Parkash Singh Badal: भावी पीढ़ी को इतिहास से जोड़ना चाहते थे बादल, आखिरी कार्यकाल में बनवाईं कई यादगारें
प्रकाश सिंह बादल के कार्यकाल में विरासत-ए-खालसा, जंग-ए-आजादी, चप्पड़ चिड़ी, बंदा सिंह बहादुर युद्ध स्मारक, छोटा और बड़ा घल्लूघारा के स्मारक व श्री दरबार साहब का हेरिटेज गलियारा तैयार हुआ, जो विश्वस्तरीय पहचान बना गए हैं। गांव कूप रोहिड़ा में बड़ा घल्लूघारा के शहीदों की याद में स्मारक बनाया।
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काका जी.. पंजाब और सिखों के संघर्ष का बड़ा लंबा चौड़ा इतिहास है.. आजादी में योगदान है, लेकिन आने वाली पीढि़यां पंजाब व सिखों के संघर्ष को भूल न जाएं, इसलिए उनके लिए यादगार बनानी है और यही यादगार हमारी धरोहर होंगी, जो दशकों तक इतिहास को जिंदा रखेगी। यह अल्फाज, 2007 में प्रकाश सिंह बादल ने उस वक्त कहे थे, जब वह जालंधर अमर उजाला कार्यालय में आए थे। मकसद एक ही था कि इतिहास को जिंदा रखा जाए। अकसर कहते थे कि वह कौम ही जिंदा रहती और आगे बढ़ती है, जो अपने इतिहास को लेकर चलती है। यही वजह है कि अपने आखिरी दो कार्यकाल में उन्होंने कई यादगारें बनवाईं।
पंजाब में इसी दौर में विरासत-ए-खालसा, जंग-ए-आजादी, चप्पड़ चिड़ी, बंदा सिंह बहादुर युद्ध स्मारक, छोटा और बड़ा घल्लूघारा के स्मारक व श्री दरबार साहब का हेरिटेज गलियारा तैयार हुआ, जो विश्वस्तरीय पहचान बना गए हैं। गांव कूप रोहिड़ा में बड़ा घल्लूघारा के शहीदों की याद में स्मारक बनाया।
कूप रोहिड़ा (संगरूर) में फरवरी 1762 में अहमद शाह अब्दाली की फौज ने सिखों पर हमला किया, जिसे बड़े घल्लूघारा के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में करीब 30 से 35 हजार सिख शहीद हुए थे। इसके साथ ही छोटा घल्लूघारा स्मारक गुरदासपुर में तैयार करवाया। इसमें 1746 में मुगल फौजों ने 11 हजार के करीब सिंहों को शहीद किया था। इनके निर्माण में उन्होंने खुद भी बहुत रुचि ली।
बाबा बंदा बहादुर को समर्पित है चप्पड़चिड़ी का स्मारक
शिअद नेता व पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. दलजीत सिंह चीमा कहते हैं कि उनका एक सपना था कि आने वाली पीढि़यों को इतिहास से जोड़ा जाए। उन्होंने प्रदेश में सिख इतिहास से संबंधित चार यादगारें बनाईं। मोहाली के चप्पड़चिड़ी गांव में कुतुबमीनार से भी ऊंचा स्मारक फतेह बुर्ज हैं। यह बाबा बंदा सिंह बहादुर को समर्पित है। यहां उनके पांच जरनैलों की बड़ी प्रतिमाएं लगाई गई हैं।
अमृतसर के मार्ग पर करतारपुर में जंग-ए-आजादी यादगार में आजादी की लड़ाई में पंजाबियों के योगदान को बताया गया है। यह प्रकाश सिंह बादल का यह ड्रीम प्रोजेक्ट था। यहां जलियांवाला बाग हत्याकांड से लेकर कूका लहर, 1906 का किसान आंदोलन आदि को दर्शाया गया है। यह 6500 एकड़ में फैला है।
वह सूबे व अपने इतिहास को प्यार करते थे: सुखबीर
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष व दिवंगत प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर बादल का कहना है कि वड्डे बादल साहब तो अपने सूबे, अपने इतिहास से प्यार करते थे। जिस तरह से पंजाब का युवा विदेशों में जा रहा था, उनके मन में हमेशा टीस उठती थी और जिक्र करते थे कि सुखबीर इस तरह से हमारा इतिहास व हमारी कौम का संघर्ष कौन याद रखेगा? यही वजह है कि 2007 में जब वह सीएम बने तो एक मिशन लेकर चले और उन्होंने पंजाब में यादगार तैयार करवाने में अपनी पूरी ताकत लगाई। दोआबा हो या माझा बठिंडा हो या जालंधर या अमृतसर, हर स्थान क्षेत्र में हमारी कौम की गाथा, आजादी के योद्धाओं की शौर्य कहानियां देखने व सुनने को मिल जाएगी।