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पीजीआई डाक्टरों को नहीं मिल रहा दफ्तर मकान
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चंडीगढ़। दो से ढाई साल के दौरान जिन डाक्टरों ने पीजीआई को ज्वाइन किया है, उनमें से अधिकतर को न तो संस्थान के अंदर दफ्तर मिला और न ही मकान। पीजीआई प्रशासन को चिट्ठी लिख-लिखकर वे परेशान हो चुके हैं। डाक्टरों का कहना है कि उनके कार्य में मरीज को देखना, रिसर्च, टीचिंग और प्रशासनिक काम शामिल हैं। इनके लिए एक स्पेस की जरूरत पड़ती है। बिना इसके काम नहीं चल सकता।
डाक्टरों की चिंता इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि पीजीआई 77 नए और डाक्टर भर्ती करने जा रहा है। यदि ये डाक्टर आते हैं तो उन्हें कहां बैठाया जाएगा? जब पुराने डाक्टरों को ही दफ्तर और मकान नहीं मिला तो इनके आने से समस्या और विकराल हो जाएगी। पीजीआई फैकल्टी एसोसिएशन ने भी इस बारे में चिंता जाहिर की और कहा है कि यह मुद्दा पीजीआई प्रशासन के सामने समय-समय पर उठाया जाता रहा है। 150 से ज्यादा डाक्टरों के पास दफ्तर नहीं है। पिछली बार मीटिंग के दौरान डायरेक्टर ने दावा किया था कि अगली भर्ती तभी होगी, जब पुराने डाक्टरों को पीजीआई में बैठने की जगह मिलेगी। हालांकि ऐसा हुआ नहीं और 16 दिसंबर को डाक्टरों की नई भर्ती निकाल दी गई। जब डाक्टरों को पीजीआई के अंदर बेहतर माहौल नहीं मिलेगा तो वे कैसे काम कर पाएंगे। इससे न सिर्फ रिसर्च प्रभावित होगी, बल्कि पेशेंट केयर पर भी असर पड़ने के आसार हैं।
24 घंटे ड्यूटी, लेकिन बैठने तक की जगह नहीं मिलती
सबसे ज्यादा परेशानी पीजीआई के उन डाक्टरों की है, जिनकी नियुक्ति दो से ढाई साल के दौरान हुई है। उन्हें बैठने के लिए दफ्तर तक नहीं दिया गया है। एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने बताया कि इमरजेंसी की ड्यूटी 24 घंटे की होती है। इस दौरान आपको इमरजेंसी में मौजूद रहना ही होगा। आराम के लिए कुछ वक्त मिलता है, लेकिन फिर भी आराम नहीं कर सकते। यही हाल मकान का है। इसके लिए लंबी वेटिंग है। मकान कम हैं और उम्मीदवार ज्यादा। उसके लिए कम से कम दस साल का वक्त लगेगा। एक अन्य असिस्टेंट प्रोफेसर ने बताया कि वे दो साल से दफ्तर के लिए लड़ रहे थे। जाने कितनी चिट्ठियां लिखीं। एक बार तो धैर्य भी जवाब दे गया। काफी मशक्कत के बाद आफिस मिला तो कुर्सी और मेज की लड़ाई लड़नी पड़ी। घर न होने की वजह से उनके बच्चे व पत्नी दक्षिण भारत के एक राज्य में रहते हैं। वे बाहर घर तो ले सकते हैं, लेकिन परिवार की सुरक्षा उन्हें इजाजत नहीं देती। इस वजह से वे अपनी फैमिली नहीं ला रहे। वे दो साल से घर के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन जो हालात हैं उन्हें भी घर दस साल के बाद ही मिलेगा। पहले जो सीनियर हैं उन्हें मिलेगा। उनमें से जो रिटायर होगा, उसके बाद उनकी बारी आएगी।
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समस्याओं का हल पीजीआई के पास है
