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सुनने की क्षमता को जानने के लिए दर्दरहित तकनीक
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Tue, 01 Apr 2014 01:47 PM IST
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पीजीआई के डिपार्टमेंट आफ ऑटोलेरिंजोलॉजी ने सुनने की खत्म क्षमता का पता लगाने के लिए नई तकनीक ईजाद की है।
इसमें बच्चों में इलेक्ट्रो कोकेलिअरोग्राफी की जाएगी। इसमें बच्चे के कान में स्टिमुलस देते हैं। फिर ऑडिटरी ब्रेन स्टेम रिस्पांस की मदद से बच्चे के इनर ईयर से ब्रेन तक पहुंचाने वाले पाथवे की फंक्शनिंग पता चलती है।
पहले की तकनीक में बच्चे के कानों में सिरिंज डालना पड़ता था। इससे दर्द के साथ परदा डैमेज होने की आशंका भी रहती थी। पीजीआई के डिपार्टमेंट ऑफ ऑटोलेरिंजोलॉजी के डॉ. धर्मवीर ने ये तकनीक तैयार की है।
इस डायग्नोज में बच्चों या मरीजों को टेस्ट के दौरान दर्द नहीं सहना पड़ेगा। डाक्टर के मुताबिक कई कारणों से होने वाले ऐसे हियरिंग लॉस का पता लगाने के लिए ये तकनीक दर्द देने वाले डायग्नोस को दूर करेगी।
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इस तकनीक को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ क्लीनिकल न्यूरोफिजियोलॉजी (आईएफसीएन) की बर्लिन में हुई इंटरनेशनल कांग्रेस में मान्यता मिली है। ऑडिटरी न्यूरोपेथी की वजह से बच्चों में सुनने की खत्म क्षमता का पता लगाने में ऐसे डायग्नोस की जरूरत होती है।
डॉ. धर्मवीर बताते हैं कि ऑडिटरी न्यूरोपैथी में बच्चे के कान तक आवाज तो जाती है, लेकिन नर्व सिस्टम खराब होने की वजह से सिगनल इनर ईयर से ब्रेन तक नही पहुंच पाते। इस तकनीक ये हर हफ्ते पीजीआई आने वाले 3 से 5 बच्चों को बिना दर्द दिए डायग्नोस करने में मदद मिलेगी।
पीलिया व कम वजनी बच्चे को ज्यादा संभावना
डाक्टर के मुताबिक यह बीमारी उन बच्चों में सबसे ज्यादा होती है, जिसमें पीलिया की बीमारी होती है या फिर उनका वजन कम होता है। एडल्ट में ये बीमारी नहीं होती है। इस तकनीक को तैयार करते हुए 16 मरीजों पर स्टडी की गई जो पुरानी तकनीक की जगह लेने में सफल रही।
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इसमें बच्चों में इलेक्ट्रो कोकेलिअरोग्राफी की जाएगी। इसमें बच्चे के कान में स्टिमुलस देते हैं। फिर ऑडिटरी ब्रेन स्टेम रिस्पांस की मदद से बच्चे के इनर ईयर से ब्रेन तक पहुंचाने वाले पाथवे की फंक्शनिंग पता चलती है।
पहले की तकनीक में बच्चे के कानों में सिरिंज डालना पड़ता था। इससे दर्द के साथ परदा डैमेज होने की आशंका भी रहती थी। पीजीआई के डिपार्टमेंट ऑफ ऑटोलेरिंजोलॉजी के डॉ. धर्मवीर ने ये तकनीक तैयार की है।
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इस डायग्नोज में बच्चों या मरीजों को टेस्ट के दौरान दर्द नहीं सहना पड़ेगा। डाक्टर के मुताबिक कई कारणों से होने वाले ऐसे हियरिंग लॉस का पता लगाने के लिए ये तकनीक दर्द देने वाले डायग्नोस को दूर करेगी।
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इस तकनीक को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ क्लीनिकल न्यूरोफिजियोलॉजी (आईएफसीएन) की बर्लिन में हुई इंटरनेशनल कांग्रेस में मान्यता मिली है। ऑडिटरी न्यूरोपेथी की वजह से बच्चों में सुनने की खत्म क्षमता का पता लगाने में ऐसे डायग्नोस की जरूरत होती है।
डॉ. धर्मवीर बताते हैं कि ऑडिटरी न्यूरोपैथी में बच्चे के कान तक आवाज तो जाती है, लेकिन नर्व सिस्टम खराब होने की वजह से सिगनल इनर ईयर से ब्रेन तक नही पहुंच पाते। इस तकनीक ये हर हफ्ते पीजीआई आने वाले 3 से 5 बच्चों को बिना दर्द दिए डायग्नोस करने में मदद मिलेगी।
पीलिया व कम वजनी बच्चे को ज्यादा संभावना
डाक्टर के मुताबिक यह बीमारी उन बच्चों में सबसे ज्यादा होती है, जिसमें पीलिया की बीमारी होती है या फिर उनका वजन कम होता है। एडल्ट में ये बीमारी नहीं होती है। इस तकनीक को तैयार करते हुए 16 मरीजों पर स्टडी की गई जो पुरानी तकनीक की जगह लेने में सफल रही।