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चंडीगढ़ः मैदान हुए गायब, बच्चे खेलने लगे इनडोर...आउटडोर गेम्स को कहा अलविदा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 04 Aug 2018 12:44 PM IST
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खेल के मैदान
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जिस तरह से पिछले कुछ साल से चंडीगढ़ से खेल के मैदान तेजी से गायब होते गए उतनी तेजी से खिलाड़ियों ने आउटडोर खेलों को अलविदा करते हुए इनडोर खेलों को चुनना शुरू कर दिया। इनमें से कई युवाओं ने तो अपने खेल से किनारा कर लिया। सिटी के युवा खुले मैदानों पर अपने बचपन के खेलों को खेलने के लिए अब तरसते हैं। बढ़ती आबादी और सेक्टरों में स्थित पार्कों के डेवलपमेंट के चलते धीरे-धीरे पूरे शहर से खेल में मैदान गायब हो गए हैं।
जबसे सेक्टरों में पार्कों का निर्माण हुआ है तबसे बच्चों के खेल फुटबॉल, क्रिकेट, हॉकी, गिल्ली डंडा, कंचे, वालीबॉल, कुश्ती सब खत्म हो गए। पार्कों के बाहर नोटिस लगवाकर लिख दिया गया है कि यहां पर किसी तरह का खेल खेलने की इजाजत नहीं है। अगर बच्चे किसी पार्कों में खेलने की कभी गुस्ताखी भी करते हैं, तो वहां के रेजीडेंट्स उन्हें रोक देते हैं। कई बार तो खेलने को लेकर बच्चों के अभिभावकों के साथ लड़ाई भी होती है।
हालात ये हो चुके हैं कि बच्चों का इन पार्कों में खेलना बंद हो गया है। जिन बच्चों के अभिभावकों के पास पैसे हैं वे उन्हें उनके पंसदीदा खेल के मुताबिक अन्य सेक्टरों में चल रही अकादमी में भेज रहे हैं। जिनके पास बच्चों को ट्रेनिंग के लिए पैसे नहीं हैं उनके बच्चे घरों में बैठे हैं। अब अपनी मनपसंदीदा गेम्स को या तो मोबाइल में या फिर कंप्यूटर पर खेल कर समय पास कर रहे हैं। ऐसे में बच्चों का शारीरिक विकास कैसे होगा।
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जहां खेलते थे क्रिकेट वहां पर पैदल चलने वाले ट्रैक बना दिए: रवि शर्मा
रवि शर्मा तलवारबाजी के इंटरनेशनल प्लेयर हैं। नेशनल में कई पदक इस खिलाड़ी ने नाम हैं। रवि ने बताया कि पहले घर के बाहर खुला मैदान था। जहां पर अपने साथियाें के साथ क्रिकेट, फुटबॉल खेलता था। पहले इस मैदान की चारदीवारी थी। इसके बाद जिस जगह पर क्रिकेट और फुटबॉल खेलते थे वहां पर पैदल चलने वाले ट्रैक बना दिए। सैर करने वाले लोग खेलने से मना करते हैं। इसके बाद काफी मायूसी हाथ लगी। मुझे अपने खेल को बदलना पड़ा। आउट डोर गेम को छोड़कर इनडोर को चुनना पड़ा। मैंने जिमनास्टिक और तलवारबाजी गेम को खेलना शुरू कर दिया।
अब कंप्यूटर, मोबाइल पर पसंदीदा गेम्स खेलता हूं: विश्वप्रताप
विश्वप्रताप सिंह के मुताबिक पहले स्कूल टाइम में घर के पास मैदान पर क्रिकेट और बैडमिंटन खेलने में काफी मजा आता था। धीरे-धीरे यहां पर घर बनने लगे। इसके बाद घर से काफी दूर रामलीला ग्राउंड पर खेलना शुरू कर दिया। इसके आसपास डेवलपमेंट होने के चलते लोग यहां बच्चों को खेलने से मना करने लगे। कुछ बच्चे अभी भी चोरी छुपे कभी खेलते हैं जब लोगों की नजर उन पर न पड़े। चोरी छुपे खेलने से अच्छा है मैंने खेलना ही बंद कर दिया अब लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल पर अपनी पसंदीदा गेम्स खेलता हूं।
