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अब सुरक्षित रहेगी सुनने की प्राकृतिक क्षमता
अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Mon, 02 Dec 2013 10:43 PM IST
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जन्मजात बेहद ऊंचा सुनने वाले बच्चों में यदि कॉक्लियर इंप्लांट के लिए राउंड विंडो इन्सर्शन तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो 72 प्रतिशत की नेचुरल सुनने की क्षमता जो बहुत ही कम बची होती है, सुरक्षित रहती है।
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यह खुलासा पीजीआई के एक अध्ययन में हुआ है। कॉक्लियर इंप्लांट उन बच्चों में डाला जाता है, जो 90 डीबी से ज्यादा की आवाज सुनते हैं और जिन्हें सुनाई देने वाले मशीन से कोई लाभ न मिलता हो।
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इंप्लांट करने में दो तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। पहली कॉक्लियोस्टॉमी और दूसरी राउंड विंडो इन्सर्शन है।
पीजीआई के असिस्टेंट प्रोफेसर व स्पीच एंड हेयरिंग यूनिट के इंचार्ज डा. संजय मुंजाल ने बताया कि जिन बच्चों की सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, उनमें भी 10-15 प्रतिशत नेचुरल सुनने की क्षमता सुरक्षित रहती है।
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इंप्लांट के दौरान यह क्षमता अक्सर नष्ट हो जाती। अध्ययन में पता चला कि यदि कॉक्ल्योस्टॉमी तकनीक से इंप्लांट किए जाए तो 56.5 प्रतिशत बच्चों की नेचुरल क्षमता सुरक्षित रहती और राउंड विंडो इन्सर्शन तकनीक का प्रयोग करने से 72 प्रतिशत बच्चों की सुनाई शक्ति बरकरार रहती है।
इस अध्ययन में डा. मुंजाल के अलावा डा. अनुराधा, डा. एन भानुमैथी और नरेश कुमार पांडा भी शामिल थे।
प्राकृतिक श्रवण शक्ति बचाई जाना जरूरी
डा. संजय मुंजाल ने बताया कि बच्चों की नेचुरल सुनने की क्षमता को बचाना बहुत जरूरी है। अभी फिलहाल कोई ऐसी तकनीक नहीं है जिससे इस क्षमता का कोई उपयोग किया जा सके।
उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी तकनीक जरूर बनेगी जिससे इन क्षमता का इस्तेमाल जरूर किया जा सके।
इस तरह से किया अध्ययन
प्रोफेसर मुंजाल के मुताबिक ,उन्होंने 48 बच्चों का ऐसा ग्रुप लिया जिनके अंदर कॉक्लियर इंप्लांट डाला जाना था। बच्चे 4-12 उम्र के थे।
23 बच्चों में इंप्लांट कॉक्लियोस्टॉमी तकनीक से किया गया जबकि 25 बच्चों में राउंड विंडो इन्सर्शन तकनीक से कॉक्लियर इंप्लांट किया गया।
सर्जरी से पहले और इंप्लांट के छह महीने बाद बच्चों की नेचुरल क्षमता जांची गई। इसके बाद ही यह परिणाम सामने आए।
मिला यंग साइंटिस्ट अवार्ड
इस अध्ययन के लिए डा. संजय मुंजाल को यंग साइंटिस्ट अवार्ड से नवाजा गया। यह अवार्ड उन्हें हैदराबाद में कॉक्लियर इंप्लांट पर आयोजित नौवें एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस में दिया गया।
यह पेपर उन्होंने हैदराबाद में पेश किया था। उस पर उन्हें यह अवार्ड दिया गया।