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सबने सुना, जब मंच पर गूंजा ‘खिड़की बंद कर दो’
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 14 Jun 2014 04:49 PM IST
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...चाहती तो शादीशुदा जिंदगी को आगे बढ़ा सकती थी, लेकिन दो और दो को छह समझने से अच्छा है उसे चार मानकर ही चलूं। जिंदगी की इस सच्चाई को कुछ इन शब्दों में बयां किया गया नाटक ‘खिड़की बंद कर दो’ से।
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शुक्रवार शाम पंजाब कला भवन में सिटी एंटरटेनमेंट ग्रुप की ओर से आयोजित ओपन एयर थिएटर फेस्टिवल के तहत नाटक का मंचन किया गया। इस एकांकी नाटक में प्रगति शर्मा ने अभिनय किया और इसका निर्देशन रंगकर्मी आशीष शर्मा ने किया।
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नाटक की शुरुआत सेट को थोड़ा क्रिएटिव टच देते हुए खिड़की खुलने से होती है। इसमें से एक महिला जिसका नाम माला है सामने आती है। माला अपनी जिंदगी के कुछ पलों को दर्शकों से साझा करती है।
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इसके बाद शुरू होते हैं उसके बचपन के कुछ खास दृश्य, जब वह बहुत चुलबुली और मस्तमौला थी, लेकिन शादी के बाद उसकी जिंदगी कई मायनों में बदल जाती है। माला को उसका पति अकसर बुरा भला सुनाता है। उसकी इस रोज-रोज की आदत से थक हारकर माला उससे अलग होने का फैसला कर लेती है।
माला के पति से अलग होने पर उसके पड़ोसी उससे अलग व्यवहार करने लगते हैं। माला को ऑफिस में उसका बॉस भी बुरी नजरों से देखता है। तलाकशुदा होने के कारण उसके ऑफिस का चतुर्थ श्रेणी कर्मी भी उस पर बदनीयती रखता है।
माला इन बातों से हिम्मत न हारते हुए जिंदगी में आगे बढ़ती है और अंत में दर्शकों से यही कहती है कि हो सकता तो वह अपनी शादीशुदा जिंदगी को उसकी ढर्रे पर आगे बढ़ा सकती थी। उसका पति यदि उसे दो और दो छह कहने को कहता तो उसे वह मानना पड़ता, लेकिन उसकी नजर में दो और दो हमेशा चार ही रहेगा। यह कहकर माला अपने घर की खिड़की बंद कर देती है।
पंजाब कला भवन में करना पड़ा नाटक
शुक्रवार शाम को हुई तेज बारिश के कारण नाटक को ओपन एयर थिएटर की जगह पंजाब कला परिषद के ऑडिटोरियम में करना पड़ा।