पीजीआई के पास दोनों समस्याओं का हल है। दरअसल पीजीआई में करीब 35-40 ऐसे आफिस हैं, जिन पर अवकाश प्राप्त व अन्य प्रोफेसरों ने कब्जा जमा रखा है। कुछ तो ऐसे हैं, जिन्होंने पीजीआई के अंदर तीन-तीन आफिस ले रखे हैं। ऐसे ही एक प्रोफेसर हैं, जिन्होंने एक रूम हेड आफ डिपार्टमेंट के तौर पर, दूसरा कैरो ब्लॉक में और तीसरा कार्डियक सेंटर में ले रखा है। इनका काम एक दफ्तर से चल सकता है। ऐसे प्रोफेसरों से एक रूम छोड़कर बाकी दफ्तर लेकर नए डाक्टरों को दिया जा सकता है। 334 बेड वाली बिल्डिंग में भी कई कमरे खाली हैं और उन्हें भविष्य में आने वाले डाक्टरों के लिए रिजर्व रखा गया है। जब तक कोई नियुक्ति नहीं होती, तब तक के लिए ये कमरे नए डाक्टरों को दिए जा सकते हैं। यही हाल मकानों का है। पीजीआई स्थित स्टेट बैंक आफ इंडिया के पीछे करीब 144 हाउस बनने थे। इनमें आधे डाक्टरों के हैं और आधे कर्मचारियों के। इन मकानों को पास हुए काफी दिन बीत चुके हैं, लेकिन आज तक इनके निर्माण का कार्य आगे नहीं बढ़ सका है।
कोट
आफिस और मकान दोनों ही बेसिक मांग है। इसे हर हाल पूरा किया जाना चाहिए। हमारी मांग है कि जब तक पुराने डाक्टरों को आफिस नहीं मिल जाता, तब तक के लिए नई नियुक्ति को रोक देना चाहिए।
- प्रो. जेएस ठाकुर, प्रेसिडेंट, पीजीआई फैकल्टी एसोसिएशन
कोट
नेहरू एक्सटेंशन में चार डिपार्टमेंट नेहरू हास्पिटल से शिफ्ट होने हैं। इससे नेहरू हास्पिटल में करीब 40 दफ्तर खाली हो जाएंगे। इन दफ्तरों को नए डाक्टरों को सौंपे जाने की योजना है। इससे काफी हद तक समस्या हल हो जाएगी। मकानों के बनाने के आर्डर सरकारी एजेंसी सीपीडब्ल्यूडी को सौंपा जा चुका है।
- प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई
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डाक्टरों की चिंता इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि पीजीआई 77 नए और डाक्टर भर्ती करने जा रहा है। यदि ये डाक्टर आते हैं तो उन्हें कहां बैठाया जाएगा? जब पुराने डाक्टरों को ही दफ्तर और मकान नहीं मिला तो इनके आने से समस्या और विकराल हो जाएगी। पीजीआई फैकल्टी एसोसिएशन ने भी इस बारे में चिंता जाहिर की और कहा है कि यह मुद्दा पीजीआई प्रशासन के सामने समय-समय पर उठाया जाता रहा है। 150 से ज्यादा डाक्टरों के पास दफ्तर नहीं है। पिछली बार मीटिंग के दौरान डायरेक्टर ने दावा किया था कि अगली भर्ती तभी होगी, जब पुराने डाक्टरों को पीजीआई में बैठने की जगह मिलेगी। हालांकि ऐसा हुआ नहीं और 16 दिसंबर को डाक्टरों की नई भर्ती निकाल दी गई। जब डाक्टरों को पीजीआई के अंदर बेहतर माहौल नहीं मिलेगा तो वे कैसे काम कर पाएंगे। इससे न सिर्फ रिसर्च प्रभावित होगी, बल्कि पेशेंट केयर पर भी असर पड़ने के आसार हैं।
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24 घंटे ड्यूटी, लेकिन बैठने तक की जगह नहीं मिलती