खत्म हो रहे मैदानों ने अरमानों पर पानी फेरा : अरमान
अरमान दुआ अपना कैरियर फुटबॉल में बनाना चाहते थे। शहर में तेजी से खत्म हो रहे मैदानाें ने इस युवा के अरमानों पर पानी फेर दिया। अरमान ने बताया कि पहले तो रोज दोस्तों के संग फुटबॉल खेलता था। जब से पार्क बने हैं, खेलने पर एक तरह से पाबंदी लग गई है। पार्कों के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया है कि यहां पर क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, साइकिल चलाना बैन है। इसके बाद कई बार कोशिश भी की, लेकिन लोगों के मना करने पर आखिर मैंने फुटबॉल खेलना ही बंद कर दिया।
आखिर क्रिकेट कहां पर खेलें: शिवम
शिवम क्रिकेट में अपना कैरियर बनाने में लगे हैं। लेकिन आसपास मैदान न होने के कारण रोजाना क्रिकेट को खेलने में असमर्थ हैं। वे खुद खेलना तो चाहते हैं, लेकिन इनको समस्या यह आ रही है कि आखिर क्रिकेट खेले कहां पर। पहले घर के बाहर मैदान पर खेला करते थे। जब से पार्क बने और यहां पर खेलने वाले बच्चों को डांटकर आसपास के लोग भगाने लगे तभी से शिवम के दोस्तों का क्रिकेट खेलना ही बंद हो गया। अब या तो सारा दिन पढ़ाई या फिर घर पर ही टाइम पास करना पड़ रहा है। अब तो बस स्कूल की टीम से ही क्रिकेट खेलने तक सीमित रह गए हैं।
सिर्फ रविवार को स्कूलों में होते हैं क्रिकेट के मुकाबले
हालांकि शहर में एक-दो स्कूलों में केवल रविवार वाले दिन लोकल क्रिकेट टीमें मुकाबले खेलने के लिए पहुंच जाती हैं। महीने में कई बार रविवार को सेक्टर 23 स्थित सरकारी स्कूल में कई क्रिकेट टीमें मुकाबले खेलने के लिए पहुंच जाती हैं। यहां पर एक साथ कई मैच होते हैं। यह वे लोग होते हैं जो किसी निजी क्लब से होते हैं या फिर शौकिया तौर पर क्रिकेट खेलने वाले।
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जबसे सेक्टरों में पार्कों का निर्माण हुआ है तबसे बच्चों के खेल फुटबॉल, क्रिकेट, हॉकी, गिल्ली डंडा, कंचे, वालीबॉल, कुश्ती सब खत्म हो गए। पार्कों के बाहर नोटिस लगवाकर लिख दिया गया है कि यहां पर किसी तरह का खेल खेलने की इजाजत नहीं है। अगर बच्चे किसी पार्कों में खेलने की कभी गुस्ताखी भी करते हैं, तो वहां के रेजीडेंट्स उन्हें रोक देते हैं। कई बार तो खेलने को लेकर बच्चों के अभिभावकों के साथ लड़ाई भी होती है।
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हालात ये हो चुके हैं कि बच्चों का इन पार्कों में खेलना बंद हो गया है। जिन बच्चों के अभिभावकों के पास पैसे हैं वे उन्हें उनके पंसदीदा खेल के मुताबिक अन्य सेक्टरों में चल रही अकादमी में भेज रहे हैं। जिनके पास बच्चों को ट्रेनिंग के लिए पैसे नहीं हैं उनके बच्चे घरों में बैठे हैं। अब अपनी मनपसंदीदा गेम्स को या तो मोबाइल में या फिर कंप्यूटर पर खेल कर समय पास कर रहे हैं। ऐसे में बच्चों का शारीरिक विकास कैसे होगा।
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जहां खेलते थे क्रिकेट वहां पर पैदल चलने वाले ट्रैक बना दिए: रवि शर्मा
