खुलासा, आटिज्म पीड़ित बच्चों को स्कूलों में नहीं मिलते एडमिशन
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उनका कहना है कि जब तक बच्चा कुछ सीखेगा नहीं, तब तक वह अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो पाएगा। दिल्ली में हाईकोर्ट ने सरकार को सभी स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर रखने को निर्देश दिए हैं, ताकि स्कूल में आने वाले आटिज्म पीड़ित बच्चों को दिक्कतें न आएं, लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से इस दिशा में कोई भी इनिशिएटिव नहीं लिया जा रहा है। आटिज्म डे के मौके पर पीड़ित बच्चों के पेरेंट्स ने अपने दर्द को बयां किया।
छठी क्लास तक 13 स्कूल बदले
16 वर्षीय आर्यन आटिज्म से पीड़ित है। उसकी मां ममता शर्मा ने बताया कि छठी क्लास तक उसके 13 स्कूल बदले जा चुके हैं। एडमिशन लेने के कुछ दिन बाद प्रिंसिपल दबाव बनाते हैं कि वह अपने बच्चे को ले जाएं। अब आर्यन को स्पेशल स्कूल में डाला गया है, लेकिन यदि वह नार्मल स्कूल में पढ़ता तो उसका विकास ज्यादा होता। आर्यन काफी तेज है, लेकिन स्कूल वाले जानबूझकर उसे बाहर कर देते हैं।
बच्चे के साथ प्राइवेट एजुकेटर भेजना पड़ता है
मोहाली के डॉ. गुरप्रीत सिंह का बेटा जसराज भी आटिज्म से पीड़ित है। उनका कहना है कि कुछ स्कूल इसमें पेरेंट्स का सहयोग करते हैं, लेकिन वे एक या दो होंगे। उन्होंने बताया कि स्पेशल एजुकेटर नहीं होने से स्कूल एडमिशन नहीं देते। उन्होंने एक प्राइवेट एजुकेटर को रखा हुआ है, उसे हर महीने 12 हजार रुपये देते हैं। जब उनका बेटा स्कूल जाता है तो प्राइवेट एजुकेटर भी साथ होता है। डॉ. गुरप्रीत ने कहा कि यह काम एक आम आदमी के लिए काफी मुश्किल है।
ऑटिज्म एक मानसिक विकार, लक्षण जन्म से या बाल्यावस्था से
ऑटिज्म एक मानसिक विकार है। इसके लक्षण जन्म से या बाल्यावस्था से ही नजर आने लगते हैं। जिन बच्चों में यह रोग होता है, उनका विकास अन्य से असामान्य होता है । हालांकि यह क्यों होता है, अब तक इसके कारणों का पता नहीं लग पाया है। मनोचिकित्सक विभाग के एचओडी बीएस चवन ने बताया कि इसके कारणों की जांच चल रही है। उनकी जेनेटिक्स लैब में भी काफी काम किया जा रहा है। उम्मीद है जल्द ही इसके कारणों का पता चल सके।
ऐसे पहचानें लक्षण
- कभी कभी किसी आदमी द्वारा छूना भी पीड़ित बच्चों को पसंद नहीं होता है।
- अंधेरे से डरते हैं
- ऐसे बच्चे कभी-कभी गले लगा लेने पर बहुत खुश हो जाते हैं।
- कुछ अपने सामने वाले को मारने-पीटने में भी आनंद लेते हैं।
- बुलाने पर बच्चे कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं करते हैं या अनसुना कर देते हैं।
- अक्सर ऐसे बच्चे आंखें मिलाने में कतराते हैं।
- समूह में खेलने या पढ़ने में उनको उलझन होती है और वे अधिक लोगों के बीच रहना पसंद नहीं करते।
- अपनी रुचि स्वयं कभी जाहिर नहीं करते। पूछने पर भी बतलाने में रुचि नहीं दिखलाते हैं।
- अपनी दिनचर्या में समरसता चाहते हैं, उन्हें कोई परिवर्तन पसंद नहीं होता। परिवर्तन करने पर चिल्लाने भी लगते हैं।
प्रोफेसर बीएस चवन, एचओडी, मनोचिकित्सक डिपार्टमेंट, जीएमसीएच-32 चंडीगढ़ ने बताया कि आटिज्म पीड़ित बच्चों को स्कूलों में एडमिशन नहीं मिलने के कारणों में थोड़ी कमी आई है। स्कूलों में कुछ जागरूकता बढ़ी है, लेकिन इसे बढ़ाने की जरूरत है। हमने चंडीगढ़ प्रशासन को स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर रखने का एक प्रपोजल दिया हुआ है। उम्मीद है कि जल्द ही इस पर गौर किया जाए।