सबसे ज्यादा परेशानी पीजीआई के उन डाक्टरों की है, जिनकी नियुक्ति दो से ढाई साल के दौरान हुई है। उन्हें बैठने के लिए दफ्तर तक नहीं दिया गया है। एक असिस्टेंट प्रोफेसर ने बताया कि इमरजेंसी की ड्यूटी 24 घंटे की होती है। इस दौरान आपको इमरजेंसी में मौजूद रहना ही होगा। आराम के लिए कुछ वक्त मिलता है, लेकिन फिर भी आराम नहीं कर सकते। यही हाल मकान का है। इसके लिए लंबी वेटिंग है। मकान कम हैं और उम्मीदवार ज्यादा। उसके लिए कम से कम दस साल का वक्त लगेगा। एक अन्य असिस्टेंट प्रोफेसर ने बताया कि वे दो साल से दफ्तर के लिए लड़ रहे थे। जाने कितनी चिट्ठियां लिखीं। एक बार तो धैर्य भी जवाब दे गया। काफी मशक्कत के बाद आफिस मिला तो कुर्सी और मेज की लड़ाई लड़नी पड़ी। घर न होने की वजह से उनके बच्चे व पत्नी दक्षिण भारत के एक राज्य में रहते हैं। वे बाहर घर तो ले सकते हैं, लेकिन परिवार की सुरक्षा उन्हें इजाजत नहीं देती। इस वजह से वे अपनी फैमिली नहीं ला रहे। वे दो साल से घर के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन जो हालात हैं उन्हें भी घर दस साल के बाद ही मिलेगा। पहले जो सीनियर हैं उन्हें मिलेगा। उनमें से जो रिटायर होगा, उसके बाद उनकी बारी आएगी।
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समस्याओं का हल पीजीआई के पास है
पीजीआई के पास दोनों समस्याओं का हल है। दरअसल पीजीआई में करीब 35-40 ऐसे आफिस हैं, जिन पर अवकाश प्राप्त व अन्य प्रोफेसरों ने कब्जा जमा रखा है। कुछ तो ऐसे हैं, जिन्होंने पीजीआई के अंदर तीन-तीन आफिस ले रखे हैं। ऐसे ही एक प्रोफेसर हैं, जिन्होंने एक रूम हेड आफ डिपार्टमेंट के तौर पर, दूसरा कैरो ब्लॉक में और तीसरा कार्डियक सेंटर में ले रखा है। इनका काम एक दफ्तर से चल सकता है। ऐसे प्रोफेसरों से एक रूम छोड़कर बाकी दफ्तर लेकर नए डाक्टरों को दिया जा सकता है। 334 बेड वाली बिल्डिंग में भी कई कमरे खाली हैं और उन्हें भविष्य में आने वाले डाक्टरों के लिए रिजर्व रखा गया है। जब तक कोई नियुक्ति नहीं होती, तब तक के लिए ये कमरे नए डाक्टरों को दिए जा सकते हैं। यही हाल मकानों का है। पीजीआई स्थित स्टेट बैंक आफ इंडिया के पीछे करीब 144 हाउस बनने थे। इनमें आधे डाक्टरों के हैं और आधे कर्मचारियों के। इन मकानों को पास हुए काफी दिन बीत चुके हैं, लेकिन आज तक इनके निर्माण का कार्य आगे नहीं बढ़ सका है।
कोट
आफिस और मकान दोनों ही बेसिक मांग है। इसे हर हाल पूरा किया जाना चाहिए। हमारी मांग है कि जब तक पुराने डाक्टरों को आफिस नहीं मिल जाता, तब तक के लिए नई नियुक्ति को रोक देना चाहिए।
- प्रो. जेएस ठाकुर, प्रेसिडेंट, पीजीआई फैकल्टी एसोसिएशन
कोट
नेहरू एक्सटेंशन में चार डिपार्टमेंट नेहरू हास्पिटल से शिफ्ट होने हैं। इससे नेहरू हास्पिटल में करीब 40 दफ्तर खाली हो जाएंगे। इन दफ्तरों को नए डाक्टरों को सौंपे जाने की योजना है। इससे काफी हद तक समस्या हल हो जाएगी। मकानों के बनाने के आर्डर सरकारी एजेंसी सीपीडब्ल्यूडी को सौंपा जा चुका है।
- प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई