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नवजोत सिद्धू की कभी 'कैप्टन' से बनी ही नहीं, और विवादों ने भी दामन न छोड़ा, यूं बीते सवा दो साल

Mon, 15 Jul 2019 11:05 AM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Mon, 15 Jul 2019 11:05 AM IST
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Navjot Sidhu Controversy with Punjab CM Captain Amrinder Singh, Congress
नवजोत सिद्धू
चाहे क्रिकेट हो या राजनीति नवजोत सिद्धू की कभी भी किसी 'कप्तान' से नहीं बनी। विवादों ने भी कभी उनका दामन नहीं छोड़ा। कैबिनेट मंत्री के तौर पर सवा दो साल का कार्यकाल भी विवादों में ही बीता।
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खुली चुनौती देना पड़ा भारी
कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे सियासत के दिग्गज को खुली चुनौती देना सिद्धू को भारी पड़ गया। सीएम और सिद्धू के बीच शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा। उनकी कांग्रेस में एंट्री राहुल गांधी के जरिए हुई थी। सिद्धू बड़ी-बड़ी उम्मीदें लेकर कांग्रेस में आए थे, पर कैप्टन ने उन्हें नंबर-टू भी नहीं बनने दिया। सिद्धू अपने बयान और काम से लगातार कैप्टन के लिए मुसीबत बनते रहे। फिर नगर निगमों के मेयर बनाते समय उनसे पूछा तक नहीं गया तो फासला और बढ़ गया।
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कमर को जफ्फी डालना महंगा पड़ा
पाकिस्तान जाकर सेना अध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा को जफ्फी डालने पर कैप्टन ने सिद्धू की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की थी। लेकिन सिद्धू अपने स्टैंड पर कायम रहे। पिछले साल हैदराबाद में सिद्धू ने कह दिया कि उनके कैप्टन तो राहुल गांधी हैं और वही कैप्टन अमरिंदर के भी कैप्टन हैं। दोनों के बीच तल्खी लगातार बढ़ती गई। लेकिन लोकसभा चुनाव में बात बहुत बढ़ गई। सिद्धू पंजाब में प्रचार के लिए कहीं नहीं गए।
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सिद्धू दंपती ने आरोप लगाया कि कैप्टन ने उन्हें चंडीगढ़ से लोकसभा का टिकट नहीं लेने दिया। फिर 17 मई को बठिंडा में राजा वड़िंग की चुनावी रैली में नाम लिए बगैर सिद्धू ने कहा कि यहां फ्रेंडली मैच चल रहा है। तभी बेअदबी के केस में बादलों पर परचा नहीं दर्ज किया जा रहा है। सार्वजनिक तौर पर इस बयान के बाद जंग निर्णायक दौर में पहुंच गई। उस समय तो कैप्टन ने सिर्फ इतना ही कहा था कि सिद्धू को कुछ कहना था तो यह उचित समय नहीं था।

कैप्टन ने कहा था कि सिद्धू ये बात पार्टी प्लेटफार्म पर कह सकते थे। इससे नुकसान होगा। वह महत्वाकांक्षी हैं, शायद सीएम बनना चाहते होंगे। उसके बाद लोकसभा चुनाव नतीजों ने खुद ही सारी स्क्रिप्ट लिख दी। सिद्धू की आखिरी उम्मीद राहुल गांधी कम सीटें आने के कारण कमजोर हो चुके थे। कैप्टन आठ सीटें जिताने के बाद भी मजबूत होकर उभरे। वहीं, सिद्धू का हर समय साथ देने वाले प्रदेश प्रधान सुनील जाखड़ खुद चुनाव हार चुके थे।

नतीजे आते ही कैप्टन ने कहा कि सिद्धू के निकाय विभाग के खराब प्रदर्शन के कारण कांग्रेस शहरी इलाकों में हारी। जबकि, यह पार्टी की रीढ़ है। वहीं, सिद्धू ने प्रेस कांफ्रेंस कर विभाग की उपलब्धियां बताईं, कहा- उन्हें बेवजह निशाना बनाया जा रहा है। आखिर छह जून को सीएम ने उनका विभाग बदल दिया। सिद्धू की आखिरी उम्मीद राहुल ने खुद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद सिद्धू के पास दो ही रास्ते थे, इस्तीफा दें या फिर कड़वा घूंट पीकर कैप्टन के निर्देश पर चलें।

