साथ 2022 में खो चुके वोट बैंक को वापस लाना एक बड़ी चुनौती है। कांग्रेस 22.98 फीसदी पर आकर गिर गई, जबकि 2019 में यह ग्राफ 40 फीसदी था। कांग्रेस खो चुके 12 फीसदी वोट के अलावा अपने दलितों के मजबूत वोट बैंक को वापस लाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। कांग्रेस ने अपने दिग्गज चरणजीत सिंह चन्नी के अलावा पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, पीपीसीसी प्रधान राजा वड़िंग तक को मैदान में उतारा है। कांग्रेस व आप बेशक आईएनडीआईए का हिस्सा हैं, लेकिन राज्य में कांग्रेस के निशाने पर सबसे ज्यादा आप ही है, ताकि अपने खोए हुए वोट को वापस लाया जा सके।
अधिकतम तीन सीटें जीत सकी है भाजपा
बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में पंजाब से भी बहुत उम्मीदें पाल रखी हैं। हालांकि, पंजाब में बीजेपी का अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन तीन लोकसभा सीट जीतने का ही रहा है। 1998 और 2004 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी तीन-तीन सीटें जीतने में सफल हुई थी। पर इस बार पंजाब की कुल 13 सीटों पर बीजेपी पहली बार चुनाव लड़ रही है और अधिक की उम्मीद कर रही है। पंजाब में 39 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है। पर बीजेपी को क्यों इसका लाभ नहीं मिलता, उसके पीछे की राजनीति को समझा जा रहा है। इसलिए ही पार्टी ने अकाली दल को इस बार दूर रखा।
भाजपा के लिए यह बड़ी चुनौती होगी की 39 फीसदी वोट को अपनी तरफ ला सके। हालांकि, पार्टी 2022 में महज 6.6 फीसदी पर आकर अटक गई थी। वहीं भाजपा सिखों में अपना विश्वास बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अकसर पगड़ी पहने उनकी फोटो जरूर आ जाती है। पटना साहिब में तो लंगर खिलाते हुए अभी हाल ही में वो नजर आए थे। बीजेपी नेताओं को उम्मीद है कि शिरोमणि अकाली दल से अलगाव के बाद हिंदुओं के वोट कांग्रेस की बजाए बीजेपी को ही आएंगे। इसी रणनीति के तहत सिखों को भारतीय जनता पार्टी ने पार्टी में शामिल कर टिकट भी दिया है। बीजेपी ने चुनावों के ऐन पहले अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत तरनजीत सिंह संधू को भी पार्टी में शामिल किया। तरनजीत सिंह सिंधू के दादा तेजा सिंह समुंदरी आज़ादी के पूर्व सिखों के बड़े नेता हुआ करते थे, जिन्होंने गुरुद्वारा मूवमेंट और श्री गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के कामों में अहम भूमिका निभाई थी। भाजपा इस बार दो चुनौतियों को लेकर मैदान में है एक तो हिंदुओं की वोट को भाजपा की तरफ किया जाए वहीं सिखों को पार्टी के साथ जोड़ा जाए।
केजरीवाल से बाहर आने से आप को राहत
आम आदमी पार्टी (आप) ने अरविंद केजरीवाल के तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन उसके लिए 2022 के विधानसभा चुनाव जैसी सफलता को दोहराना बड़ी चुनौती है। पार्टी ने पांच कैबिनेट मंत्रियों को मैदान में उतारा है। पार्टी संगरूर की सीट खो चुकी है और जालंधर उपचुनाव जीतने वाला उनका उम्मीदवार भाजपा में जा चुका है। आप का 2022 का वोट प्रतिशत 38 फीसदी रहा था और आप की यह अग्निपरीक्षा है कि वह संगरूर की खोई हुई सीट के अलावा अपना वोट प्रतिशत कायम रख सके।