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रिसर्चः जिंदा लाश बने मरीजों के इलाज की उम्मीद बंधी

Wed, 23 Apr 2014 10:52 AM IST
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Wed, 23 Apr 2014 10:52 AM IST
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PGI Research

एमियोट्रोफिक लैटरल स्लेरोसिस (एएलएस) से पीड़ित मरीजों के इलाज में काफी हद तक उम्मीद बंध गई है। पीजीआई के न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से स्टेम सेल से चल रहा इलाज अंतिम दौर में है।

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30 मरीजों पर चल रहे क्लीनिकल ट्रायल में काफी पाजिटिव रिजल्ट देखने को मिले हैं। जिन मरीजों को स्टेम सेल थैरेपी दी गई थी, उनमें इसके होने वाले नुकसान को रोकने में काफी हद तक सफलता मिली है।
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रिसर्च के मुख्य शोधकर्ता पीजीआई न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रमुख प्रोफेसर सुदेश प्रभाकर ने बताया कि मरीजों को स्टेम सेल थैरेपी दी जा चुकी है। उनका फालोअप चल रहा है। परिणाम भी अच्छे मिल रहे हैं।
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रिसर्च पूरी होने में छह महीने और लगेंगे। उन्होंने दावा किया कि जो भी परिणाम आएंगे, वे मरीजों के लिए नई उम्मीद लेकर आएंगे। एएलएस का फिलहाल दुनिया में कोई इलाज नहीं है।

यह न्यूरो डिस आर्डर की काफी गंभीर बीमारी है। प्रोफेसर प्रभाकर की इस विषय में एक पायलट स्टडी भी है। स्टडी में उन्होंने बताया है कि एएलएस के इलाज में स्टेम सेल थैरेपी काफी सुरक्षित है और इसके अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

रिसर्च के लिए मिली स्पेशल परमिशन
न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर एस प्रभाकर 30 अप्रैल को रिटायर हो रहे हैं। उनके रिटायरमेंट पर अटकलें लगाई जा रही थीं कि एएलएस की रिसर्च का क्या होगा?

प्रोफेसर सुदेश ने बताया कि जो काम शुरू किया था, उसे खत्म करके ही दम लूंगा। छह महीने में स्टेम सेल थैरेपी पूरी तरह से कंप्लीट हो जाएगी। पीजीआई प्रशासन ने इसके लिए परमिशन दे दी है।

इसके अलावा डिमेंशिया पर एक नई रिसर्च चल रही है, जिस पर करीब एक साल का वक्त लगेगा। पीजीआई ने इसके लिए परमिशन दे दी है। एएलएस के मरीजों का फालोअप चल रहा है। उन्हें घर पर ही देख लेंगे, क्योंकि थैरेपी दी जा चुकी है।

क्या होता है एएलएस
ये बीमारी तब होती है जब इंसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रणाली दिमाग और तंत्रिका तंत्र में पाए जाने वाले मायेलिन नाम के एक तत्व पर हमला शुरू कर देती है।


बाद में उसे नष्ट कर देती है। इस तत्व के नष्ट होने से दिमाग से शरीर विभिन्न हिस्सों में जाने वाले संदेश में रुकावट आती है। कुल मिलाकर शरीर के सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं और जिंदा लाश बनकर रह जाता है।

दुनिया में फिलहाल इसका कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में मल्टीपल स्लेरोसिस से लगभग 30 लाख लोग पीड़ित हैं।

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