रवि शर्मा तलवारबाजी के इंटरनेशनल प्लेयर हैं। नेशनल में कई पदक इस खिलाड़ी ने नाम हैं। रवि ने बताया कि पहले घर के बाहर खुला मैदान था। जहां पर अपने साथियाें के साथ क्रिकेट, फुटबॉल खेलता था। पहले इस मैदान की चारदीवारी थी। इसके बाद जिस जगह पर क्रिकेट और फुटबॉल खेलते थे वहां पर पैदल चलने वाले ट्रैक बना दिए। सैर करने वाले लोग खेलने से मना करते हैं। इसके बाद काफी मायूसी हाथ लगी। मुझे अपने खेल को बदलना पड़ा। आउट डोर गेम को छोड़कर इनडोर को चुनना पड़ा। मैंने जिमनास्टिक और तलवारबाजी गेम को खेलना शुरू कर दिया।
अब कंप्यूटर, मोबाइल पर पसंदीदा गेम्स खेलता हूं: विश्वप्रताप
विश्वप्रताप सिंह के मुताबिक पहले स्कूल टाइम में घर के पास मैदान पर क्रिकेट और बैडमिंटन खेलने में काफी मजा आता था। धीरे-धीरे यहां पर घर बनने लगे। इसके बाद घर से काफी दूर रामलीला ग्राउंड पर खेलना शुरू कर दिया। इसके आसपास डेवलपमेंट होने के चलते लोग यहां बच्चों को खेलने से मना करने लगे। कुछ बच्चे अभी भी चोरी छुपे कभी खेलते हैं जब लोगों की नजर उन पर न पड़े। चोरी छुपे खेलने से अच्छा है मैंने खेलना ही बंद कर दिया अब लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल पर अपनी पसंदीदा गेम्स खेलता हूं।
खत्म हो रहे मैदानों ने अरमानों पर पानी फेरा : अरमान
अरमान दुआ अपना कैरियर फुटबॉल में बनाना चाहते थे। शहर में तेजी से खत्म हो रहे मैदानाें ने इस युवा के अरमानों पर पानी फेर दिया। अरमान ने बताया कि पहले तो रोज दोस्तों के संग फुटबॉल खेलता था। जब से पार्क बने हैं, खेलने पर एक तरह से पाबंदी लग गई है। पार्कों के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया है कि यहां पर क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, साइकिल चलाना बैन है। इसके बाद कई बार कोशिश भी की, लेकिन लोगों के मना करने पर आखिर मैंने फुटबॉल खेलना ही बंद कर दिया।
आखिर क्रिकेट कहां पर खेलें: शिवम
शिवम क्रिकेट में अपना कैरियर बनाने में लगे हैं। लेकिन आसपास मैदान न होने के कारण रोजाना क्रिकेट को खेलने में असमर्थ हैं। वे खुद खेलना तो चाहते हैं, लेकिन इनको समस्या यह आ रही है कि आखिर क्रिकेट खेले कहां पर। पहले घर के बाहर मैदान पर खेला करते थे। जब से पार्क बने और यहां पर खेलने वाले बच्चों को डांटकर आसपास के लोग भगाने लगे तभी से शिवम के दोस्तों का क्रिकेट खेलना ही बंद हो गया। अब या तो सारा दिन पढ़ाई या फिर घर पर ही टाइम पास करना पड़ रहा है। अब तो बस स्कूल की टीम से ही क्रिकेट खेलने तक सीमित रह गए हैं।
सिर्फ रविवार को स्कूलों में होते हैं क्रिकेट के मुकाबले
हालांकि शहर में एक-दो स्कूलों में केवल रविवार वाले दिन लोकल क्रिकेट टीमें मुकाबले खेलने के लिए पहुंच जाती हैं। महीने में कई बार रविवार को सेक्टर 23 स्थित सरकारी स्कूल में कई क्रिकेट टीमें मुकाबले खेलने के लिए पहुंच जाती हैं। यहां पर एक साथ कई मैच होते हैं। यह वे लोग होते हैं जो किसी निजी क्लब से होते हैं या फिर शौकिया तौर पर क्रिकेट खेलने वाले।