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मिलिट्री लिटरेचर फेस्ट : इटली में आज भी सुनाए जाते हैं भारतीय जवानों की बहादुरी के किस्से

Sun, 20 Dec 2020 05:45 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 20 Dec 2020 05:45 PM IST
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People of Italy shares Bravery stories of Indian soldiers in His Villages and cities
फाइल फोटो। - फोटो : wiki

यह खबर पढ़कर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। इटली के शहरों व गांवों में आज भी भारतीय जवानों की बहादुरी के किस्से सुनाए जाते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश आर्मी का हिस्से रहे 50 हजार से अधिक भारतीय जवानों ने इटली की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में भारतीय जवानों ने बहादुरी दिखाते हुए फासीवादी ताकतों के विरुद्ध इटली की लड़ाई लड़ते हुए अपना बलिदान दिया था। 

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मिलिट्री लिटरेचर फेस्ट में एक विषय पर इन जवानों के पराक्रम पर चर्चा की गई। इस चर्चा में इतिहासकार डॉ. राबर्ट लायमन, डॉ. एलेग्जेंडर विल्सन, प्रो. नायल बार, गैरेथ डेविस और कर्नल पैट्रिक मरसर ने भारतीय सैनिकों के योगदान और असाधारण बहादुरी के किस्से सुनाए। भारतीय जवानों ने इटली के क्षेत्रीय और मौसती हालातों में जर्मनी जैसे ताकतवर देश की फौज का डटकर सामना किया था।
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सन् 1943 से 1945 तक चली यह एक साहसिक लड़ाई थी। इसमें 5,782 फौजियों ने शहादत का जाम पिया। सैन्य इतिहासकार प्रो. नायल बार ने बताया कि भारतीय सेना की बहादुरी और बलिदान के किस्से आज भी इटली के शहरों और गांवों में सुनाए जाते हैं। इस दौरान ‘बॉलीवुड एंड शेपिंग द नेशन’ विषय पर भी विशेषज्ञों ने चर्चा की।

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फिल्म में दिखाया.. आजादी के बाद कैसे पुनर्गठित हुई सेना

फेस्ट के दौरान ‘क्लैरियन कॉल जोश और जज्बा’ में सेना पुनर्गठित से संबंधी इतिहास पर आधारित लघु फिल्में वर्चुअल दिखाई गईं। फेस्ट आयोजन समिति के सदस्य मेजर बिक्रमजीत कंवरपाल और आराधिका ने बताया कि इस सेशन का मुख्य उद्देश्य 61वीं कैवेलरी की गौरवशाली गाथा को उजागर करना है। इन लघु फिल्मों में विभिन्न रेजिमेंट के इतिहास को प्रदर्शित किया गया। 

इस दौरान यह दिखाया गया कि 1947 में आजादी के समय, सही मायनों में सेना का पुनर्गठन शुरू हुआ। 1951 में नियमित रूप से भारतीय सेना में राज्य बलों के एकीकरण के बाद, शेष हॉर्स्ड कैवेलरी यूनिटों को पुनर्गठित करके इनको ग्वालियर लांसर्स, जोधपुर, कछवा हॉर्स, द मैसूर लांसर्स और बी स्क्वाड्रन और 2 पटियाला लांसर्स में पुनर्गठित किया गया। 

एक अक्टूबर 1953 को ग्वालियर में ‘न्यू हॉर्सड कैवलरी रेजिमेंट’ की स्थापना की गई। इसमें जम्मू-कश्मीर राज्य सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल फुलेल सिंह इसके पहले कमांडेंट बने। जनवरी 1954 में इस नई रेजिमेंट को ‘61 वीं कैवलरी’ का नाम दिया गया था। वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 61वें कैवलरी ने गंगानगर सेक्टर में अपनी सेवाएं दी और 1971 के युद्ध के समय इसने राष्ट्रपति भवन की रक्षा की। इसी  रेजिमेंट ने 1989 में ऑपरेशन पवन, 1990 में ऑपरेशन रक्षक,1999 में ऑपरेशन विजय और 2001-2002 में ऑपरेशन पराक्रम के दौरान राष्ट्र के लिए असाधारण सेवाएं प्रदान कीं।

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