केंद्रीय बजट: उद्योग जगत को थी विशेष पैकेज की दरकार, आयकर छूट की सीमा नहीं बढ़ने से करदाता निराश
पंजाब के लुधियाना में जीएसटी दरें कम नहीं होने से लघु उद्योग, छोटे कारोबारी और दुकानदार नाखुश हैं। वहीं आयकर में छूट न मिलने से मध्यमवर्गीय परिवारों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
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वर्ष 2022-23 के आम बजट से उद्योग जगत, छोटे कारोबारी, दुकानदार, वरिष्ठ नागरिक, सरकारी कर्मचारी, मध्यम वर्गीय परिवार तथा युवा वर्ग को काफी उम्मीदें थी। कोरोना काल के बाद मंदी की मार झेल रहे उद्योग जगत को स्पेशल पैकेज और सस्ते कर्ज की दरकार थी। वहीं लघु उद्योग, छोटे कारोबारी तथा दुकानदार काफी समय से जीएसटी दरें कम होने की उम्मीद लगाए बैठे थे।
वरिष्ठ नागरिकों को सस्ते इलाज व सस्ती दवाओं की जरूरत थी। जबकि सरकारी कर्मचारी तथा मध्यमवर्गीय परिवार आयकर छूट की सीमा बढ़ने और महंगाई कम होने के सपने देख रहे थे। देश का भविष्य कहे जाने वाले युवा वर्ग को किफायती व बेहतर शिक्षा प्रणाली तथा लाखों रुपये खर्च करके तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं के लिए उनकी काबिलियत के मुताबिक रोजगार के उचित अवसर सृजित करने की जरूरत थी। मगर देश के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले इन सभी वर्गों को आम बजट से खासी निराशा हाथ लगी है।
बजट में उद्योग जगत के लिए कुछ नहीं
इस बजट में उद्योग जगत के लिए कुछ नहीं है। वर्तमान समय पर एमएसएमई सेक्टर संकट में है। वित्त मंत्री ने बजट के दौरान जिस ईसीएलजीएस स्कीम का जिक्र किया है, इससे एमएसएमई की दिक्कतें दूर नहीं होंगी। एक कर्ज को उतारने के लिए दूसरा कर्ज लेना समस्या का हल नहीं है। बजट में तकनीक नवीनीकरण फंड तथा नई योजनाओं पर जोर देना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए बजट से उद्योग जगत को कोई फायदा नहीं होगा। - गुरमीत सिंह कुलार, प्रधान, फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रियल एंड कामर्शियल आर्गेनाइजेशन (फीको)
टेक्सटाइल इंडस्ट्री को मिलना चाहिए था स्पेशल राहत पैकेज
कोरोना काल के बाद टेक्सटाइल इंडस्ट्री के हालात खराब हैं। शहर में करीब बारह हजार छोटी बड़ी होजरी इकाइयां हैं। इनका औसतन सालाना टर्नओवर 48 से 60 हजार करोड़ के करीब है। हर साल हजारों करोड़ रुपये टैक्स के रूप में सरकारी खजाने तक पहुंचते हैं। कोरोना काल के बाद मंदी से उबरने तथा दम तोड़ती औद्योगिक इकाइयों को जीवित रखने के लिए स्पेशल राहत पैकेज की दरकार थी। मगर सरकार ने मंदी की मार झेल रही औद्योगिक इकाइयों को अनदेखा किया है। इस वजह से सरकार के प्रति निराशा है। - दर्शन डावर, प्रधान, निटवियर क्लब, लुधियाना।
जीएसटी की दरें कम करनी चाहिए थी
इस बजट में जीएसटी की दरें कम करनी चाहिए थी। इससे महंगाई कम होती और आम जनता के साथ-साथ कारोबारियों को भी राहत मिलती। कोरोना काल का छोटे कारोबारी तथा आम जनता दोनों पर बुरा असर पड़ा है। ऐसे में जीएसटी की दरें कम करके राहत प्रदान की जा सकती थी। जब हम टैक्स भरते हैं तो मंदी के समय में राहत मांगना भी हमारा अधिकार है। मगर सरकार ने इस बारे में बिलकुल नहीं सोचा। बजट देखकर ऐसा लगता है कि जैसे सरकार को छोटे कारोबारी तथा आम जनता से कोई सरोकार नहीं है। - गुरप्रीत सिंह खन्ना, दुकानदार
जीएसटी की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए था
इस बजट में जीएसटी की प्रक्रिया को सरल बनाना चाहिए था। क्योंकि कोरोना काल के बाद लघु उद्योग भीषण मंदी की चपेट में हैं। ऐसे में टैक्स भरने में देरी होना स्वाभाविक है लेकिन हमारी मदद करने के बजाय हमारे जीएसटी नंबर निरस्त किए जा रहे हैं। ऐसे में हम चाहकर भी टैक्स नहीं भर पा रहे हैं। बजट में मंदी की मार झेल रहे छोटे कारोबारियों के लिए टैक्स में छूट और जीएसटी की प्रक्रिया को सरल बनाने की तरफ विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। - उत्तर राठोर, कारोबारी
वित्त बजट से वरिष्ठ नागरिकों को थी बड़ी उम्मीदें
इस बार के वित्त बजट से वरिष्ठ नागरिकों को बड़ी उम्मीदें थी लेकिन उनके लिए सरकार ने बजट में कुछ खास नहीं किया। ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे तो कम से कम मुफ्त इलाज और दवाओं की सुविधा ही प्रदान कर देते। वरिष्ठ नागरिक सिर्फ नाम के ही सीनियर सिटीजन बनकर रह गए हैं। बजट में वरिष्ठ नागरिकों की भलाई योजनाओं को भी जगह मिलनी चाहिए थी लेकिन सरकार ने इस बारे में बिल्कुल नहीं सोचा। - अशोक कुमार, वरिष्ठ नागरिक
आयकर छूट की सीमा बढ़ानी चाहिए थी
दिनों दिन महंगाई बढ़ती जा रही है, इसलिए आयकर छूट की सीमा बढ़ानी चाहिए थी। इससे मध्यमवर्गीय परिवार तथा कम आमदनी वाले लोगों को टैक्स में राहत मिल सकती थी। 80 सी के तहत मिलने वाली छूट का दायरा भी बढ़ाना चाहिए था। मगर बजट में आयकर छूट की सीमा को बिल्कुल भी नहीं बढ़ाया गया। इस वजह से मध्यम वर्गीय परिवार तथा आम जनता में निराशा है। - शरणजीत सिंह भाटिया, करदाता
शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र पर अधिक ध्यान देना चाहिए था
इस बजट में शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र पर अधिक जोर देने की जरूरत थी। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते निजीकरण के कारण शिक्षा काफी महंगी होती जा रही है। दूसरी तरफ बेरोजगारी भी बढ़ती जा रही है। लाखों रुपये खर्च करके तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले ज्यादातर नौजवान बेरोजगार हैं। ऐसे में किफायती तथा बेहतर शिक्षा प्रणाली देने के साथ-साथ रोजगार के उचित अवसर सृजित करने के लिए विशेष मास्टर प्लान बनाने की जरूरत थी। मगर बजट में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिला। - सुशील कुमार, युवा