कभी भी कप्तान से नहीं बनी

भारतीय क्रिकेट टीम के तत्कालीन कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन के साथ उनका विवाद नब्बे के दशक में काफी सुर्खियां बना था। भाजपा की टीम से सिद्धू ने सियासत में एंट्री की और अमृतसर से लोकसभा चुनाव जीते। लेकिन कुछ ही समय बाद उनकी स्थानीय भाजपा नेताओं से ही बिगड़ने लगी। कभी उनके करीबी रहे श्वेत मलिक और अनिल जोशी कट्टर आलोचक बन गए।

फिर बादल-मजीठिया परिवार के साथ उनके संबंध बेहद खराब हो गए। सिद्धू दंपति खुलेआम अपनी ही सरकार को घेरने लगे। 2014 में सिद्धू के सियासी गुरु अरुण जेटली ने अमृतसर से लड़ने का फैसला किया तो वह जेटली को ही छोड़ कर चले गए। पूरे चुनाव में अमृतसर नहीं गए। भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा, पर सिद्धू ने भाजपा और पीएम नरेंद्र मोदी को ही अलविदा कह दिया।

पहले उनके आप ज्वाइन करने की अटकलें चलती रहीं, पर बात नहीं बनी। अपनी बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं केचलते विधानसभा चुनाव से पहले सिद्धू ने परगट सिंह और बैंस ब्रदर्स के साथ मिल कर मंच बनाया। लेकिन बात कुछ आगे बढ़ती, इससे पहले ही बैंस ब्रदर्स ने अलग होकर आप के साथ समझौता कर लिया।

सिद्धू और परगट के सियासी करिअर के डावांडोल पड़ाव पर आखिर कांग्रेस ने मदद की। पर कांग्रेस में आने के बाद कभी भी सिद्धू की कैप्टन अमरिंदर सिंह से नहीं बनी।

विवादों के सरदार

करीब सवा दो साल के कार्यकाल में कभी भी विवादों ने नवजोत सिद्धू का दामन नहीं छोड़ा। स्थानीय निकायमंत्री बनते ही उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। सुपरिंटेंडेंट से लेकर एक्सईन तक कई अफसरों को सस्पेंड कर दिया। लेकिन सबको हाईकोर्ट से राहत मिली तो सिद्धू के फैसलों पर सवाल खड़े हो गए।

एक निगम कमिश्नर और पर्यटन विभाग के डायरेक्टर के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए उन्होंने सीएम को लिख दिया। अधिकारी उनके साथ काम करने को राजी नहीं होते थे, कई आईएएस अफसरों ने अपने तबादले करा लिए। हालत यह हो गई निचले स्तर पर अधिकारियों ने विकास कार्यों के टेंडर तक लगाने बंद कर दिए।

शहरों में काम ही नहीं हुए। विधानसभा सत्रों के दौरान सिद्धू का बर्ताव हमेशा चर्चा का विषय बना। अकालियों के उकसाने पर वह आपे से बाहर होते रहे। अपने कैबिनेट सहयोगी भारत भूषण आशू के साथ भी लुधियाना के एक प्रोजेक्ट को लेकर उनका विवाद हुआ। अपने बयानों से वह लगातार कांग्रेस और सरकार के लिए मुसीबत बनते रहे।

 

अब पंजाब को ही छोड़ा

नवजोत सिद्धू ने आठ सितंबर को आवाज-ए-पंजाब पार्टी के गठन के समय बैंस ब्रदर्स और परगट सिंह के साथ चंडीगढ़ में प्रेस कांफ्रेंस की थी। तब उन्होंने कहा था कि भाजपा छोड़ने का मकसद सिर्फ यह है कि वह उन्हें पंजाब से बाहर भेजना चाहती है। जबकि, वह पंजाब के लोगों की सेवा करना चाहते हैं।

भाजपा ने उन्हें राज्य सभा सदस्य बनाया, पंजाब के बाहर से लोकसभा चुनाव लड़ाने की पेशकश की। लेकिन वह कभी भी पंजाब नहीं छोड़ सकते। वह सियासत में आए ही इसलिए हैं कि पंजाब और यहां के लोगों के लिए कुछ कर सकें। लेकिन करीब तीन साल भी पूरे नहीं हुए और सिद्धू ने पंजाब को ही छोड़ दिया। पंजाब की सेवा के लिए उन्हें मंत्री बनाया गया था, उन्होंने मंत्रिपद ही छोड़ दिया।

 
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